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विश्व साहित्य का आकाश: नोबेल पुरस्कार विजेता एन कार्सन की किताब- ‘द जेंडर ऑफ साउंड’

Sun, 18 Oct 2026 12:09 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sun, 18 Oct 2026 12:09 PM IST
सार

एन कार्सन ने खूब शोध और तार्किकता के साथ, एक सिटिंग में पढ़े जाने योग्य, बहुत शक्तिशाली निबंध ‘द जेंडर ऑफ साउंड’ लिखा है। यह मुख्य रूप से प्राचीन ग्रीक मिथक पर केंद्रित है।

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history of world literature The Gender of Sound Book by Anne Carson
किताबों की दुनिया - फोटो : adobestock

विस्तार

प्रकृति ने स्त्री-पुरुष दोनों को आवाज उत्पन्न करने की शक्ति दी है। हम सब यह देखते-सुनते और अनुभव करते रहते हैं, लड़कियों-औरतों की आवाज दबा दी जाती है। कई बार पैदा होते उनके कंठ से जो पहला स्वर फूटता है, उसे घोंट कर समाप्त कर दिया जाता है। बच गई, तो जोर से बात नहीं करना, जोर से हंसना नहीं की नसीहत दी जाती है। घुट-घुट कर मर जाओ, जोर से रोना भी नहीं।

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इंद्रप्रस्थ सभा में दुर्योधन की स्थल-जलभ्रांति देखकर जब द्रोपदी के सात खड़ी उनकी दासियां हंस पड़ीं, तब द्रोपदी उस पर हंस रही है, ऐसा सोच कर दुर्योदन अपमानित होता है, बाद में भरी उसका वस्त्रहरण करके उससे प्रतिकार लेता है। स्त्री की आवाज को सब देशों में, सब काल में दबाने का भरपूर प्रयास हुआ है।
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इस धारणा को नई दृष्टि से किसी ने देखा है, बात जान कर मैं चकित हुई, जब मैंने एन कार्सन का निबंध ‘द जेंडर ऑफ साउंड’ पढ़ा (1992)। यह ‘ग्लास, आयरनी एंड गॉड’ का हिस्सा है। वे यूरोपीय मिथकों से लेकर ब्रिटिश पार्लियामेंट तक से स्त्री की आवाज रोकने, मजाक उड़ाने, रिडिक्यूल करने के उदाहरण देती है।
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एन कार्सन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार

मैं एन कार्सन की बात कर रही हूं, जिन्हें 8 अक्टूबर 2026 को नोबेल समिति ने 'साहसी और कल्पनाशील रचनाओं', शास्त्रीय परंपरा के साथ एक खिलंदड़ा, किंतु गंभीर संवाद करते हुए समकालीन साहित्य के नए रूप निर्मित करने हेतु साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया है।

इस बार भी नोबेल समिति ने मुझे चौंकाया है। अच्छी बात रही, मैंने ‘साहसिक और अभिनव रचनाधर्मी’ एन कार्सन का नाम सुना था और उनकी कुछ किताबें मेरी लाइब्रेरी में थीं। उनका अध्ययन नहीं किया था। तत्काल उन्हें खोज निकाला।

नोबेल मिलते मीडिया पर उनसे संबंधित सूचनाओं की बाढ़ आ गई। मेरा ध्यान नोबेल साइट पर रहा। उनके इंटरव्यू को देखा, उनके कुछ छोटे काम पर नजर डाली। चूंकि मैं लेखक की कम-से-कम एक किताब पढ़ कर ही कुछ लिखती हूं, एक शीर्षक ने आकर्षित किया। अत: ‘द जेंडर ऑफ साउंड’ तथा उनके साक्षात्कार को जितना और जैसा समझा उसी पर ही खुद को केंद्रित रख अपनी बात कहूंगी।

गद्य पर केंद्रित रहने का काम करती हूं, अत: कवयित्री के नाम से मशहूर एन कार्सन को साक्षात्कार में ‘खुद को कवि कहने में हमेशा संकोच किया है’ पढ़ा, तो थोड़ा आगे बढ़ी। पाया, सच में वे किसी एक खास खांचे में फिट नहीं होती है।

पेट पोछनी एन कार्सन का जन्म 21 जून 1950 को टोरंटो में हुआ। गृहणी मां मार्ग्रेट और बैंकर पिता रॉबर्ट की वे अंतिम संतान हैं। टोरेंटों डोमिनियन बैंकर का तबादला बराबर होता, अत: एन का बचपन स्टोनी क्रीक, पोर्ट होप, टिमिंस जैसे छोटे स्थानों पर बीता। दिलचस्प बात है, उन्होंने हाई स्कूल यानी 13वीं क्लास में ग्रीक भाषा पढ़नी शुरू की, उनकी जिंदगी बदल गई। स्कूल में ग्रीक नहीं पढ़ाई जाती थी।

टीचर मिसेज कोवान लैटिन पढ़ाती थीं, ग्रीक भी जानती थीं, जब पता चल बच्ची का लगाव ग्रीक से है, तो उसे लंच-टाइम में ग्रीक पढ़ाने लगीं। उनसे एन ने प्राचीन ग्रीक क्रांतिकारी कवि सैफो को पढ़ा। उसी पर उन्होंने पीएचडी की। बाद में थीसिस उनकी पहली किताब ‘इरॉस द बिटरस्वीट’ बनी।

हत्भाग्य! काश! ‘ग्रीक लोग अत्यधिक धार्मिक लोग थे, उनके सैकड़ों देवता थे, धार्मिक विचार उनके जीवन में रचे-बसे थे।’ कहने वाली, चीनी और जापानी कविताओं को संतोषजनक मानने वाली, कार्सन भारत को भी जान पातीं, पता नहीं, तब उनका विचार क्या होता।

‘मैं किसी चीज के बारे में क्या सोचती हूं, यह जानने के लिए लिखती हूं।’ कहने वाली एन कार्सन ने स्वीकारा, मैं दुनिया की हर भाषा नहीं जानती- शायद अगर मैं संस्कृत और चीनी जानती, तो अलग तरह से सोचती- लेकिन ग्रीक में कुछ ऐसा है, जो किसी भी आधुनिक भाषा की तुलना में शब्दों की गहराई में अधिक उतरता है।’

एन कार्सन ने खूब शोध और तार्किकता के साथ, एक सिटिंग में पढ़े जाने योग्य, बहुत शक्तिशाली निबंध ‘द जेंडर ऑफ साउंड’ लिखा है। यह मुख्य रूप से प्राचीन ग्रीक मिथक पर केंद्रित है। कुछ पंक्तियां देखिए, ‘हरेक आवाज जो हम निकालते हैं, हमारे व्यक्तित्व का एक अंश है। यह बिल्कुल निजी आंतरिक है, फिर भी बाह्य प्रक्षेपित अंतर का एक टुकड़ा पब्लिक की दिशा में है। पितृसत्तात्मक संस्कृति का कार्य ऐसे प्रक्षेपण को प्रतिबंधित करने का है, जो मानवता को- जो खुद को प्रतिबंधित कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते- द्वै-जीव में विभाजन तय करता है।’

वे प्राचीन यूरोपीय मिथक से ‘गॉर्गन’ (संस्कृत के पशु ध्वनि ‘गर्जन’ से उत्पन्न शब्द), हेलेन, सायरन, कसांड्रा, आर्तेमिस, एफ्रिडिटी के उदाहरण देती हैं। मार्ग्रेट थेचर, गर्ट्रुड स्टेन तक पश्चिमी संस्कृति में स्त्री की आवाज को राक्षसी, मौत, मानसिक बीमारी के रूप में प्रक्षेपित करने की बात करती हैं।

ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रथम स्त्री सदस्य नैन्सी एस्टर की आवाज को उनके सहयोगी सर हेनरी शैनन उष्णता, मौलिकता, बद्तमिजी का अजीज मिश्रण कहते, वे आगे कहते हैं, वह सिरकटी मुर्गी की तरह झपटती है...खून की गंध का मजा लेती हुई...पागल चुड़ैल’ इन्हीं नैन्सी की आवाज पाने केलिए थैचर ने स्वर का प्रशिक्षण लिया और साथियों से ‘एटिला द हूण’ का खिताब पाया। स्त्री की आवाज को पागलपन, क्रूर कहना बहुत सामान्य है। सब संस्कृतियों में ऐसा होता है? कहना मुश्किल है।

लेख का अंतिम मानीखेज पढ़ें।

भारत की परम्परा निराली रही है। भद्रकाली न केवल हंसती है, वरन अट्टहास (महोघोररावा... चतुर्दिक्षुशब्दायमाना) करती है। और स्त्री-पुरुष दोनों उसे पूजते हैं।

समय के साथ थोड़ा परिवर्तन देखने में आया है। बिना किसी शर्म या हिचक के अपने आसपास आज हम लड़कियों-औरतों को बिना किसी शर्म या हिचक के खूब जोर-जोर से बात करते, खुल कर हंसते देखते हैं। प्रश्न यह भी है, यह कितने स्थानों पर हो रहा है।

हर सुबह उठकर, टहलने वाली कार्सन की उपरोक्त किताब के अलावा ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड’, ‘एंथ्रोपोलॉजी ऑफ वॉटर’, ‘इकॉनमी ऑफ द अनलॉस्ट’, ‘द ब्यूटी ऑफ द हजबैंड: ए फिशनल एसे इन 29 टंगोज’ आदि प्रकाशित हैं। पार्किंसन से जूझती एन कार्सन के नोबेल लेक्चर की प्रतीक्षा है। खुद को विशेष रूप से उलझी हुई मानने वाली एन कार्सन का कहना है, ‘मैं अपने मरने के पंद्रह मिनट बाद प्रसिद्ध होऊंगी।’ वे विश्वविख्यात हो गई हैं। उन्हें बधाई!



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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