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भारतीय वायु सेना का आधुनिकीकरण: F-35 बनाम SU-57 कौन सा विमान भारत के लिए बेहतर विकल्प?

Col. Deepak Kumar कर्नल दीपक कुमार
Updated Tue, 25 Feb 2025 03:29 PM IST
सार

अब सवाल यह उठता है कि भारत को F-35 खरीदना चाहिए, जिसकी कीमत प्रति विमान 110 मिलियन डॉलर है, या फिर उसी कीमत वाले SU-57 को लेना चाहिए, या फिर अपनी तेजी से घटती लड़ाकू क्षमताओं को मजबूत करने के लिए और ज्यादा से ज्यादा SU-30 MKI खरीदकर अपनी संख्या को बढ़ानी चाहिए।

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India Defense Strategy: Challenges in Modernizing the Aircraft While Balancing Between the US and Russia
पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : ANI

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा F-35 की बिक्री के प्रस्ताव ने फिर से भारतीय वायु सेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों की घटती संख्या को चर्चा में ला दिया है। वर्तमान में भारतीय वायु सेना कई चुनौतियों का सामना कर रही है क्योंकि मिग-21, जिसने दशकों तक भारतीय वायु सेना में रीढ़ की हड्डी का काम किया उन्हें धीरे-धीरे स्क्वाड्रन से हटाया जा रहा है।

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वहीं दूसरी ओर नए विमानों की तैनाती बहुत धीमी गति से हो रही है। वायु सेना अब वह प्रभावी शक्ति नहीं रही है जो इसे होनी चाहिए थी, क्योंकि इसे भारत के पश्चिमी और उत्तरी दुश्मनों से संभावित खतरे का सामना करने के लिए कम से कम 42 स्क्वाड्रनों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में, लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या घटकर 30 तक पहुंच गई है।
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यहां तक कि अगर निर्धारित 42 स्क्वाड्रनों की संख्या पूरी हो जाती है, तब भी यह केवल संख्यात्मक रूप से संतुलन प्रदान करेगी, तकनीकी बराबरी नहीं कर पाएगी। तेजस मार्क I और मार्क IA दोनों ही 4.5 जनरेशन के लड़ाकू विमान हैं, जबकि भारत के विरोधी J-20 और J-36 कॉम्बैट जेट्स जैसे 5वीं और 6वीं पीढ़ी के विमानों से खुद को लैस कर रहे हैं।
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भारत का स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम, LCA तेजस, कई दशकों से विलंबित हैं और अब भी इसमें अमेरिकी GE इंजनों की आपूर्ति से संबंधित समस्याएं बनी हुई हैं। भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम अभी भी कई दशक दूर है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए, भारतीय वायु सेना को चार स्क्वाड्रनों के 4वीं या 4.5वीं जनरेशन के लड़ाकू विमानों की शीघ्र तैनाती की आवश्यकता है, क्योंकि इस वर्ष चार और मिग-21 स्क्वाड्रनों को रिटायर किया जाना है, और आने वाले वर्षों में मिग-29 और मिराज 2000 को भी दस्ते से हटाया जाएगा।

इन चार स्क्वाड्रनों की जरूरत तय करने में खरीद प्रक्रिया में लगने वाले समय और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में संभावित देरी को भी ध्यान में रखा गया है। इससे भारतीय वायु सेना को कुछ राहत मिलेगी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में तेजस मार्क 1A के उत्पादन में हो रही देरी को संभालने में मदद मिलेगी।

भारत को क्या खरीदना चाहिए?

अब सवाल यह उठता है कि भारत को F-35 खरीदना चाहिए, जिसकी कीमत प्रति विमान 110 मिलियन डॉलर है, या फिर उसी कीमत वाले SU-57 को लेना चाहिए। एक सवाल ये भी है कि क्या अपनी तेजी से घटती लड़ाकू क्षमताओं को मजबूत करने के लिए और ज्यादा से ज्यादा SU-30 MKI खरीदकर अपनी संख्या को बढ़ानी चाहिए?

इसमें कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जैसे कि विमान की वास्तविक कीमत, एवियोनिक्स सिस्टम, हथियार पैकेज, स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव लागत, दुर्घटना इतिहास, उपयोग पर प्रतिबंध (एंड-यूज़र एग्रीमेंट), तकनीकी और रखरखाव संबंधी मुद्दे, परिचालन अनुभव, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, भविष्य के उन्नयन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और जियोपॉलिटिकल स्थितियां।

F-35 बनाम SU-57

F-35 निश्चित रूप से एक उन्नत 5वीं जनरेशन का विमान है, जो अमेरिका के सहयोगी देशों की वायु सेनाओं में सेवा दे रहा है। हालांकि, अमेरिकी सरकार के जवाबदेही कार्यालय (GAO) ने पिछले पांच वर्षों में F-35 की उपलब्धता पर गंभीर सवाल उठाए हैं और कहा है कि इसके किसी भी वेरिएंट (F-35A, F-35B, F-35C) ने अपने लक्ष्य पूरे नहीं किए हैं। F-35 कई दुर्घटनाओं का शिकार हुआ है, इसके अलावा कई और तरह की दिक्कतें भी इसमें आई हैं। 

तकनीकी विशिष्टताओं में, जैसे इंजन की शक्ति, कार्रवाई की सीमा, पेलोड क्षमता, गति, ऊंचाई सीमा, रडार रेंज और गतिशीलता, F-35 कई मामलों में ये SU-57 से पीछे है। इसके अलावा, हाल ही में इस्रराइल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के दौरान, ईरानी राडारों ने इन विमानों को पकड़ लिया था, जिससे इसके स्टील्थ फीचर्स की प्रभावशीलता पर कई सवाल उठे हैं।

अमेरिकी सैन्य उपकरणों की तरह, F-35 के साथ भी कड़े एंड-यूजर समझौते होंगे, जिससे भारतीय वायु सेना इसे अपने रूसी मूल के उपकरणों (जैसे राडार और SU-30 MKI) के साथ पूरी तरह से एकीकृत नहीं कर पाएगी।

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एफ-35 फाइटर जेट। - फोटो : अमर उजाला

रूस के साथ सैन्य सहयोग

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद अमेरिका ने भारत की सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उसने भारत का साथ छोड़ दिया। इस कारण भारत में अमेरिका की सैन्य प्रतिबद्धता को लेकर एक अविश्वास बना हुआ है। दूसरी ओर, रूस एक भरोसेमंद सैन्य सहयोगी रहा है, जिसने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान और अमेरिकी हस्तक्षेप के बावजूद भारत का साथ दिया था।

हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के बाद रूस चीन पर अधिक निर्भर हो गया है, जिससे भारत को चिंता हो रही है कि कहीं रूस पूरी तरह चीन के प्रभाव में न चला जाए। रूस के साथ सैन्य व्यापार बनाए रखने से भारत की रूस पर पकड़ बनी रह सकती है।

रूस एक भरोसेमंद मित्र रहा है और संभवतः आगे भी बना रहेगा। अमेरिका-रूस पुनर्संबंध भारत को उन प्रतिबंधों से बचाने में मदद कर सकते हैं, जिन्हें अमेरिकी CATSCA भारत पर लागू कर सकता है, जैसा कि S-400 मिसाइल सिस्टम के मामले में हुआ था। इसके अलावा, यदि अमेरिका को संतुष्ट करना जरूरी हो, तो भारत अमेरिका से तेल खरीद सकता है ताकि व्यापार घाटे की भरपाई हो सके, क्योंकि इन दिनों यही राष्ट्रपति ट्रंप की प्रमुख चिंता बनी हुई है।

SU-57 की तुलना में SU-30 MKI बेहतर विकल्प?

SU-57 एक अत्याधुनिक 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जिसमें उच्च गतिशीलता, मल्टी-रोल क्षमताएं और जमीनी व हवाई लड़ाई के लिए उन्नत हथियार प्रणाली शामिल हैं। यह पहले से युद्ध में आजमाया हुआ है और रूस इसे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और भारत में संयुक्त उत्पादन की पेशकश कर रहा है। हालांकि, इसकी कीमत लगभग 100 मिलियन डॉलर प्रति विमान होगी, जो F-35 के बराबर है।

वहीं भारत रूस से SU-57 खरीदता है, तो इससे AMCA प्रोग्राम को झटका लग सकता है। इसलिए, सबसे व्यावहारिक विकल्प यह होगा कि भारत 100 और SU-30 MKI का ऑर्डर दे।

SU-30 MKI क्यों?

SU-30 MKI एक 4.5वीं पीढ़ी का मल्टीरोल एयर सुपीरियरिटी फाइटर है, जिसे भारत दो दशकों से चला रहा है। यह भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित हो रहा है और इसका संपूर्ण मेंटेनेंस इकोसिस्टम पहले से मौजूद है। भारतीय वायु सेना के पायलट इसका उपयोग कैसे करना है उसको लेकर अनुभवी हैं और इसके रखरखाव के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं। इसके अलावा, SU-30 MKI की कीमत लगभग 40-60 मिलियन डॉलर प्रति विमान है, जो F-35 और SU-57 की तुलना में काफी किफायती हैं।

दीर्घकालिक समाधान

  • भारत को अपनी स्वदेशी लड़ाकू विमान क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए
  • AMCA प्रोग्राम को तेज किया जाए
  • तेजस Mk1A और Mk2 के उत्पादन में बाधाओं को दूर किया जाए
  • स्वदेशीकरण बढ़ाया जाए (वर्तमान 50% से 90% तक)
  • कावेरी इंजन को विकसित किया जाए और इसे मानवयुक्त और मानव रहित विमानों में शामिल किया जाए
  • 110-120 KN क्षमता वाले एयरो इंजन का लाइसेंस प्राप्त उत्पादन या जॉइंट डेवलपमेंट किया जाए।


भारत के लिए F-35 लड़ाकू विमानों की खरीद का निर्णय महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभों को वित्तीय प्रभावों और इसकी रक्षा स्वायत्तता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के खिलाफ तौलते हुए लेना चाहिए। इन कारकों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत द्वारा की जाने वाली कोई भी खरीद उसके दीर्घकालिक सुरक्षा उद्देश्यों के अनुरूप हो और इसकी स्वतंत्र विदेश नीति बनी रहे।

रूसी SU-30 MKI का अधिग्रहण, चाहे घरेलू उत्पादन के माध्यम से हो या प्रत्यक्ष खरीद के माध्यम से, सभी जियो स्ट्रेटेजिक और वित्तीय पहलुओं को पूरा करता है और आने वाले कुछ वर्षों में भारत की हवाई युद्ध क्षमता को अनुकूलित करने में मदद करता है।

हालांकि दोनों देश भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन रूस एक अधिक विश्वसनीय, भरोसेमंद और समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला मित्र रहा है, खासकर संकट के समय अपने निरंतर समर्थन और बिना शर्त सैन्य व तकनीकी सहायता देने की तत्परता के कारण। दूसरी ओर, अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ संतुलन के रूप में खड़ा करने के लिए उसके साथ बढ़ती भागीदारी कर रहा है ताकि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने हितों को आगे बढ़ा सके।

भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए दोनों देशों के साथ स्वतंत्र रूप से और गैर-विशेष रूप से संबंध बनाकर संतुलन बनाए रखना चाहिए। कुशल कूटनीति और अमेरिका-रूस पुनर्संबंध की संभावनाओं को देखते हुए, यह कार्य कठिन नहीं होना चाहिए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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