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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: राधु करमाकर की 'तीसरी आंख'

Sun, 07 Jan 2024 09:32 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sun, 07 Jan 2024 09:32 PM IST
सार

अपने जन्मदिन से कुछ पहले 5 अक्टूबर 1993 को एक सड़क दुर्घटना में 77 साल की उम्र में राधु की मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनकी पत्नी वीणा ने अपने बड़े बेटे के सहयोग से राधु के कागजों, डायरियों को छान कर उनकी जीवनी तैयार की, जिसे राजकमल प्रकाशन ने उनकी आत्मकथा के नाम से प्रकाशित किया है। इस जीवनी का हिन्दी रूपांतरण विनोद दास ने ‘कैमरा: मेरी तीसरी आंख’ नाम से किया है। 

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history of world cinema Radhu Karmakar Indian cinematographer and director
राधु करमाकर - फोटो : social media

विस्तार

सिनेमा को परदे पर लाता है कैमरा। कैमरा हर दृश्य को कैद करता है और फिल्म को संभव बनाता है। फिर भी जब हम सिनेमा की बात करते हैं तो सिर्फ निर्देशक का नाम लेते हैं, अभिनेता-अभिनेत्री का नाम लेते हैं। सामान्य दर्शक को बस सिनेमा देखने से मतलब होता है, सिनेमा के पीछे की बातों से खास मतलब नहीं होता है, वे उसके विषय में शायद ही कुछ जानते हों। कैमरामैन का काम कितना परिश्रम और निष्ठा की मांग करता है, यह लोगों के मन में शायद ही आता है। 

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आज मैं एक ऐसे सिनेमाटोग्राफर की बात करने जा रही हूं, जिसने अर्श से फर्श तक का सफर अपनी मेहनत और लगन से पूरा किया। यह न केवल फोटोग्राफर था, वरन इसने फिल्म भी निर्देशित की। हम लोगों में से अधिकांश ने ‘जिस देश में गंगा बहती है’ फिल्म देखी है। इस फिल्म का निर्देशन इसी सिनेमाटोग्राफर ने किया था। हुआ न आश्चर्य! क्योंकि सामान्य दर्शक के लिए यह राज कपूर की फिल्म मात्र है।
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राज कपूर इस फिल्म के नायक थे, उन्होंने इसे प्रड्यूस भी किया था मगर इसके निर्देशक राज कपूर नहीं, राधु करमाकार थे। यही एकमात्र फिल्म थी जो उन्होंने निर्देशित की वरना वे सिनेमाटोग्राफर थे। राज कपूर की कई फिल्मों का उन्होंने ही फिल्मांकन किया था। वे स्वयं को निर्देशक नहीं, कैमरामैन ही मानते थे तभी तो कैमरा को अपनी तीसरी आंख कहते थे। उनकी किताब का नाम भी है, ‘कैमरा: मेरी तीसरी आंख’।

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गरीबी में गुजरा बचपन

कैमरामैन राधु करमाकर अविभाजित भारत के बंगाल में 14 अक्टूबर 1916 को जन्मे थे। उनका बचपन भयंकर गरीबी में गुजरा।

अपने जन्मदिन से कुछ पहले 5 अक्टूबर 1993 को एक सड़क दुर्घटना में 77 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी वीणा ने अपने बड़े बेटे के सहयोग से राधु के कागजों, डायरियों को छान कर उनकी जीवनी तैयार की, जिसे राजकमल प्रकाशन ने उनकी आत्मकथा के नाम से प्रकाशित किया है। इस जीवनी का हिन्दी रूपांतरण विनोद दास ने ‘कैमरा: मेरी तीसरी आंख’ नाम से किया है। 


राधु करमाकर का पूरा नाम राधिका जीवन करमाकर था। उनके वैष्णव माता-पिता ने यह नाम रखा था, लेकिन राजकपूर को लगा कि यह नाम काफी दकियानूसी है, साथ ही बहुत लंबा भी, अत: उन्होंने इसे छोटा करके राधु बना दिया और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए। स्वर्णकारों के परिवार की यह पेटपोछना संतान शुरू से शारीरिक रूप से कमजोर थी। इनके पिता का व्यवसाय कलकत्ता में भी था, जिसे राधु के बड़े भाई देखते थे।

घर की माली हालत अच्छी न थी, अत: राधु सातवीं तक पढ़ाई करने के बाद कुछ कमाई करने कलकत्ता आ गए। बचपन से कई बार उन्होंने मौत का सामना किया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। राधु ने चौदह वर्ष की उम्र में पहली बार एक मूक फिल्म देखी। यह फिल्म जयदेव के जीवन पर आधारित थी। उसी समय कहीं फिल्म से जुड़ने के बीज उनके भीतर पड़ गए।

history of world cinema Radhu Karmakar Indian cinematographer and director
सिनेमा - फोटो : Instagram

कलकत्ते में काफी संघर्ष के बावजूद वे अपने खानदानी पेशे में मन न लगा सके और जतिन दास के शिष्य बने। यह एक रोचक कथा है, जो काम के प्रति उनकी दृढ़ता प्रदर्शित करती है। उन दिनों विशेषज्ञों में अपनी कला को छिपाकर रखने की प्रवृति थी और वे अपने सहयोगियों से बड़ा रूखा और कठोर व्यवहार करते थे।

घर वालों के न चाहने के बावजूद उन्होंने एक फिल्म लैब में काम शुरू किया। आश्चर्य उनके पिता ने आपत्ति न की। उन दिनों निगेटिव को हाथ से धोया जाता और काम करने का स्थान बहुत बुरी स्थिति में होता था। अत: लोग जल्द ही बीमार पड़ते और अक्सर मर जाते थे। ऐसे ही एक व्यक्ति द्वारा रिक्त स्थान पर राधु को काम मिला। 

भागवत वाशीकर से सीखा कैमरा चलाना

इस काम को करते हुए वे मौका मिलते भाग कर स्टूडियो जाते और कैमरा संचालन ध्यान से देखते और जब कोई नहीं होता तो कैमरा भी परखते। उनकी यह चोरी एक दिन पकड़ी गई और कैमरामैन भागवत वाशीकर ने उनकी लगन से प्रभावित हो उन्हें सिखाना स्वीकार किया। इस तरह राधु का प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ। वैसे सैद्धांतिक शिक्षा का उन्हें अवसर नहीं मिला। वाशीकर ने जो कृपा राधु पर की वे उसे कभी नहीं भूले और एवज में उन्होंने जरूरत पड़ने पर दूसरों की सहायता की।
 
इसके बाद करीब छ: साल उन्होंने जतीन दास की शागिर्दी की। राधु उस जमाने के व्यक्ति थे, जो एहसान कभी नहीं भूलते हैं और जिसके साथ जुड़ते हैं, उसके प्रति सदैव वफादार बने रहते हैं। उन्हें कई अन्य स्थानों से बेहतर प्रस्ताव मिले मगर वे जतीन दास के प्रति वफादार बने रहे। इसी तरह जब वे राज कपूर से जुड़े तो उनके प्रति भी ईमानदार रहे और राज कपूर के मर्दवादी तथा सामंती रवैये के बावजूद उनसे एक लंबे समय तक जुड़े रहे।

राज कपूर को वे एक बहुत बड़ा फिल्म जानकार, महान निर्देशक और दिलदार मानते हैं, साथ ही उनकी कमियों का भी उल्लेख करते हैं। वे राज कपूर के सबसे विश्वस्त सिनेमाटोग्राफर थे।

विभिन्न विचार-पद्धतियों और जीवन-शैलियों को राधु करमाकर प्रेम भाव से देखते थे, मगर गलत को गलत कहने में हिचकते नहीं थे इसीलिए ईमानदार लोग उन्हें पसंद करते थे और इसी कारण वे कई भिन्न विचार वाले लोगों के साथ काम कर सके। वे आदमी पहचानना जानते थे और लोगों के गुणों की कद्र करते थे। खुले मन से उनकी प्रशंसा करने में हिचकते नहीं थे।

राधु अपने समय के बड़े सिनेमाटोग्राफर, जैसे जतिन दास, नितिन बोस, दिलीप गुप्ता को बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं। कई फिल्मों की तकनीकि खूबियों को बताते हैं, कई की कमियां गिनाते हैं। सरकार की नीतियों की पड़ताल करते हुए वे सरकार को कुछ सुझाव भी देते हैं। उनके जीवन में कई अच्छे लोग आए, कई लोगों ने उन्हें तंग समय में सहायता की और राधु ने भी कई लोगों की दोस्ती आजीवन निभाई कई लोगों को मुसीबत में सहारा दिया।

कैमरामैन का काम प्रशिक्षण की मांग करता है। हमारे देश में कुछ समय पहले तक कैमरा प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। आज यह सुविधा हमारे यहां है। पहले के कुछ जुनूनी कैमरा प्रेमियों ने कैमरा संचालन की शिक्षा दूसरों की शागिर्दी और अपनी लगन से प्राप्त की। ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘संगम’, ‘सन्यासी’, ‘ प्रेम रोग’, ‘मिलन/नौका डूबी’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘जागते रहो’, ‘सपनो का सौदागर’, ‘जिस देश में गंगा बहती’, बेईमान’, ‘बॉबी’ और कई फिल्में ऐसे ही प्रशिक्षित राधु करमाकर के कैमरे द्वारा बनाई हैं।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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