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जानवरों के आगे श्रेष्ठता बोध में मानवता खोते इंसान और उन्हें दायित्वबोध कराती प्रकृति

Fri, 05 Jun 2020 01:42 PM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Fri, 05 Jun 2020 01:42 PM IST
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Human loses humanity in the sense of superiority before animals, Nature makes them feel responsible
Nature love - फोटो : Pexels

हमारा बचपन दादा-दादी और नाना-नानी के किस्से कहानियों के साथ बड़ा हुआ है। उन कहानियों में हमारे दोस्त हमारे आसपास के जीव-जंतु होते थे। ये मनुष्य के सच्चे दोस्त थे। पशु-पक्षियों से दोस्ती का यह अनुभव केवल किस्से कहानियों का नहीं है बल्कि हमारे आसपास प्रकृति और उसके जीव-जंतुओं का मनुष्य के प्रति सहयोगी व्यवहार है।

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जानवर जो मनुष्य का सबसे वफादार साथी होता है। जब वह पालतू होता है तो अपना होता है। अन्यथा उसे पत्थर मारते, दौड़ाते और डंडा मारतें बच्चों और बड़ो को तो आपने देखा ही होगा। आदिम युग में जब विकास नाम की चिड़ियां नहीं थी, तब मनुष्य, प्रकृति के इन्हीं जीव-जंतुओं के साथ अपनत्व का रिश्ता निभाता था और बदले में अपनी जरूरतों की पूर्ति करता था। 
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मनुष्य और जीव-जंतुओं का यही प्रेमपूर्वक संबंध किस्से कहानियों में मनुष्य और जीव-जंतुओं के सहचर संबंध का प्रमाण बनकर उभरा था। हम में से अधिकांश लोगों ने मोगली की कहानी सुनी ही होगी। इस तरह की कहानियां मनुष्य और जीवों के आपसी संबंधों से निर्मित होती हैं। मनुष्य अपनी मनुष्यता को खो देता है मगर पशु और पक्षी मानवीय व्यवहार के साथ अपने सबसे बड़े दुश्मन मनुष्य के बच्चे का अपने बच्चे की तरह पालन-पोषण करते हैं। 
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इसी तरह लोक में कितने ही किस्से कहानियां मौजूद हैं, जिनमें पशु व पक्षियों ने मनुष्य की रक्षा की है। फिर वह लोक प्रसिद्ध पंचतंत्र की कहानियां हो जिसे शिक्षा के प्रारंभिक स्तर पर बच्चों को पढ़ाया जाता है या ऐतिहासिक किस्सों में महाराणा प्रताप और रानी लक्ष्मीबाई के घोड़े का जिक्र हो। जिसने उनका साथ अपने अंतिम समय तक निभाया था।

मनुष्य और पशु-पक्षियों के आपसी संबंधों से जुड़े ऐसे ही बहुत सारे किस्से लोक में हैं। जिन्हें बचपन से बच्चों को बड़ों द्वारा बताया व सुनाया जाता है। इसका उद्देश्य प्रकृति और मनुष्य के मध्य प्रेम और सहचर्य का संबंध बनाए रखना एवं उसे प्रकृति के समस्त जीवों से प्रेम करना सिखाना था।

बदलते समय के साथ मनुष्य भौतिक सुख की लालसा में विकास की राह में आगे बढ़ने लगा, विकास की राह भी ऐसी जहां प्रकृति उसके लिए उपभोग की वस्तु बन गई। विकास की अंधी दौड़ में अब तक जो जीव-जंतु उसके सहयोगी थे वह अब पूंजी के प्रभाव से मूल्य में बदल गए। आज के समय में बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों की तस्करी हो रही है। 

एक पूरा बाजार इसी तस्करी का हिस्सा है जहां जीवित पशु-पक्षियों से लेकर मृत पशु-पक्षियों की खाल, दांत, सींग, पंख सभी का बड़े स्तर पर व्यापार होता है और इसका उपभोग करने वाला भी बड़ी संख्या में मनुष्य ही है। मनुष्य और प्रकृति का सहचर संबंध बदल कर शोषक और शोषित का संबंध बन गया है। 

Human loses humanity in the sense of superiority before animals, Nature makes them feel responsible
एक मादा हाथी को भोजन के नाम पर अनानास में ज्वलनशील सामग्री भरकर खिला दी जाती है और वह बेजुबान घायल होकर गर्भावस्था में ही मर जाती है

मनुष्य अपने श्रेष्ठता बोध की मानसिकता और लालसाओं की अंधी दौड़ में प्रकृति और उसके जीवों का हत्यारा बन गया है। वह अपने भीतर के मानवीय मूल्यों को पूंजी के बाजार में बेच चुका है। तभी तो जब पूरा देश वैश्विक कोरोना संकट से जूझ रहा है। वहां मई महीने में असम के काजीरंगा अभ्यारण्य में गैंडों के सींग के लिए हत्या कर दी जाती है। यह सब इसलिए क्योंकि इसका बाजार है और इस बाजार में मनुष्य ने अपनी मनुष्यता को गिरवी रख दिया है। 

इसी तरह देश के अन्य हिस्सों में हाथियों को हाथी दांत के लिए मारा जा रहा है, इसके लिए बहुत ही निर्दयी तरीकों से उनकी हत्या की जा रही है। फिर वह उनका सिर काटना हो या उन्हें भोजन के नाम पर ज्वलनशील सामग्री खिलाना हो, तो कहीं जीवों को उनकी खाल के लिए मारा जाना हो। मनुष्य ने अपनी स्वार्थी व दंभी इच्छाओं के लिए पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं की हत्या का एक बड़ा बाजार बनाया है। 

बिना सोचे समझे कि यह भी मनुष्य की भांति ही प्रकृति का अंश है। यदि इन सभी की इसी तरह हत्या की जाती रहेगी तो इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और यदि ऐसा होता है तो प्रकृति और मनुष्य का संतुलन चक्र बिगड़ जाएगा और एक समय बाद मनुष्य जीवन भी इन्हीं जीव-जंतुओं की भांति लुप्त हो जाएगा।

मनुष्य अपने मनुष्य होने के अभिमान में यह भूल गया है कि प्रकृति उसकी पालनहार है। प्रकृति मनुष्य की भांति असंख्य जीव-जंतुओं की भी पोषक है जिनका भ्रम और अहंवश मनुष्य स्वयं को नियंता मान बैठा है। वह अपने अहम में भूल गया है कि यदि वह किसी का पेट नहीं भर सकता है तो उसे उसकी हत्या का भी उसे अधिकार नहीं है। केरल की घटना मनुष्य के इसी अहम और स्वयं को नियंता मानने की क्रूर मानसिकता से उपजी है। जहां एक मादा हाथी को भोजन के नाम पर अनानास में ज्वलनशील सामग्री भरकर खिला दी जाती है और वह बेजुबान घायल होकर गर्भावस्था में ही मर जाती है। 

पशु-पक्षियों के प्रति ऐसी कितनी ही घटनाएं प्रतिदिन हमारे आसपास घटित होती हैं मगर उसे हंसी मजाक हिस्सा बना दिया जाता है और यही मानसिकता बलवती होकर पशु-पक्षियों के साथ अमानवीय व्यवहार को बढ़ावा देती है। मनुष्य भूल जाता हैं कि जो मनुष्य बेजुबान पशु-पक्षियों के साथ अमानवीय हो सकता है वह मनुष्य के प्रति भी हिंसा का यही भाव रख सकता है और उसके विनाश का कारण बन सकता है। वर्तमान समय में मनुष्य और प्रकृति का संबंध बदल गया है। मनुष्य अपने मनुष्य होने के भाव को खो रहा है वह पूंजी के प्रभाव मानवता को बेच रहा है।

Human loses humanity in the sense of superiority before animals, Nature makes them feel responsible
आज मनुष्य और प्रकृति का संबंध बदल गया है, यह विनाश की स्थिति का सूचक है।

मनुष्य को जानवरों से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह बुद्धि का स्वामी है। मगर उसने अपनी इस बुद्धि का दुरुपयोग ही अधिक किया है। अक्सर समाज में मनुष्य के व्यवहार की तुलना जानवर से की जाती है। वह निरा गधा है अर्थात वह गधे के समान मूर्ख है। वह तो जानवर है अर्थात उसमें मानवता नहीं है। इन तुलनाओं में वह भूल जाता है कि मनुष्य को जानवर कहना जानवरों की उपेक्षा करना है क्योंकि जानवर भी प्रेम, ममता और सहचर्य के संबंधों के साथ जीते हैं। 

जिस गधे की मिसाल लोग मूर्खता के संदर्भ में देते हैं वह निरा मूर्ख नहीं होता है बल्कि वह मेहनती पशु होता है जो कर्मठता के साथ निरंतर कार्य करता है। वह मनुष्य की भांति स्वार्थी व लोभी प्रवृति के नहीं होता है। वह सहयोगी प्रवृति के साथ जीता है। यही भाव मनुष्य, प्रकृति और उसके चराचर जगत के मध्य तादात्म्य स्थापित करता है। परंतु मनुष्य अंधी लालसाओं की चाहत में यह भूल जा रहा है कि प्रकृति उसकी संरक्षक है। 

प्रकृति ही उसे अन्न, जल, हवा और जीवन देती है और इसके बदले प्रकृति के प्रति उसके कर्तव्यों को निभाने की बात करती है। जिन कर्तव्यों को वह अक्सर भूल जाता है ऐसे में प्रकृति उसे बोध कराती है। यह बोध अक्सर त्रासदियों के रूप में सामने आता है। क्योंकि मनुष्य अपनी विकास यात्रा में प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाता है। उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अपने अधिकारों का तो ज्ञान है परंतु प्रकृति और अन्य जीव-जंतुओं के अधिकार व उनके प्रति अपने कर्तव्यों से अंजान बना हुआ है।

जीवन के आरंभ में जब प्रकृति, मनुष्य और जीव परस्पर सहयोग के साथ जीवन व्यतीत करते थे, एक दूसरे के सहचर थे। किंतु आज मनुष्य और प्रकृति का संबंध बदल गया है। यह बदला संबंध विनाश की स्थिति का सूचक है। जब तक प्रकृति और मनुष्य का संबंध विश्वास और कर्तव्य के साथ चलता रहेगा, दोनों में सहयोगी और सहचर भाव बना रहेगा। 

इस संबंध के टूटने पर मनुष्य और प्रकृति के संबंध में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होगी। यदि मनुष्य प्रकृति और उसके विविध तत्वों (जीव-जंतु, नदी, पहाड़, जल, हवा, जंगल आदि) के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाता है तो आने वाला समय उसके लिए और अधिक भयानक होगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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