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भारतीय संस्कृति में की गई है पर्यावरण की चिंता, हर धर्म ने दिया है प्रकृति को महत्व 

Shankar Suwan Singhशंकर सुवन सिंह Updated Tue, 21 Jan 2020 12:11 PM IST
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पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य।
पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य। - फोटो : फाइल फोटो
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पर्यावरण  शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। "परि"+"आवरण"  परि का तात्पर्य जो हमारे चारों ओर है" और आवरण"का तात्पर्य जो घेरा हुआ अर्थात् वह "परिवेश" जिसमें जीव रहते हैं। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं।

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पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य। जल, जंगल और जमीन विकास के पर्याय हैं। जल, जंगल और जमीन जब तक है तब तक मानव का विकास होता रहेगा। हम जो छोड़ते हैं उसको पेड़ -पौधे लेते हैं और जो पेड़- पौधे छोड़ते हैं उसको हम लेते हैं। जल, जंगल और जमीन से ही जीवन है। जीवन ही नहीं रहेगा तो विकास यानी की बिजली,सड़क,आदि किसी काम के नहीं रहेंगे।

समुदाय का स्वास्थ्य ही राष्ट्र की सम्पदा है
यह कहने में आश्चर्य नहीं होगा कि समुदाय का स्वास्थ्य ही राष्ट्र की सम्पदा है। जल, जंगल और जमीन को संरक्षित करने लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरुरी है। मन आतंरिक पर्यावरण का हिस्सा है। जल, जंगल और जमीन बाह्य (बाहरी) पर्यावरण का हिस्सा है। हर धर्म ने माना प्राकृतिक विनाश से विकास संभव नहीं है। 

वैदिक संस्कृति का प्रकृति से अटूट सम्बन्ध है। वैदिक संस्कृति का सम्पूर्ण क्रिया-कलाप प्राकृत से पूर्णतःआबद्ध है। वेदों में प्रकृति संरक्षण अर्थात् पर्यावरण से सम्बंधित अनेक सूक्त हैं। वेदों में दो प्रकार के पर्यावरण को शुद्ध रखने पर बल दिया गया है–आन्तरिक एवं बाह्य। सभी स्थूल वस्तुएं बाह्य एवं शरीर के अन्दर व्याप्त सूक्ष्म तत्व जैसे मन एवं आत्मा आन्तरिक पर्यावरण का हिस्सा है। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान केवल बाह्य पर्यावरण शु्द्धि पर केन्द्रित है। वेद आन्तरिक पर्यावरण जैसे मन एवं आत्मा की शुद्धि से पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करता है। 

बाह्य पर्यावरण में घटित होने वाली सभी घटनाएं मन में घटित होने वाले विचार का ही प्रतिफल हैं। भगवद् गीता में मन को अत्यधिक चंचल कहा गया है-चंचलं ही मनः ड्डष्ण ……। (भगवद् गीता ६:३४)। बाह्य एवं आंतरिक पर्यावरण एक दूसरे के अनुपाती हैं, जितना अधिक आन्तरिक पर्यावरण विशेषतया मन शुद्ध होगा, बाह्य पर्यावरण उतना अधिक शुद्ध होता चला जाएगा। वेदों के अनुसार बाह्य पर्यावरण की शुद्धि हेतु मन की शुद्धि प्रथम सोपान है। ऐतेरेयोपनिषद् के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पांच तत्वों पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि को मिलाकर हुआ है। इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि। (३:३)। इन्हीं पांच तत्वों के संतुलन का ध्यान वेदों में रखा गया है। इन तत्वों में किसी भी प्रकार के असंतुलन का परिणमा ही सूनामी, ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खल, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाएं हैं। वेदों में प्रकृति के प्रत्येक घटक को दिव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। 

 

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