इंडीमून्स आर्ट फेस्टिवल : तीसरी शाम, शरमन जोशी के नाम
इस नाटक पर तो केस कर देना चाहिए, बिलकुल बनता है तगड़ा केस बनता है। जब ये केस अदालत में जाएगा तो न्यायाधीश को फैसला देने में न तो संकोच होगा और न देर लगेगी। 'हंस हंस कर पेट दुखने लगा' अरे भाई मुहावरा अपनी जगह है, लेकिन ये क्या कि आप सचमुच ही हंसा हंसा कर पेट दुखा दो।
हाल में जहां नजर डालो दर्शक पेट पकड़े हुए दिख रहे थे। चलो हंसा रहे वो भी ठीक लेकिन ऐसा भी क्या हंसाना कि एक पल को आराम भी न करने दो। ये हंसाने की सुपारी आपको किस डॉक्टर ने दी थी।
कह रहे थे सवा दो घंटे का नाटक है लेकिन ये क्या टाइम का तो पता ही नहीं चला। हंसने से फुर्सत मिले , तब ना। ठीक है, मध्यांतर दिया था दस मिनिट का लेकिन वो भी कम पड़ रहा था सुकून से चाय भी नहीं पी सके।
हॉल की ओर भागे ताकि कोई सीन न निकल जाए। पैसे जो पूरे वसूल करने थे। इतने दिन हो गए नाटक देखते हुए ऐसा कॉमेडी नाटक तो कभी देखा नहीं।
नाटक खत्म हुआ बाहर आए, नई समस्या? दर्शक को तो पेट पकड़ने से छुटकारा मिल गया, लेकिन हमारा क्या? समीक्षा कैसे लिखें यहां भी कलम की सुपारी ली हुई है नाटककारों ने। कलम कहती है सिर्फ तारीफ ही लिखना पड़ेगी। चलो ऐसे ही सही। लेकिन यहां फिर मुश्किल किसकी तारीफ ज्यादा करें किसकी कम समझ में नहीं आ रहा है। किसकी पहले करें किसकी बाद में ये भी उलझन है।
चलो शरमन जोशी से ही शुरुआत कर लेते हैं। फिल्मों में शरमन की एक्टिंग अच्छी लगती है इसमें कोई शक नहीं लेकिन इसकी अदाकारी में इतना कमाल है ये तो प्रत्यक्ष नाटक में देखकर ही समझ में आया। कमाल की टाइमिंग और कमाल की पंच लाइन्स तो थी ही क्या दिलचस्प जेस्चर थे। शरमन की एंट्री हुई नहीं कि न खत्म होने वाला हंसना शुरू। मजबूरी है अभिनय में ज्यादा नहीं दे सकते क्योंकि 100 में से बस 100 अंक ही जो होते हैं।
लेकिन ये न्याय नहीं होगा अगर सिर्फ शरमन की तारीफ की जाए। बाकी के सभी कलाकार, पूरे के पूरे कलाकार सौ नंबर वाली तारीफ के सच्चे हकदार थे। फिर चाहे वो मदन सुखनंदानी की नई बीवी मीरा (दीपना पटेल) हो या उसका सेक्रेटरी अनिकेत दलाल (राजेश सिंह)। या फिर चाचा (विवेक देसाई) या रूपा (तेजश्री)। ड्रिंकर बिरजू (प्रदीम वेंगुलकर) हो या वकील मणिशंकर (राजेश भोंसले) सब एक से बढ़कर एक उस्ताद अदाकार। मनोरमा (नाम्या सक्सेना) भी कमाल की अदाकारा थी।
केदार शिंदे का गजब निर्देशन
लेखक-निर्देशक केदार शिंदे भी कन्फ्यूज करते हैं, किसको ज्यादा श्रेय दिया जाए लेखक को या निर्देशक को। यहां निर्देशकीय कौशल ही बाजी मारता है। मंचन के हिसाब से मुश्किल स्क्रिप्ट थी। फिल्म में तो तीन रोल में दिखाना बिलकुल आसान होता है, नई तकनीक ने इसे बच्चों का खेल बना दिया है। लेकिन मंच पर तीन रोल में दिखाना बहुत मुश्किल था, जिसे केदार ने इतनी आसानी से अपने अंजाम तक पहुंचा दिया मानो ये मुश्किल था ही नहीं। ऐसी क्रिएटीविटी को एक सलाम तो बनता है।
हेलमेट का क्या खूबी से इस्तेमाल किया, वाह। शुरुआत में सेट देखने पर लगा था क्या हॉच-पॉच बना दिया है। पूरा घर ही खड़ा कर दिया है। लेकिन जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है निर्देशक और सेट डिजाइनर के प्रति आदर बढता जाता है। इस सेट ने ही तो शरमन के तीन रूपों को लगभग एक साथ मंच पर दिखाना संभव बनाया। यहां फिर शरमन के अभिनय की तारीफ करना पड़ेगी।
नाटक हो या फिल्म शत-प्रतिशत सफल तब ही होती है जब सामने नजर आ रहे कलाकारों के साथ मंच या परदे के पीछे काम करने वाले अपने काम को ठीक से अंजाम दें। 'राजू, राजा, राम और मै' की इस सफलता में मंच के पीछे करने वाले हर कलाकार ने अपना काम बखूबी अदा किया है। तभी ये एक सफल प्रस्तुति के रूप में सामने आता है।
सवा दो घंटे के नाटक को देखने के बाद आप कुर्सी से उठ रहे हैं और अगर आपसे कहा जाए कि नाटक फिर से पूरा देखना है तो आप यकीनन मना कर देंगे। लेकिन अगर वो नाटक 'राजू, राजा राम और मैं' हुआ तो ये बात भी पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि आपमें से अधिकांश का जवाब हां में होगा। अब आप कहेंगे कि ये तो अतिश्योक्ति हो गई, कुछ ज्यादा नहीं हो रहा है। अब हम भी क्या करें, दिल से मजबूर हैं, ये नाटक साला था ही ऐसा।
ये फेस्टिवल रंगकर्मी और एनएसडीयन स्वर्गीय आलोक चटर्जी के नाम समर्पित है। दोपहर में हुए 'टॉक शो' का विषय भी आलोक पर केन्द्रित था - 'आलोक चटर्जी का रंगमंच'। परिचर्चा में आलोक की धर्मपत्नी रंगकर्मी शोभा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित, मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के निदेशक टीकम जोशी और रंगकर्मी मनोज जोशी ने हिस्सेदारी की।
शो को होस्ट किया था वरिष्ठ कला समीक्षक और दिलचस्प अंदाज में मंच सचालन करने वाले विनय उपाध्याय ने। यह टॉक शो, टॉक शो से ज्यादा आलोक चटर्जी की यादों और भावनाओं का सागर था जो सभागार में बह रहा था।
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