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स्वतंत्रता दिवस 2024: राग और संगीत की यात्रा में अपनी लय को साधता भारत

Thu, 15 Aug 2024 04:50 PM IST
Jyoti Mehra ज्योति मेहरा
Updated Thu, 15 Aug 2024 04:50 PM IST
सार

भारत के सांस्कृतिक प्रतीक 'संगीत' के बारे में बहुत कम लोग ही बात करते हैं। 1947 हमारे देश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष रहा। यह वर्ष भारत और भारतीय संगीत उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था, क्योंकि इसने अगले 3 दशकों और उसके बाद भी भारतीय संगीत को आकार देने का काम किया।

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Independence Day 2024 77 Years Of Hindustani Classical Music History And Evolution
स्वतंत्रता दिवस 2024 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

Independence Day 2024: भारत, इंडिया, हिंदुस्तान, विभिन्न नाम, विभिन्न विचार, विभिन्न संस्कृती वाला ये देश आज अपना 78 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। हिमाच्छादित हिमालय, कोंकण में सदाबहार जंगल, बनारस की रंगीन होली से लेकर बंगाल का राजभोग और राजस्थान के रेगिस्तान तक भारत के अलग-अलग रंग रूप को दिखाते हैं। इस सब से बढ़कर भारत की आत्मा को प्रदर्शित करने वाला प्रतीक है 'भारतीय संगीत', जिसके बिना भारत की व्याख्या अधूरी है।

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आज 78 वे स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किला से लेकर देश के हर गली मोहल्ले तक हर कोई तिरंगे को माथे से लगाए वीर जवानों के बलिदानों को श्रद्धांजलि दे रहा है। हर तरफ भारत मां के सम्मान में मधुर गीतों की गूंज सुनाई दे रही है। राग देश के मधुर स्वर भारत की परंपराओं, ऐतिहासिक धरोहरों और वास्तविक भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 
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देश को आजाद हुए 77 साल हो चुके हैं और आज के समय में भारत का एक नया चेहरा विश्व भर में अपनी पहचान बना रहा है। 77 साल के इस सफर में भारत ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। भारत की राजनीति, तकनीक, शिक्षा, जलवायु, कृषि, विज्ञान, संसाधन जैसे मुद्दों पर तमाम बातें की जाती हैं, लेकिन भारत के सांस्कृतिक प्रतीक 'संगीत' के बारे में बहुत कम लोग ही बात करते हैं। 1947 हमारे देश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष रहा।
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भारत ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता पाई और विभाजन के दर्दनाक परिणामों से भी गुजरा। इसके परिणाम स्वरूप पाकिस्तान बना। यह वर्ष भारत और भारतीय संगीत उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था, क्योंकि इसने अगले 3 दशकों और उसके बाद भी भारतीय संगीत को आकार देने का काम किया।

आजादी के समय भारतीय संगीत की स्थिति

यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान काल संगीत की दृष्टि से बेहद अनूठा है। इस दौरान कला और संगीत के क्षेत्र में जितनी तरक्की हुई है, उतना इससे पहले इतने कम समय में कभी नहीं देखी गई। भारत के आजाद होने के बाद संगीत को भी एक नया आयाम हासिल हुआ है। दरअसल, जब देश आजाद हुआ तब भारतीय संगीत की स्थिति बहुत खास नहीं थी। जिन रियासतों ने संगीत के महान कलाकारों को संरक्षण देने का महत्वपूर्ण बीड़ा उठाया था, वह समाप्त होती जा रहीं थीं।

ऐसे में सरकार ने इन कलाकारों की काफी मदद की। कई नये संगीत संस्थानों की स्थापना की गई। साथ ही फिल्मों एवं संचार माध्यमों ने भी संगीत के विकास में अहम योगदान दिया। इस समय सरकार कलाकारों के नये आश्रयदाता के रूप में आगे आई। इतना ही नहीं भातखंडे का विकास भी आजादी के बाद के काल में ही तेजी पड़ता है। 

विभाजन के बाद संगीत

भारती की आजादी की खुशखबरी देशवासियों को विभाजन की त्रासदी के साथ हासिल हुई। ये आजादी दो टुकड़ों में मिली। आजादी के तुरंत बाद होने वाले हिंदू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगों ने भारतीय जनमानस को अंदर तक हिला कर रख दिया। ऐसे में संगीत कलाकार भी दो भागों में बंटने पर मजबूर हो गए। कुछ महान गायक भारत में रह गये और कुछ पाकिस्तान चले गये, लेकिन उनका दर्द उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखता रहा।

उस समय के संगीत कलाकारों की बात की जाये, तो ये कहा जा सकता है कि शास्त्रीय संगीत के उच्च कोटि के कलाकार भारत में थे। इनमें उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, भी शामिल थे, जो पहले पाकिस्तान चले गये थे। लेकिन बाद में वह भारत वापस आ गये। इस काल में पंडित कृष्णराव शंकर पंडित ने भी भारतीय संगीत पर बहुत प्रभाव डाला। 

आजादी के बाद भी सितार का इमदाद खानी घराना भारत में ही रहा। तबले के कलाकारों में अल्लारखा खां, उस्ताद अहमद जान थिरकवा, पंडित शामता प्रसाद इत्यादि अपने अपने ढंग से संगीत में अपना योगदान देते रहे। ध्रुवपद सम्राट डागर बंधुओं ने तथा बाद में उनके वंशजों ने भी संगीत के क्षेत्र में महान काम किया। 

Independence Day 2024 77 Years Of Hindustani Classical Music History And Evolution
स्वतंत्रता दिवस 2024 - फोटो : istock

1950 ई के दशक में भारत में हिंदुस्तानी संगीत

1950 ई के दशक में भारत में हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख केंद्र उत्तर प्रदेश का बनारस, लखनऊ, रामपुर आदि, मध्यप्रदेश में ग्वालियर, भोपाल, दिल्ली, पंजाब के अनेक क्षेत्र सम्मिलित थे। साथ ही गांधर्व महाविद्यालय की संस्थागत शिक्षा का प्रचार किया जा रहा था। लखनऊ में भातखंडे विद्यापीठ भी बेहतर तरीके से काम कर रहा था।

संगीत के शिक्षण प्रशिक्षण पर सरकार का पर्याप्त ध्यान था। इस हिसाब से यह कहना गलत नहीं होगा कि आजादी के बाद भी संगीत को बरकरार रखने के लिए कई प्रयास किए गए। लेकिन निराशा की बात यह है कि भारत में बदलते दौर के साथ संगीत का स्वरूप भी बदल गया। आज के समय में ज्यादातर गीत व्यावसायिक दृष्टीकोण से रचे जाते हैं, फिर चाहे इसके लिए संगीत के नियमों को तोड़ना ही क्यों न पड़े। 

आज हमारे पास संगीत और कला प्रदर्शन के लिए विभिन्न अवसर और मंच उपलब्ध हैं। हर कोई तकनीक और संसाधनों के उचित इस्तेमाल से अपनी कला का प्रदर्शन कर अपनी पहचान बनाने की क्षमता रखता है। लेकिन समय के साथ शास्त्रीय संगीत पर ढीली होती पकड़ ने शास्त्रीय संगीत के ढांचे को कमजोर कर दिया है। इसके लिए सैकड़ों वर्षों की गुलामी को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

जब लोग केवल जीने के लिए भी संघर्ष करते थे, ऐसे में अपनी धरोहरों की रक्षा करना कोई आसान काम नहीं था। हालांकि, आज भी कई ऐसे महान कलाकार हैं, जो लगातार इसका प्रचार प्रसार कर रहे हैं और संगीत को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे कलाकारों और गुरुओं को हमें नमन करना चाहिए। 

शास्त्रीय संगीत की धुंधली पड़ती छवि

एक समय था जब रागों से रोगों का उपचार किया जाता था। एक समय था जब मेघ मल्हार के स्वर आसमान से पानी धरती तक खींच लाते थे। एक समय वो भी था जब मृदंग महर्षि स्वामी पागल दास जी की मृदंग से निकले ताल ने डाकुओं से उनकी जान बचाई थी।

शास्त्रीय संगीत की ताकत को दर्शाने वाली कई ऐसी कहानियां हैं, जिनके बारे में सुनकर यकीन करना मुश्किल होता है। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि समय ने इस गहरी छवि को हल्का कर दिया है। आज के समय में शोर शराबे को भी लोगों ने संगीत का नाम दे दिया है। लेकिन वास्तव में भारतीय शास्त्रीय संगीत हमें कई मायनों में बेहतर स्तर प्रदान करता है। 

शास्त्रीय संगीत हमें तनाव से मुक्ति दे सकता है। इससे हमारे आस पास एक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। शास्त्रीय संगीत हमारी जीवनशैली को स्तर प्रदान करता है। इसलिए संगीत सुनने वाले श्रोताओं को हमेशा अच्छी कोटि का संगीत ही सुनना चाहिए। फिर चाहे वह शास्त्रीय संगीत हो या लोकसंगीत।

हम सबको संगीत सीखना चाहिए, लेकिन अगर यह संभव नहीं है तो अच्छा संगीत तो जरूर सुनना चाहिए। यह हमारे जीवन को उच्चतम स्तर प्रदान करता है। इसकी मदद से हम अपनी शक्ति समाज के सृजनात्मक कार्यों में और अधिक सक्रियता के साथ लगा सकते हैं। क्योंकि संगीत से उत्पन्न होने वाली बेहतर मानसिकता, रचनात्मकता, सृजनात्मकता और एकता ही विकसित भारत 2047 का निर्माण करेगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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