इसरो के 50 सालः इसरो ने कभी नहीं किया सिद्धांतों के साथ समझौता
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भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ 15 अगस्त को अपने सफर के 49 साल पूरे कर 50वें साल में प्रवेश कर रहा है। इसरो की स्थापना साल 1969 में हुई थी। अब तक इसरो अपने सैकड़ों सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च कर चुका है। इसके अलावा इसरो ने कई अन्य देशों के सैटेलाइट भी लॉन्च किए हैं। इसरो, यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसने आजतक एक भी ऐसे काम नहीं किए जो मानवता के लिए हानिकारक हो।
इसरो ने अपने सिद्धांत के साथ कभी समझौता नहीं किया और युद्ध की सामग्री का निर्माण नहीं किया और न ही युद्ध में अपनी संस्था का उपयोग होने दिया, जबकि दुनिया के लगभग सारे अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन युद्ध की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गठित किए गए, इसलिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान दुनिया का एक अभिनव अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान है।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव बहुत पुराना है। भारतीय धार्मिक पौराणिक कथाओं में अंतरिक्ष अनुसंधान और परिभ्रमण की कई कहानियां दर्ज हैं। एक जगह लिखा गया है कि राम के पिता दशरथ चन्द्रमा से मिलने गए थे। इसके अलावा आधुनिक विश्व में भी भारत ने ही इस तकनीक से दुनिया को परिचित कराया। गोया जब रॉकेट को आतिशबाजी के रूप में पहली बार प्रयोग में लाया गया, जो की पड़ोसी देश चीन का तकनीकी आविष्कार था, यह तकनीक तब भारत में आई क्योंकि उन दिनों भारत-चीन के बीच रेशम मार्ग के द्वारा विचार एवं वस्तुओं का आदान-प्रदान हुआ करता था।
इसके बाद टीपू सुल्तान के समय इस तकनीक का और विकसित रूप सामने आया। मैसूर युद्ध में अंग्रेजों को हराने करने के लिए टीपू ने रॉकेट का प्रयोग किया था। इस प्रयोग को देखकर विलियम कंग्रीव प्रभावित हुए और इसी तकनीक को उन्होंने विकसित कर आधुनिक राॅकेट तकनीक का विकास 1804 में किया।
1947 में अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त होने के बाद, भारतीय वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ भारत की रॉकेट तकनीक के सुरक्षा क्षेत्र में उपयोग एवं अनुसंधान एवं विकास की योजना बनाई और उसपर काम प्रारंभ किया। जनसांख्यिकीय दृष्टि से विशाल होने की वजह से भारत ने दूरसंचार के क्षेत्र में कृत्रिम उपग्रहों की प्राथमिक संभावना को देखते हुए इस दिशा में पहल किया और भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई।
डॉ. विक्रम साराभाई और इसरो
भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम डॉ. विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। वे वैज्ञानिक कल्पना एवं राष्ट्रनायक के रूप में जाने जाते हैं। 1957 में स्पूतनिक के प्रक्षेपण के बाद, उन्होंने कृत्रिम उपग्रहों की उपयोगिता को भांपा।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है वर्ष 1961 में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग की देखरेख में रखा। परमाणु ऊर्जा विभाग के निदेशक होमी जहांगीर भाभा, जो उन दिनों संपूर्ण भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के प्रभारी थे और जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति का गठन किया, जिसमें डॉ. साराभाई को सभापति के रूप में नियुक्त किया।
1962 में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की स्थापना के साथ ही, इसने अनुसंधित रॉकेट का प्रक्षेपण शुरू कर दिया, जिसमें भूमध्य रेखा की समीपता वरदान साबित हुई। ये सभी नव-स्थापित थुंबा भू-मध्यीय रॉकेट अनुसंधान केन्द्र से प्रक्षेपित किए गए, जो कि दक्षिण केरल में तिरुवंतपुरम के समीप स्थित है। शुरुआत में, अमेरिका एवं फ्रांस के अनुसंधित रॉकेट क्रमश, नाइक अपाचे एवं केंटोर की तरह, ऊपरी दबाव का अध्ययन करने के लिए प्रक्षेपित किए गए, जब तक कि प्रशांत महासागर में पोत-आधारित अनुसंधित रॉकेट से अध्ययन शुरू न हुआ।
ये इंग्लैंड और रूस की तर्ज पर बनाए गए थे। फिर भी पहले दिन से ही अंतरिक्ष कार्यक्रम की विकासशील देशी तकनीक की यह उच्च महत्वाकांक्षा थी और इसके चलते भारत ने ठोस ईंधन का प्रयोग करके अपने अनुसंधित रॉकेट का निर्माण शुरू कर दिया, जिसे रोहिणी की संज्ञा दी गई।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देशी तकनीक की आवश्यकता एवं कच्चे माल एवं तकनीक आपूर्ति में भावी अस्थिरता की संभावना को भांपते हुए, प्रत्येक माल आपूर्ति मार्ग, प्रक्रिया एवं तकनीक को अपने अधिकार में लाने का प्रयत्न किया। जैसे-जैसे भारतीय रोहिणी कार्यक्रम ने और अधिक संकुल एवं वृहताकार राॅकेट का प्रक्षेपण जारी रखा, अंतरिक्ष कार्यक्रम बढ़ता चला गया और इसे परमाणु उर्जा विभाग से विभाजित कर, अलग सरकारी विभाग बना दिया गया।
परमाणु उर्जा विभाग के अंतर्गत इन्कोस्पार कार्यक्रम से 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन किया गया, जो कि प्रारम्भ में अंतरिक्ष मिशन के अंतर्गत कार्यरत था और इसकी सफलता को देखते हुए जून, 1972 में, स्वतंत्र अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई।
डॉ. साराभाई का योगदान
डॉ. साराभाई ने टेलीविजन के सीधे प्रसारण के जैसे बहुआयामी प्रयोग में लाए जाने वाले कृत्रिम उपग्रहों की सम्भव्यता के सन्दर्भ में नासा के साथ प्रारंभिक अध्ययन में हिस्सा लिया। इस अध्ययन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि प्रसारण के लिए यही सबसे सस्ता और सरल साधन है।
शुरुआत से ही उपग्रहों को भारत में लाने के फायदों को ध्यान में रखकर, साराभाई और इसरो ने मिलकर एक स्वतंत्र प्रक्षेपण वाहन का निर्माण किया जो कि कृत्रिम उपग्रहों को कक्ष में स्थापित करने, एवं भविष्य में वृहत प्रक्षेपण वाहनों में निर्माण के लिए आवश्यक अभ्यास उपलब्ध कराने में सक्षम था।
रोहिणी श्रेणी के साथ ठोस मोटर बनाने में भारत की क्षमता को परखते हुए अन्य देशों ने भी समांतर कार्यक्रमों के लिए ठोस रॉकेट का उपयोग बेहतर समझा और इसरो ने कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (एस.एल.वी.) की आधारभूत संरचना एवं तकनीक का निर्माण प्रारम्भ कर दिया।
इस दौरान भारत ने भविष्य में संचार की आवश्यकता एवं दूरसंचार का पूर्वानुमान लगाते हुए उपग्रह के लिए तकनीक का विकास प्रारम्भ कर दिया। भारत की अंतरिक्ष में प्रथम यात्रा 1975 में रूस के सहयोग से कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से शुरू हुई। 1979 तक नव-स्थापित द्वितीय प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से एस.एल.वी. प्रक्षेपण के लिए तैयार हो चुका था।
द्वितीय स्तरीय असफलता की वजह से इसका 1979 में प्रथम प्रक्षेपण सफल नहीं हो पाया था। 1980 तक इस समस्या का निवारण कर लिया गया। भारत का देश में प्रथम निर्मित कृत्रिम उपग्रह रोहिणी-प्रथम प्रक्षेपित किया गया।
कहां है इसरो और क्या हैं उद्देश्य?
बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है, जिसका मुख्यालय बेंगलुरू, कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत् हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिए अंतरिक्ष संबंधी तकनीक उपलब्ध कराना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, प्रक्षेपण वाले राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।
प्राथमिक अंतरिक्ष प्रक्षेपण केन्द्र, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरीकोटा, आंध्र प्रदेश में स्थित है और इस संगठन का आदर्श वाक्य है-मानव जाति की सेवा में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास। वर्तमान में डॉ. के. शिवान इसके निदेशक हैं। इसरो भारत सरकार की एक इकाई है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 के इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के लगभग एक वर्ष बाद इसने 29 सितंबर 2015 को एस्ट्रोसैट के रूप में भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित की।
इसरो के द्वारा किए गए कार्य
वर्ष 1962 में परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन और त्रिवेन्द्रम के समीप थुम्बा में राकेट प्रक्षेपण स्थल के विकास की दिशा में पहला प्रयास प्रारंभ किया गया। वर्श 1963 में थुंबा से (21 नवंबर, 1963) को पहले राकेट का प्रक्षेपण की व्यवस्था की गई।
वर्ष 1965 थुंबा में अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीकी केन्द्र की स्थापना। वर्ष 1967 में अहमदाबाद में उपग्रह संचार प्रणाली केन्द्र की स्थापना की गई। वर्ष 1972 में अंतरिक्ष आयोग एवं अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई। वर्ष 1975 में पहले भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण किया गया।
वर्ष 1976 में उपग्रह के माध्यम से पहली बार शिक्षा देने के लिए प्रायोगिक कदम उठाए गए। वर्ष 1979 में एक प्रायोगिक उपग्रह भास्कर- 01 का प्रक्षेपण किया गया। रोहिणी उपग्रह का पहले प्रायोगिक परीक्षण यान एस एल वी-03 की सहायता से प्रक्षेपण असफल रहा, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक अनवरत् अपने काम में लगे रहे। वर्ष 1980 में एस एल वी-3 की सहायता से रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया गया। वर्ष 1981 में ‘एप्पल’ नामक भूवैज्ञानिक संचार उपग्रह का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया।
नवंबर में भास्कर -02 का प्रक्षेपण हुआ और वर्ष 1982 में इन्सैट-01, का अप्रैल में प्रक्षेपण और सितंबर अक्रियकरण। 1983 में एस एल वी-3 का दूसरा प्रक्षेपण। इसके बाद उसी साल आर एस - डी2 को कक्षा में स्थापित किया गया। वर्ष 1984 में भारत और सोवियत संघ द्वारा संयुक्त अंतरिक्ष अभियान के दौरान राकेश शर्मा पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री बने।
वर्ष 1987 में ए एस एल वी का प्रक्षेपण हुआ। इसके बाद तो भारत लगभग प्रत्येक साल अपना अभियान जारी रखा और ऐसे ऐसे कारनामें करके दिखाए जिससे दुनिया दंग रह गई। फिर भारत विदेशी उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में स्थापित करने लगा और वर्ष 1999 में पहली बार भारत ने विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण, दक्षिण कोरिया के किटसैट-3 और जर्मनी के डीसी आर-टूबसैट का सफल परीक्षण किया। इसके बाद भारत दुनिया के कई देशों के उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया और उसे कक्षा में स्थापित किया।
22 अक्टूबर 2008 को भारत ने चन्द्रयान प्रथम का सफल परीक्षण किया। 5 नवम्बर 2013 को मंगलयान का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया। 24 सितंबर 2014 को मंगलयान (प्रक्षेपण के 298 दिन बाद) मंगल की कक्षा में स्थापित भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-डी5) का सफल प्रक्षेपण (5 जनवरी 2014), आईआरएनएसएस-1बी (04 अप्रैल 2014) व 1 सी (16 अक्टूबर 2014) का सफल प्रक्षेपण, जीएसएलवी एमके-3 की सफल पहली प्रायोगिक उड़ान (18 दिसंबर 2014) में की गई।
2015 में 29 सितंबर को खगोलीय शोध को समर्पित भारत की पहली वेधशाला एस्ट्रोसैट का सफल प्रक्षेपण किया गया। 23 मई 2016 को पूरी तरह भारत में बना अपना पहला पुनर्प्रयोज्य अंतरिक्ष शटल (रियूजेबल स्पेस शटल) को कक्षा में स्थापित किया गया। 22 जून 2016 को पीएसएलवी सी-34 के माध्यम से रिकॉर्ड 20 उपग्रह एक साथ छोड़े गए।
28 अगस्त 2016 को वायुमंडल प्रणोदन प्रणाली वाला स्क्रेमजेट इंजन का पहला प्रायोगिक परीक्षण सफल रहा और 8 सितंबर 2016 को स्वदेश में विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस) का पहली बार प्रयोग करते हुए जीएसएलवी-एफ05 की सफल उड़ान के साथ इनसैट-3डीआर अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। 15 फरवरी 2017 को भारतीय खगोल वैज्ञानिकों ने 104 उपग्रहों को एक साथ ही प्रक्षेपित कर अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में इतिहास रच दिया।
एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन को दुनिया के प्रभु राष्ट्रों का कोपभाजन बनना पड़ा। तत्कालीन दुश्मन देश अमेरिका ही नहीं दोस्त सोवियत रूस ने भी भारत को अधर में छोड़ दिया। सोवियत संघ के साथ भारत के बूस्टर तकनीक के क्षेत्र में सहयोग का अमेरिका द्वारा परमाणु अप्रसार नीति की आड़ में काफी प्रतिरोध किया गया। 1992 में भारतीय संस्था इसरो और सोवियत संस्था ग्लावकास्मोस पर प्रतिबंध की धमकी दी गई। इन धमकियों की वजह से सोवियत संघ ने इस सहयोग से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
सोवियत संघ क्रायोजेनिक लिक्वीड राॅकेट इंजन तो भारत को देने के लिए तैयार था, लेकिन इसके निर्माण से जुड़ी तकनीक देने को तैयार नहीं हुआ जो भारत सोवियत संघ से खरीदना चाहता था। इस असहयोग का परिणाम यह हुआ कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए भी सोवियत संघ से बेहतर स्वदेशी तकनीक दो सालो के अथक शोध के बाद विकसित कर ली। 5 जनवरी 2014 को, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की डी5 उड़ान में किया।
भारत का यह अंतरिक्ष कार्यक्रम अब 50वें वर्ष में प्रदेश कर रहा है। इस कार्यक्रम ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया और अनवरत् रूप से मानवत की सेवा के लिए तत्पर रहा। दुनिया का एक मात्र यह संगठन है, जो विकासशील देशों को ताकत प्रदान करता रहा है। अब तो विकसित देश भी भारत का लोहा मानने लगे हैं।
भारत बेहद कम खर्च में दुनिया के देशों का उपग्रह अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करता है। कहने के लिए चीन साम्यवादी देश है लेकिन उसने दुनिया के सम्यवादी देशों को भी कभी सहायता नहीं दी, लेकिन भारत ने दुनिया की मानवता को बेहतर बनाने के लिए कई कार्य किए हैं। इसके कारण दुनिया के कई देश भारतीय पहल की सराहना करते हैं। ‘अंतरिक्ष अनुसंधान मानवत के लिए’ किसी ने चरितार्थ किया है तो वह इसरो है।
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