भारत में उद्योगों के लिए आईबीसी कोड और समयबद्ध अनुपालन का महत्व
जब कोई लोन या बकाया राशि लंबे समय तक अदा नहीं होती, तो कुछ परिस्थितियों में उनका वर्गीकरण NPA में कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में, जब ऋण लेने वाला देयता को पूरा करने में अक्षम होता है, लेंडर लोन एग्रीमेन्ट को टूटा हुआ मानते हैं और NPA लेंडर पर वित्तीय बोझ बढ़ा देते हैं, और इनसे रेगुलेटरों को संकेत मिलता है कि बैंक की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है और लेन-देन अवरूद्ध हो जाता है।
जब कोई लोन या बकाया राशि लंबे समय तक अदा नहीं होती, तो कुछ परिस्थितियों में उनका वर्गीकरण NPA में कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में, जब ऋण लेने वाला देयता को पूरा करने में अक्षम होता है, लेंडर लोन एग्रीमेन्ट को टूटा हुआ मानते हैं और NPA लेंडर पर वित्तीय बोझ बढ़ा देते हैं, और इनसे रेगुलेटरों को संकेत मिलता है कि बैंक की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है और लेन-देन अवरूद्ध हो जाता है।
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विस्तार
भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्ष 1991 में अनेक महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं जिनके फलस्वरूप देश में उद्यमशीलता को बढ़ावा मिला। इसके साथ ही अनेक कानूनों और प्रक्रियाओं का सरलीकरण किया गया, जिससे उद्यमों की सुगमता (Ease of Doing Business) को बढ़ावा मिला, और विश्व बैंक की तालिका में भारत का स्थान ऊपर आ गया,और देश में नए पूंजी निवेश को प्रोत्साहन मिला।
दिवालियापन के लिए कानून (IBC)
इन सुधारों में एक महत्वपूर्ण सुधार दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (Insolvency & Bankruptcy Code-IBC) 2016 था। पूंजी निवेश की सुगमता के अतिरिक्त, यदि उद्यम में वांछित सफलता ना मिले तो इससे उद्यम से बाहर जाने के मार्ग भी सुगम होता हैं। IBC के अनुसार जो संसद द्वारा 2016 में अधिनियमित किया गया था, दिवालिएपन के समाधान के लिए एक वन-स्टॉप शाप द्वारा प्रक्रिया निर्धारित की गई थी और दिवालिया हो रहे उद्यम के लिए, देनदारों और लेनदारों के बीच संतुलन बनाकर, एक कानूनी रूप-रेखा की स्थापना की गई।
इसके अनुसार किसी ऋणी के दिवालिया होने पर एक निश्चित प्रकिया पूरी करने के बाद, उसकी परिसंपत्तियों को अधिकार में लिया जा सकता है। इनके फलस्वरूप देश के बैंकिग क्षेत्र को यह सुविधा मिल गई कि वे इस प्रक्रिया का पालन कर अपने ऋण की वसूली कर पाएं, इनके फलस्वरूप देश के बैंकिग क्षेत्र की हालत काफी सुधर गई, NPA (Non Performing Asset) धीरे-धीरे काफी कम हो गण् और नए पूंजी निवेश द्वारा नए उद्यमों को बढ़ावा मिला।
क्या होता है नॉन-परफार्मिंग एसेट (NPA)?
जब कोई लोन या बकाया राशि लम्बे समय तक अदा नहीं होती, तो कुछ परिस्थितियों में उनका वर्गीकरण NPA में कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में, जब ऋण लेने वाला देयता को पूरा करने में अक्षम होता है, लेंडर लोन एग्रीमेन्ट को टूटा हुआ मानते हैं और NPA लेंडर पर वित्तीय बोझ बढ़ा देते हैं, और इनसे रेगुलेटरों को संकेत मिलता है कि बैंक की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है और लेन-देन अवरूद्ध हो जाता है।
IBC के बाद देश के बैंकिंग संस्थानों को इस समस्या से निदान पाने के लिए एक न्यायपूर्ण और प्रभावी प्रणाली मिल गई। लेकिन इसके अनुपालन में कुछ समय से काफी अड़चनें आ रही हैं, जिन्हें सुलझाने की आवश्यकता है।
IBC के अर्न्तगत नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को दिवाला समाधान प्रक्रिया की निगरानी करने और इसके सुचारू और शीघ्र संचालन को सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया था। इसके अर्न्तगत एक समर्पित (dedicated) निर्णायक प्राधिकारी (Resolution Professional) नामित करना होता है। RP समाधान प्रक्रिया के दौरान दिवालिया इकाई के संरक्षक के रूप में कार्य करता है। हालांकि, शुरूआत में इसमें अच्छी प्रगति हुई लेकिन हाल ही में दिवाला आवेदनों की लंबितता और उन्हें हल करने में लगने वाला अधिक समय चिंता का विषय बन गया है।
इसके अर्न्तगत ऐसी किसी जूझती हुई कम्पनी के भविष्य पर सबसे महत्वपूर्ण फैसला ऋणदाताओं की समिति (CoC) पर निर्भर होता है, जिसमें मुख्य रूप से वित्तीय ऋणदाता शामिल होते हैं, और जो संकटग्रस्त कंपनियों के समाधान या परिसमापन (liquidation) पर निर्णय लेती है। हालांकि यह प्रणाली अच्छी तरह से कानूनन बनाई गई है, लेकिन हाल के कईं मामलों के समयबद्ध निपटान, मूल्य क्षरण (deterioration of assets) को रोकने और इष्टतम रिकवरी में सफल नहीं रहे हैं।
IBC की प्रभावशीलता को प्रभावित करने वाले कारण -
इन प्रमुख मुद्दों में से एक विशेष रूप से NCLT में मामलों का बैकलॉग है। समाधान प्रक्रिया में देरी न केवल ऋणों की समय पर वसूली में रूकावट डालती है, बल्कि परिसंपत्ति मूल्य के क्षरण को भी बढ़ाती है।
इसके अलावा, CoC सदस्यों के बीच मतभेद और कानूनी व्याख्या में अस्पष्टताएं IBC की प्रभावशीलता में बाधा डालती हैं। इसके अलावा कुछ लेनदारों या पूर्व प्रवर्तकों की सहमति या अपीलों के कारण समाधान योजनाओं में भी देरी होती है और लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजियां मामलों को लटका देती हैं।
उदाहरण के लिए, राठी TMT सरिया मामले में आवेदक ने एक योजना प्रस्तुत की जिसे फरवरी 2020 में CoC द्वारा अनुमोदित कर किया गया। लेकिन NCLT की सहमति से पहले, एक CoC सदस्य ने NCLT के समक्ष एक आवेदन दिया, जिसे जुलाई 2023 में NVLT ने खारिज कर दिया। CoC सदस्य ने इसके विरूद्ध NCLAT जो अपीलिय फोरम है के समक्ष अपील दायर की जिसे भी खारिज कर दिया गया। ऐसे में मंजूरी मिलने में लगभग तीन साल लग गए।
वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज भी इसी तरह की चुनौती का सामना कर रही है। NCLT की मुंबई पीठ ने अगस्त 2019 में SBI के आवेदन को अनुमति दे दी। वेदांता समूह की यूनिट टिव्न स्टार टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (Twin Star Technologies Ltd) ने नवम्बर 2020 में समाधान योजना (Resolution Plan) प्रस्तुत की। यद्यपि NCLT ने जून 2021 में योजना को मंजूरी दे दी, फिर भी इसे कुछ CoC सदस्यों द्वारा चुनौती दी गई। कुल मिलाकर मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है, यह एक और उदाहरण है जहां अच्छी क्षमता वाली कम्पनी कानूनी दाँव-पेंच में फंस गई है।
IBC कानून देश में पूंजी निवेश को बढ़ावा देने, और व्यवहारिक रूप से जंहा सफलता न मिलने पर कम्पनी दिवालिया हो रही हो, प्रतिकूल परिणामों को कम करने के लिए एक प्रभावशाली कदम है। यह ध्यान में रखते हुए कि एक दिवालिया कंम्पनी का मूल्य तेजी से गिरता जाता है, NCLT और NCLAT के लिए संहिता के तहत प्रदान की गई समयसीमा का कड़ाई से पालन करना, प्रणालीगत कमजोरियो पर ध्यान देना और प्रक्रियात्मक स्तर पर प्रभावशीलता को बढ़ाना आवश्यक है ताकि समाधान प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके और कार्यवाही में तेजी लाकर मामले का निपटान किया जा सके।
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