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रात्रिचर रक्षक: पवित्र वनों में भारतीय उड़न लोमड़ की अनसुनी कहानी

Wed, 28 May 2025 03:33 PM IST
Prachi Hatkar प्राची हटकर
Updated Wed, 28 May 2025 03:33 PM IST
सार

भारतीय उड़न लोमड़, भारत में पाए जाने वाले सबसे बड़े फलाहारी चमगादड़ों में से एक है। इसके पंखों का फैलाव लगभग डेढ़ मीटर तक होता है। यह मुख्यतः फलों, फूलों और पराग पर निर्भर करता है।

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Indian flying fox Pteropus giganteus details and life summary in hindi
भारतीय उड़न लोमड़ (Pteropus giganteus) - फोटो : चार्ल्स जे (Charles J)

विस्तार

भारत की पवित्र वनस्थलियां न केवल सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे जैव विविधता के अमूल्य खजाने भी हैं। इन वनों में जहां एक ओर हजारों वर्षों से स्थानीय समुदायों की आस्था और परंपराएं बसी हैं, वहीं दूसरी ओर कई दुर्लभ और उपयोगी प्रजातियों का जीवन भी इन वनों पर निर्भर करता है। ऐसी ही एक अद्भुत और कम चर्चित प्रजाति है- भारतीय फ्लाइंग फॉक्स/ भारतीय उड़न लोमड़ (Pteropus giganteus)।

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भारतीय उड़न लोमड़, भारत में पाए जाने वाले सबसे बड़े फलाहारी चमगादड़ों में से एक है। इसके पंखों का फैलाव लगभग डेढ़ मीटर तक होता है। यह मुख्यतः फलों, फूलों और पराग पर निर्भर करता है और परागण एवं बीज प्रसारण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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इसके इस पारिस्थितिकीय योगदान के कारण इसे 'नाइट गार्डनर' भी कहा जाता है। किंतु जिस तरह यह प्रजाति रात्रि में गुप्त जीवन जीती है, उसी तरह इसकी पारिस्थितिकीय महत्ता भी अब तक अधिकतर लोगों की नजर से ओझल रही है।
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पश्चिमी घाटों के कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में, कई पवित्र वनस्थलियां ऐसे स्थान हैं जहां इन चमगादड़ों की बड़ी-बड़ी कॉलोनियां देखने को मिलती हैं। ये वनस्थलियां आमतौर पर गांव के बीचों-बीच स्थित होती हैं और इन्हें देवी-देवताओं से जोड़कर पूजा जाता है। इसके कारण यहां पेड़ों को नहीं काटा जाता और जीव-जंतुओं को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। स्थानीय समुदाय इन्हें ‘ईश्वर का घर’ मानकर संरक्षित करते हैं।

उड़न लोमड़ का निवास

इन वनों के भीतर उंचे-उंचे वृक्षों -जैसे कि बरगद, पीपल और आम- की शाखाओं पर हजारों की संख्या में उड़न लोमड़ लटके रहते हैं। दिन में वे विश्राम करते हैं और सूर्यास्त के समय एकसाथ भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। इनकी उपस्थिति स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती है। आम, जामुन,

अंजीर जैसे फलों के पेड़ों में फूलों से परागण करना और उनके बीजों को दूर-दूर तक फैलाना, इनका मुख्य कार्य है।

परंतु अब इन पवित्र वनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ में गांवों में भी शहरीकरण की छाया पहुंच रही है। सड़क निर्माण, नई इमारतें, और भूमि का व्यावसायिक उपयोग इन वनों की शांति को भंग कर रहे हैं। साथ ही, नई पीढ़ी के बीच पारंपरिक विश्वासों की कमी और मंदिर समितियों का बदलता रवैया भी चिंता का विषय है। कहीं-कहीं फ्लाइंग फॉक्स को नुकसानदायक या डरावना मानकर इनकी कॉलोनियां उजाड़ दी जाती हैं।

चमगादड़ों की आबादी में आ रही गिरावट

इन चमगादड़ों की आबादी में हो रही गिरावट केवल एक प्रजाति का संकट नहीं है, यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चेतावनी है। यदि हमने इनके प्राकृतिक आवास- विशेष रूप से पवित्र वनों को संरक्षित नहीं किया, तो इसके गंभीर परिणाम हमारे फलों की पैदावार, वनस्पति विविधता और पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर पर पड़ सकते हैं।

ऐसे में जरूरी है कि हम पवित्र वनों की भूमिका को केवल धार्मिक दायरे में न बांधें, बल्कि इन्हें एक समृद्ध जैविक आवास के रूप में भी पहचानें। स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखते हुए, विज्ञान और संरक्षण नीति के साथ मिलाकर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है।

भारतीय उड़न लोमड़ और पवित्र वनों की यह साझेदारी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे सांस्कृतिक आस्था और प्रकृति का सह-अस्तित्व वर्षों से हमारे सामने जीवंत है- बस जरूरत है इसे पहचानने और बचाने की।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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