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इसरो के 50 सालः इसरो ने कभी नहीं किया सिद्धांतों के साथ समझौता

Gautam Chaudharyगौतम चौधरी Updated Thu, 15 Aug 2019 05:13 AM IST
इसरो की स्थापना के 50 वर्ष
इसरो की स्थापना के 50 वर्ष - फोटो : Rohit Jha
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भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ 15 अगस्त को अपने सफर के 49 साल पूरे कर 50वें साल में प्रवेश कर रहा है। इसरो की स्थापना साल 1969 में हुई थी। अब तक इसरो अपने सैकड़ों सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च कर चुका है। इसके अलावा इसरो ने कई अन्य देशों के सैटेलाइट भी लॉन्च किए हैं। इसरो, यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसने आजतक एक भी ऐसे काम नहीं किए जो मानवता के लिए हानिकारक हो।
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इसरो ने अपने सिद्धांत के साथ कभी समझौता नहीं किया और युद्ध की सामग्री का निर्माण नहीं किया और न ही युद्ध में अपनी संस्था का उपयोग होने दिया, जबकि दुनिया के लगभग सारे अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन युद्ध की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गठित किए गए, इसलिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान दुनिया का एक अभिनव अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान है। 

भारत की अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव बहुत पुराना है। भारतीय धार्मिक पौराणिक कथाओं में अंतरिक्ष अनुसंधान और परिभ्रमण की कई कहानियां दर्ज हैं। एक जगह लिखा गया है कि राम के पिता दशरथ चन्द्रमा से मिलने गए थे। इसके अलावा आधुनिक विश्व में भी भारत ने ही इस तकनीक से दुनिया को परिचित कराया। गोया जब रॉकेट को आतिशबाजी के रूप में पहली बार प्रयोग में लाया गया, जो की पड़ोसी देश चीन का तकनीकी आविष्कार था, यह तकनीक तब भारत में आई क्योंकि उन दिनों भारत-चीन के बीच रेशम मार्ग के द्वारा विचार एवं वस्तुओं का आदान-प्रदान हुआ करता था।

इसके बाद टीपू सुल्तान के समय इस तकनीक का और विकसित रूप सामने आया। मैसूर युद्ध में अंग्रेजों को हराने करने के लिए टीपू ने रॉकेट का प्रयोग किया था। इस प्रयोग को देखकर विलियम कंग्रीव प्रभावित हुए और इसी तकनीक को उन्होंने विकसित कर आधुनिक राॅकेट तकनीक का विकास 1804 में किया। 

1947 में अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त होने के बाद, भारतीय वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ भारत की रॉकेट तकनीक के सुरक्षा क्षेत्र में उपयोग एवं अनुसंधान एवं विकास की योजना बनाई और उसपर काम प्रारंभ किया। जनसांख्यिकीय दृष्टि से विशाल होने की वजह से भारत ने दूरसंचार के क्षेत्र में कृत्रिम उपग्रहों की प्राथमिक संभावना को देखते हुए इस दिशा में पहल किया और भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई।

डॉ. विक्रम साराभाई और इसरो 
भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम डॉ. विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। वे वैज्ञानिक कल्पना एवं राष्ट्रनायक के रूप में जाने जाते हैं। 1957 में स्पूतनिक के प्रक्षेपण के बाद, उन्होंने कृत्रिम उपग्रहों की उपयोगिता को भांपा।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है वर्ष 1961 में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग की देखरेख में रखा। परमाणु ऊर्जा विभाग के निदेशक होमी जहांगीर भाभा, जो उन दिनों संपूर्ण भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के प्रभारी थे और जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति का गठन किया, जिसमें डॉ. साराभाई को सभापति के रूप में नियुक्त किया।
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