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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: रिचर्ड एटनबरो- बहुमुखी प्रतिभा के धनी

Fri, 29 Sep 2023 05:30 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Fri, 29 Sep 2023 05:30 PM IST
सार

रिचर्ड एटनबरो ने चार्ली चैपलिन की जीवनी परदे पर ‘चैपलिन’ नाम से उतारी। उन्होंने इस फिल्म को निर्देशित तथा प्रड्यूस किया। 1977 में रिचर्ड ने चार बाफ़्टा पुरस्कारों से सम्मानित फिल्म ‘ए ब्रिज टूफार’ बनाई लेकिन उनको विश्व प्रसिद्धि मिली फिल्म ‘गांधी’ से।

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Richard Attenborough - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

रिचर्ड एटनबरो के काम और नाम से भारतीय दर्शक बखूबी परिचित हैं। 1977 में सत्यजित राय द्वारा निर्देशित फिल्म (मूल कहानी- प्रेमचंद) ‘शतरंज के खेलाड़ी’ के ऑटरम को कौन भूल सकता है। यदि आपने यह फिल्म नहीं देखी है, तो विश्व प्रसिद्ध, आठ-आठ ऑस्कर से नवाजी ‘गांधी’ फिल्म तो अवश्य ही देखी होगी। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के ऑटरम ही ‘गांधी’ (1982) फिल्म के निर्देशक हैं। आज इन्हीं निर्देशक, मंच-फिल्म एक्टर, लेखक, प्रड्यूसर रिचर्ड एटनबरो की बात करती हूं।

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दो ऑस्कर पुरस्कारों से विभूषित रिचर्ड एटनबरो का जन्म 29 अगस्त 1923 को यूनाइटेड किंग्डम के कैम्ब्रिज में हुआ था। यदि वे जीवित होते तो अपना सौंवा जन्मदिन मना रहे होते। मां का नाम मेरी तथा पिता का नामफ्रेडरिक लिवाई एटनबरो था। पिता यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रिंसिपल थे। रिचर्ड ने रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामैटिक आर्ट से प्रशिक्षण ग्रहण किया।
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उनके फिल्मी जीवन का प्रारंभ अभिनय से हुआ। उन्होंने 1942 में ‘व्हिच वी सर्व’ में एक भगौड़े नाविक की भूमिका की थी। बाद में उन्होंने ‘डल्सिमर स्ट्रीट’, ‘ऑपरेशन डिसास्टर’, ‘ब्राइटन रॉक’, ‘गन्स एट बैटासी’, ‘द ग्रेट एस्केप’, ‘द सैन्ड पेबल्स’, ‘डॉक्टर डूलिटिल’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘जुरासिक पार्क’ आदिफिल्म में भूमिकाएं की।
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उन्हें ‘द सैन्ड पेबल्स’, ‘डॉक्टर डूलिटिल’ केलिए यानि दो बार गोल्डेन ग्लोब अवॉर्ड मिला। उन्होंने नाटकों में भी भूमिकाएं कीं। लंदन वेस्ट एंड में अगाथा क्रिस्टी के ‘माउसट्रैप’ नाटक में उन्होंने एक समय काम किया, यह सबसे अधिक बार खेले जाने वाला नाटक आज तक जारी है। फिर रिचर्ड एटनबरोफिल्म निर्देशन की ओर मुड़ गए और इस दिशा में चलते चले गए। फीचर फिल्म में सबसे पहले उन्होंने म्युजिकल ‘ओह! व्हाट ए लवली वार’ बनाई। उन्होंने ऐतिहासिक बायोपिक बनाई।

तीन ऑस्कर नामांकित ‘यंग विन्सटन’

रिचर्ड एटनबरो ने 1972 में तीन ऑस्कर नामांकित ‘यंग विन्सटन’ बनाई, इस फिल्म का सह-लेखन स्वयं विन्सटन चर्चिल ने किया है। फिल्म भविष्य के इस विश्व राजनीतिज्ञ के बचपन को दिखाती है, जिसमें पारिवारिक जटिल संबंध और उनसे जुड़े अनुभवों को प्रदर्शित किया गया है। साइमन वार्ड ने युवा विन्सटन की भूमिका की है, पिता लॉर्ड रैंडोल्फ चर्चिल के रूप में रॉबर्ट शॉ हैं।

1977 में रिचर्ड ने चार बाफ़्टा पुरस्कारों से सम्मानित फिल्म ‘ए ब्रिज टूफार’ बनाई लेकिन उनको विश्व प्रसिद्धि मिली फिल्म ‘गांधी’ से। वर्षों की मेहनत के प्रतिफल इस ऐतिहासिक गाथा के सामने गांधी पर भारत में बनी सब फिल्में उन्नीस ठहरती हैं। उन्होंने सदी के अंत में ‘ग्रे आउल’ (1999) नाम से एक और बायोपिक बनाई, जिसमें पीयर्स ब्रोसनान ने अभिनय किया है।

रिचर्ड एटनबरो ने चार्ली चैपलिन की जीवनी परदे पर ‘चैपलिन’ नाम से उतारी। उन्होंने इस फिल्म को निर्देशित तथा प्रड्यूस किया। इसी तरह उन्होंने ‘शैडोलैंड्स’ नाम से भी एक जीवनी बनाई। ‘चैपलिन’ फिल्म में उम्रदराज चार्ली चैपलिन अपने एडिटर के साथ अपनी आत्मकथा पर विमर्श कर रहा है, इस सिलसिले में वह अपनी गरीबी, बचपन, अपनी ख्याति की चर्चा करता है, वह यह भी बताता है कि कैसे ‘लिटिल ट्रैम्प’ के अन्वेषण के साथ उसका जीवन बदल गया।

एन्थनी हॉपकिन्स ने रिचर्ड के साथ पांच फिल्मों में काम किया है, ‘चैपलिन’ उनमें से एक है। अन्य फिल्में हैं, ‘शैडोलैंड्स’, ‘ए ब्रिज टूफार’, ‘यंग विन्सटन’ तथा ‘मैजिक’। उन्होंने सफल ब्रॉडवे म्युजिकल को भी फिल्म में ढाला है, ‘ए कोरस लाइन’, ‘क्राईफ्रीडम’ ऐसी ही फिल्में हैं।

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आठ-आठ ऑस्कर से नवाजी ‘गांधी’ फिल्म - फोटो : Pixabay

2007 की फिल्म ‘क्लोजिंग द रिंग’

बहुत सारे लोगों की भांति एटनबरो के जीवन पर भी द्वितीय विश्वयुद्ध का गहन प्रभाव रहा है। वे बार-बार अपनी फिल्मों में इसकी ओर मुड़ते हैं। ‘व्हिच वी सर्व’ तथा ‘द ग्रेट एस्केप’ ऐसी ही फिल्में हैं। 2007 में ‘क्लोजिंग द रिंग’ उनकी निर्देशित अंतिम एवं एक ऐसी ही फिल्म है। ऐसा ही कदाचित होता है जब रिचर्ड एटनबरो फिल्म बनाएं और वह विश्व के बड़े सिने-पुरस्कार के लिए नामित न हो।

करीब दो घंटे की शिरली मैक्लैन, क्रिस्टोफर प्लमर, डायलैन रॉबर्ट्स द्वारा अभिनीत इस फिल्म को दो पुरस्कारों हेतु नामांकित किया गया। फिल्म अतीत को उधेड़ती है। इस फिल्म में एक युवा (मार्टिन मैकैन) को उत्तरी आयरलैंड के बेलफ़ास्ट में एक अमेरिकन फाइटर प्लेन के मलबे से सोने की एक अंगूठी मिलती है। युवा उस अंगूठी को सही व्यक्ति तक पहुंचाने केलिए अमेरिका चल पड़ता है। यात्रा है, तो, तमाम रहस्य खुलते जाते हैं। असल में एक आदमी के प्रेम की निशानी सही व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक अमेरिकन बम वर्षक, मरने से पहले अपनी प्रेमिका (शर्ली मैक्लेन) तक यह अंगूठी पहुंचाना चाहता था। प्रेमिका कोई और नहीं उसके सबसे करीबी दोस्त की पत्नी है, यह व्यक्ति अपना प्रेम कभी प्रकट न कर पाया था। 

फिल्म निर्देशन के साथ-साथ रिचर्ड एटनबरो ने लेखन भी किया। उन्होंने अपनी दोस्त एवं सहकर्मी डायना हॉकिंग्स के साथ मिलकर ‘एंटायरली अप टू यू, डार्लिंग लिखा है। इसमें उन्होंने दोनों की अनोखी जिंदगी तथा बेमेल दोस्ती को मजेदार तरीके से व्यक्त किया है।

द्वितीय विश्वयुद्ध में रॉयल एयरफोर्स में अपनी सेवा देने वाले एटनबरो कहते हैं कि सिनेमा ने पोर्नोग्राफी के अत्याचार को बढ़ावा दिया है और उन्हें इससे नफरत है। वे सबको इसका जिम्मेदार मानते हैं, जिसमें वे खुद को भी शामिल करते है। वे ‘राडा’, ‘कैपिटल रेडियो’, ‘बाफ़्टा’, गांधीफाउंडेशन’, ‘द ब्रिटिश नेशनलफिल्म एंड टेलिविजन स्कूल’ आदि कई संस्थाओं के प्रमुख हैं। कई संस्थाओं के पैटर्न भी हैं। एक समय ससेक्स यूनिवर्सिटी के चांसलर भी थे। चेल्सीफुटबॉल क्लब के आजीवन सपोर्टर हैं। 

रिचर्ड एटनबरो समाज सेवा से भी जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिल कर ‘रिचर्ड एंड शैला एटनबर्ग विजुअल आर्ट्स सेंटर’ की स्थापना की है। स्विटजर्लैंड में अपनी बेटी की स्मृति में ‘जेन क्रियेटिव सेंटरफॉर लर्निंग’ भी खोला है। बेटी 2004 में सुनामी के दौरान गुजरी थी। इस सुनामी में न केवल उनकी बेटी गई वरन उसके साथ उनकी नतनी और बेटी की सास भी बह गईं।

जब शिक्षा की बात आती है तो उनके लिए रंग, नस्ल, धर्म कोई मायने नहीं रखता है। अपने इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने ‘क्राईफ्रीडम’फिल्म बनाई। इन्हीं उदारवादी विचारों तथा कार्यों के लिए उन्हें ब्रिटिश एम्पायर का कमान्डर ऑफ द ऑर्डर बनाया गया तथा नाइटहुड भी प्रदान की गई।

गंभीर फिल्में बनाने के साथ उन्होंने कई कॉमेडी फिल्मों में काम किया है। ‘प्राइवेट’स प्रोग्रेस’, ‘आई’एम ऑलराइट जैक’ उनमें से कुछ हैं। बतौर प्रड्यूसर उन्होंने ‘द लीग ऑफ़ जेन्टलमैन’, ‘दि एंग्री साइलेंस’, ‘विसल्स डाउन द विंड’ आदिफिल्में प्रड्यूस की हैं। 24 अगस्त 2014 को गिरने के बाद लगी चोटों से रिचर्ड एटनबरो की लंदन में हुई मृत्यु हुई।




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यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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