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एड्स के खिलाफ जंग में बाजार कस रहा है कमर, ऐसे बन रही प्लानिंग

Dayashankar shukla दयाशंकर शुक्ल सागर
Updated Fri, 18 Oct 2019 07:52 AM IST
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hiv aids challenges and treatment aids symptoms problems and solutions
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी नई एड्स गाइडलाइन में 'टैस्ट एंड ट्रीटमेंट' का ऐलान कर दिया है। - फोटो : सोशल मीडिया

एचआईवी संक्रमण रोकने के बजाए एड्स के खिलाफ लड़ रही अन्तराष्ट्रीय संस्थाएं दवा कंपनियों के हाथ का खिलौना बन गई हैं। अन्तराष्ट्रीय कान्फ्रेंसों में अब एड्स से अब बचाव पर कोई बात नहीं करता। कोई कंडोम की बात नहीं करता और न ही मनुष्य को नैतिक रूप से सबल बनाने की बात करता है।

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दरअसल, दवा हर चीज का इलाज है। जाहिर है इससे दवा कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें। एड्स न हो इसके लिए भी एक दवा आ गई है, लेकिन उसका असर सिर्फ चौबीस घंटे रहता है। इसे 'प्रेप पिल' का नाम दिया गया है। ये दवा खासकर यौन कर्मियों के लिए है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी नई एड्स गाइडलाइन में 'टैस्ट एंड ट्रीटमेंट' का ऐलान कर दिया है। यानी जांच करो और तुरंत इलाज शुरू कर दो। चाहे मरीज को तुरंत इलाज की जरूरत हो या नहीं हो।  

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सरकार की प्राथमिकता में गर्भवती महिलाएं, पन्द्रह साल से कम उम्र के बच्चे और टीबी ग्रस्त एचआईवी मरीज हैं। - फोटो : फाइल फोटो

एड्स से लड़ने वालों के लिए नारा 
एड्स से लड़ने वालों का अब नया नारा है- 'एड्स अब डैथ सेंटस यानी मृत्यु दण्ड नहीं।' एड्स रोग को मैनज किया जा सकता है ठीक वैसे जैसे डॉक्टर उच्च रक्तचाप और डायबटीज का प्रबंधन करते हैं। जैसे डायबटीज के साथ इंसान लंबी उम्र जी सकता है, वैसे ही एड्स के साथ भी जिन्दगी बसर कर सकता है। इसे एड्स के साथ जीना कहा जा रहा है।
 
तमाम ताजा शोध पत्रों से यह बात सामने आई कि एंटीरिटरोवायरल थेरेपी यानी एआरटी एड्स रोगियों के लिए वरदान साबित हो रही है। यह दवा वायरस को तो खत्म नहीं करती, लेकिन एचआईवी ग्रस्त इंसान की जिन्दगी आसान कर सकती है और मरीज के जिस्म में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार सीडी4 काउंट को नीचे गिरने से रोकती है। शर्त है कि यह दवा हर रोज ली जाए।

पूरी दुनिया में कोई 39 मीलियन लोग एचआईवी से ग्रस्त हैं। इनमें से सिर्फ 20 मिलियन लोगों को ही ये दवा मिल पा रही है। भारत में कुल 21 लाख एचआईवी ग्रस्त मामले हैं जिनमें करीब 14 लाख पंजीकृत हैं।

सरकार की प्राथमिकता में गर्भवती महिलाएं, पन्द्रह साल से कम उम्र के बच्चे और टीबी ग्रस्त एचआईवी मरीज हैं। अभी एटीआर क्लीनिकों पर यह दवा सिर्फ उन एचआईवी ग्रस्त मरीज को दी जाती है जिनका सीडी4 काउंट 350सेल्स से नीचे है।

पिछले महीने भारत सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर सीडी4 काउंट 500  सेल्स वाले मरीजों को भी यह दवा देने का फैसला किया है। अभी कम बजट के कारण भारत केवल 9.5 लाख मरीजों को दवा के दायरे में ला पाया हैं। जल्द ही इस कार्यक्रम में डेढ़ लाख मरीज और जुड़ जाएंगे।
 

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लोग एड्स को लेकर नहीं हैं जागरूक - फोटो : फाइल फोटो

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?  
विशेषज्ञ बताते हैं कि एचआईवी पाजिटिव होने की पुष्टि के बाद एड्स के लक्षण सामने आने में तीन से पांच साल लगते हैं। कई लोग तो जीवन भर एचआईवी पाजिटिव रहते हैं और रोग के लक्षण सामने नहीं आते। उन्हें दवा की कोई जरूरत नहीं होती।

यही नहीं जिस्म में सीडी4 ब्लड सेल जब 200 काउंट से नीचे आता है तब तकनीकी तौर पर मरीज एड्स रोगी कहलाता है। जिससे तब इलाज अनिवार्य हो जाता है, लेकिन नई गाइडलाइन कहती है कि एचआईवी का पता चलते ही दवा देना शुरू कर दो। गरीब और विकासशील देशों की सरकारों के पास इतना पैसा नहीं कि वह ऐसे इलाज पर अंधाधुंध पैसा खर्च करना शुरू कर दें जिसकी मरीज को तत्काल जरूरत नहीं।

एड्स के थर्ड लाइन ट्रीटमेंट में प्रति मरीज प्रति वर्ष एक लाख का सरकारी खर्च है। निजी अस्पतालों में यह खर्च कई लाख में है।  भारत में हर साल एचआईवी के कोई दो लाख नए मरीज जुड़ रहे हैं। गरीब देशों के पास टीबी, कालाजार मलेरिया जैसे दूसरे अवसरवादी संक्रमक रोग हैं जिससे ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ के लिए बजट जीडीपी का एक फीसदी हो वो कैसे इन महंगी दवाओं को मुफ्त बांट पाएगा।  
 

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मार्च 2016 में नेशनल सेक्स वर्कर एचआईवी प्लान 2016-2019 जारी किया गया। - फोटो : फाइल फोटो

क्या कहते हैं एड्स संगठन?
एड्स संगठनों का कहना है कि एड्स के खिलाफ जंग तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक सबको इलाज नहीं मुहैया करा दिया जाता। बचाव पर और पैसा खर्च करने की जरूरत है। एड्स के नाम पर मनमानी फंडिंग का नतीजा साउथ अफ्रीका में देखने को मिला।

यहां की सरकार ने मार्च 2016 में नेशनल सेक्स वर्कर एचआईवी प्लान 2016-2019 जारी किया। इसे वह इनोवेटिव अप्रोच का नाम देती है। इसके तहत वह अपने यहां तीन हजार सेक्स वर्कर को जिन्हें एचआईवी नहीं है एन्टीरियोवायरल पिल का काम्बीनेशन बांट रही है। इसे प्रेप यानी प्री-एक्सपोजर प्रोफलैक्सिस। ये गर्भ निरोधक पिल की तरह सिर्फ चौबस घंटे काम करती है।

यानी साउथ अफ्रीका की सरकार ने अपने एचआईवी नेगेटिव सेक्स वर्करों को कंडोम की अनिवार्यता से मुक्ति दे दी है। मजे की बात यह है कि ओरल प्रेप पिल को डब्लूएचओ ने अभी तक मान्यता नहीं दी है और न ही इस बात की कोई वैज्ञानिक प्रमाण मिला है कि इस पिल के खा लेने से एचआईवी वायरस हमला नहीं करेगा, जिस रोग का बचाव सस्ते कंडोम से हो सकता है उसके लिए दवा की जरूरत क्यों हो? इस सवाल पर कोई बात नहीं करता।

बताते चलें कि अकेले साउथ अफ्रीका को एचआईवी और टीबी के लिए 314.4 मीलियन यूएस डालर की ग्रांट मिलती है। तो देखिए हम किस दिशा में जा रहे हैं। आत्मसंयम और समझदारी एड्स से अचूक बचाव है। लेकिन बाजारवाद दूसरी तरह से काम करता है। वह पहले जरूरत पैदा करता है फिर वहां अपना साम्राज्य खड़ा कर लेता है। एड्स के नाम पर भी दुनिया में अब यही सब शुरू हो गया है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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