सरकार को कोसते रहते हैं तो जरूर पढ़ें संविधान की ये बात, शर्मसार हो जाएंगे आप
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देश में चाय की चौपालों से लेकर समाचार चैनलों की चर्चाओं तक सरकार के प्रति सुनाई देने वाली ज्यादातर टिप्पणियों का मिलाजुला सार यही होता है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से नहीं निभा रही है। सरकार ये नहीं कर रही, सरकार को ये करना चाहिए, सरकार को काम करना आता ही नहीं है जैसी अनेक बातें ‘सरकार’ शब्द का जिक्र आते ही अक्सर लोगों की जुबान पर होती हैं। बात यह है कि देश में सरकार को नसीहत देना और उसकी निंदा करना सबसे आम और आसान काम है, जिसे यहां की जनता जमकर करती भी है।
सरकार की जिम्मेदारी और लोकतंत्र
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही बड़ी होती है, तथा जनता द्वारा उसके कामकाज पर नजर रखे जाने में भी कोई बुराई नहीं है। लेकिन क्या सिर्फ सरकार के जिम्मेदार होने से लोकतंत्र की सफलता सुनिश्चित हो जाती है? यहां हम लोकतंत्र शब्द की बनावट पर गौर करें तो ये ‘लोक’और ‘तंत्र’ इन दो शब्दों की संधि से बना है। लोक का अर्थ है जनता और तंत्र का अर्थ है सरकार। लोकतंत्र के सफलतापूर्वक गतिशील रहने के लिए इन दोनों की सजगता और सक्रियता महत्वपूर्ण है। अगर इनमें से एक भी अपने दायित्व के प्रति उदासीन या लापरवाह हुआ तो लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध हो जाएगी।
निश्चित ही लोकतंत्र में जनता की भूमिका स्वामी की होती है, लेकिन यह स्वामित्व उसे जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं करता। जनता के पास यदि अधिकार होते हैं, तो कर्तव्य भी होते हैं। मगर विडंबना है कि आज देश में ज्यादातर लोग, जिसमें शिक्षितों की संख्या अधिक है, बात-बात पर अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों की दुहाई तो देते हैं, लेकिन एकबार भी अपने मौलिक कर्तव्यों की चर्चा नहीं करते। इसमें कुछ दिक्कत हमारे संविधान की भी रही है।
संविधान की सबसे जरूरी बात और नागरिक कर्त्तव्य
1950 में जब भारत का संविधान प्रभाव में आया तो उसमें नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था तो थी, लेकिन कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं थे, तब शायद यह उम्मीद की गई थी कि अधिकार मिलने पर लोगों स्वतः ही कर्तव्य-बोध भी उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन संविधान लागू होने के लगभग ढाई दशक बाद आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सरदार स्वर्ण सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया। 1976 में गठित इस समिति को नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों व उनकी आवश्यकता आदि के विषय में सिफारिशें देने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
इस समिति ने संविधान में मौलिक कर्तव्यों का एक अलग अध्याय जोड़े जाने की संस्तुति की जिसके परिणामस्वरूप 42वां संविधान संशोधन करते हुए संविधान में अनुच्छेद-51(क) के तहत मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था की गर्इ, तब नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्य निर्धारित हुए थे, जिन्हें 2002 में 86वें संविधान संशोधन के द्वारा बढ़ाकर ग्यारह कर दिया गया।
संविधान से कितना सीखा नागरिकों ने
आपातकाल के तानाशाही और लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाले दौर में शायद यह एकमात्र अच्छा कदम था, लेकिन आज हम कह सकते हैं कि यह कदम भी देश के नागरिकों में कर्तव्य-भावना का विकास करने में विफल रहा। लोकतान्त्रिक अधिकार-बोध तो लोगों में तीव्र से तीव्रतर होता गया गया है, लेकिन मौलिक कर्तव्यों के अनुपालन की कोई भावना उनमें अबतक पैदा नहीं हो सकी है। आए दिन जहां-तहां लोग आचार और विचार दोनों ही प्रकार से जाने-अनजाने मौलिक कर्तव्यों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं।
उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि दसवां मौलिक कर्तव्य कहता है कि नागरिक सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। बात-बात पर मरने-मारने की बात करने वाले लोग हिंसा से कितने दूर हैं, ये तो खैर सामने ही है। अब बात सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखने की करें तो इसके लिए रेलवे से बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता। अक्सर रेलगाड़ियों में सुविधाओं की कमी का रोना रोने वाले लोगों को जब सुविधाओं से युक्त गाड़ियां मिलती हैं,तो वे क्या करते हैं, इसकी बानगी इन आंकड़ों से मिल जाती है।
रेलवे और सरकारी संपत्ति को नुकसान
एक अज्ञात रेलवे अधिकारी के हवाले से गत दिनों कई अखबारों की सुर्खियां बनें इस आंकड़े के मुताबिक़ पिछले वित्त वर्ष में देशभर की ट्रेनों के एसी कोचों से करीब 21,72,246 बेडरॉल सामान गायब हो गए हैं, जिनमें 12,83,415 तौलिए, 4,71,077 चादर, 3,14,952 तकिए का गिलाफ, 56,287 तकिए और 46,515 कंबल शामिल हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये सब वातानुकूलित कोचों से गायब हुए हैं, जिनमें प्रायः देश का संपन्न और शिक्षित माना जाना वाला वर्ग ही सवारी करता है। इस स्थिति पर अब और अधिक क्या कहा जाए!
अभी हाल ही में पुणे से मुंबई के बीच चलने वाली प्रगति एक्सप्रेस को नई और बेहतर सुविधाओं से लैस किया गया था, लेकिन ये सुविधाएं यात्रियों को रास नहीं आईं। ट्रेन के बाथरूम से टोटियां और शीशें तक गायब होने लगे। ये एक उदाहरण है। पड़ताल करेंगे तो ऐसे अनेक प्रकार के उदाहरण मिलेंगे जो बात-बात पर देशप्रेम का दावा करने वाले नागरिकों की देश के प्रति कर्तव्य-भावना की कलई खोलते हैं। अधिक क्या कहें, लोगों में कर्तव्य-भावना का शून्य होना ही तो कारण है कि आज घर-बाहर सफाई रखने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए भी सरकार को पहल करनी पड़ रही है।
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