विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सेनेगल सिनेमा- विदेशी प्रभाव में
लेखक, निर्देशक, अभिनेता, प्रड्यूसर उस्मान सम्बेन सेनेगल के अग्रणी निर्देशक थे। उन्होंने कई कहानियों को फिल्म में रूपांतरित किया। वे सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे और इसके द्वारा वृहतर समाज तक पहुंचना चाहते थे।
विस्तार
अफ्रीका महादेश कई देशों का पुंज है। इसके कुछ ही देशों के विषय में लोग जानते हैं। इसके एक देश सेनेगल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। सेनेगल को रिपब्लिक ऑफ सेनेगल भी कहते हैं। पश्चिमी अफ्रीका के इस भूभाग को ‘गेटवे टू अफ्रीका’ भी कहा जाता है क्योंकि यहीं से विदेशियों ने एक समय अफ्रीका में प्रवेश कर इसे अधिकृत कर लिया था। कई देशों ने प्रयास किया अतंत: उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में सेनेगल पर फ्रांस का आधिपत्य हो गया।
1960 तक यह फ्रांस का उपनिवेश था। इस साल एक लेखक व राजनेता लियोपोल्ड सेन्गोर ने इसे स्वतंत्रता दिलाई। कुछ समय यह माली-फेडरेशन का हिस्सा रहा, फिर सर्वसत्तात्मक राज्य बन गया।
यहां की 2/5 आबादी वोलोफ, एक उच्च समुदाय है। इन कुलीन लोगों में सगीतज्ञय और कथाकहने वालों का बोलबाला है। सेनेगल में 39 भाषाएं प्रयुक्त होती हैं, जिसमें ऑफीशियल भाषा फ्रेंच भी शामिल है। यहां सिने-उद्योग बहुत विकसित नहीं है, फिर भी प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय समारोहों में यहां से कलात्मक फिल्में जाती हैं। अगर आप नेट पर सेनेगल की फिल्मों के बारे में खोज करेंगे तो आपको काफी निराशा मिलेगी, फिर भी इसका सिने-इतिहास जानना रोचक होगा।
मछुआरे के बेटे उस्मान सम्बेन (1 जनवरी- 9 जून 2007) को न केवल सेनेगल बल्कि अफ्रीका का सिने-जनक माना जाता है। कई लोग मानते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ सेनेगल की फिल्म बनाने की समृद्ध संस्कृति समाप्त हो गई। इस साल उनकी शताब्दी पर उनकी चिंतनशील निगाह, मुंह में सिगार और ट्रेडमार्क पगड़ी के साथ एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। इसके साथ ही पैन-अफ्रीकन फिल्म एंड टेलेविजन समारोह का आयोजन किया गया है।
लेखक, निर्देशक, अभिनेता, प्रड्यूसर उस्मान सम्बेन सेनेगल के अग्रणी निर्देशक थे। उन्होंने कई कहानियों को फिल्म में रूपांतरित किया। वे सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे और इसके द्वारा वृहतर समाज तक पहुंचना चाहते थे। उन्हें न्यूयॉर्क फिल्म्स का आर्थिक सहयोग प्राप्त था।
साल 1963 में उन्होंने 20 मिनट की अपनी पहली लघु फिल्म बैरोम सारेट (The Wagoner) बनाई। इसमें वे कामगर के जीवन द्वारा सेनेगल की गरीबी को दिखाते हैं। कदाचित किसी अश्वेत अफ्रीकी द्वारा बनाई गई यह पहली फिल्म है। अगले साल अपने ही उपन्यास पर 35 मिनट की फिल्म ‘निआये’ (Niaye) में वे दिखाते हैं कि एक लड़की के गर्भवती होने पर समुदाय कैसे इसे एक स्कैंडल बना देता है।
फीचर फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’
1966 में उस्मान सम्बेन ने अपनी ही कहानी पर पहली फीचर फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ बनाई। 60 मिनट की इस फिल्म ने सेनेगल की ओर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। इसे पुरस्कार भी मिले। पहले वे फ्रेंच भाषा में फिल्म बना रहे थे, बाद में उन्होंने अपनी मातृभाषा वोलोफ में फिल्म बनानी शुरू की।
‘द मनी ओर्डर’ (Mandabi) ‘गॉड ऑफ थंडर’ (Emitai), ‘मूलाडे’ (Moolaade), ‘द कर्स’ (Xala), ‘आउटसाइडर्स’ (Ceddo) आदि अनेक फिल्में बनाईं। ‘मूलाडे’ में वे औरत के खतना पर बात उठाते हैं, इस फिल्म को छ: पुरस्कार प्राप्त हुए।
कॉमेडी फिल्म ‘द कर्स’ में 100 टन चावल का गबन करने वाले एक भ्रष्ट पॉलिटिशियन को बेऔलाद रहने का शाप मिलता है। निर्देशक को कैर्लोवी वैरी इंटरनेशनल फिल्म समारोह में स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार मिला था। 1977 की फिल्म ‘आउटसाइडर्स’ में जबरदस्ती धर्म अप्रिवर्तन और उसके विरोध की बात दिखाई गई है।
जबरन इस्लाम में शामिल करने के विरोध में आउटसाइडार्स राजा डेम्बा वार की बेटी मतलब राजकुमारी डिओर यासिन का अपहरण कर उसके एवज में अपना क्रोध जाहिर करते हैं। इस फिल्म को बर्लिन फिल्म समारोह का पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
विश्व में नाम कमाने के बावजूद सेनेगल की सिनेमा की मुख्य समस्या है, उसके अपने दर्शकों का कम होना। असल में जो कला फिल्में विदेशी आर्थिक सहायता से बनती हैं, जिसके निर्माण में विदेशी दृष्टिकोण का दखल होता है वे अक्सर विदेशी दर्शकों को लुभाने का प्रयास अधिक करती हैं। नतीजा होता है, ये खास तरह की फिल्में देशी दर्शकों को नहीं भाती हैं। इसी कारण देश के भीतर इससे अधिक लाभ नहीं होता है।
दर्शक मेनस्ट्रीम की फिल्म देखना चाहता है, उन्हें इससे पैसा वसूल की अनुभूति होती है। उन्हें नेशनल प्रोडक्शन की फिल्मों में उतना मजा नहीं आता है।
सत्तर का दशक स्वर्ण-काल
सेनेगल सिने-इतिहास में पिछली सदी का सत्तर का दशक स्वर्ण-काल माना जाता है। इस समय राजधानी डकर में ही 37 सिनेमा हाल थे। डकर मेट्रोपोलिटन शहर है और खूब जीवंत है। मगर सरकार ने डकर से हट कर राजधानी बनाने की घोषणा की है। इसी डकर में कुछ समय पहले सैन्गारे ने एक फिल्म स्कूल खोला है। उन्होंने एक मिनी सिरीज भी बनाई।
इसी समय क्लासिकल फिल्म बनाने वाले जिब्रील डियोपी मेम्बेटी का उदय हुआ। 23 जनवरी 1945 को जन्मे इस निर्देशक का फेफड़े के कैंसर से 23 जुलाई 1998 में निधन हो गया। उन्होंने 1973 में ‘टुक्की बुक्की’ बनाई जिसमें दिखाया गया है कि एक चरवाहा मोरी तथा यूनिवर्सिटी छात्रा अन्ता पैसे बनाना चाहते हैं, ताकि वे अपना अतीत पीछे छोड़ कर पेरिस जा सकें।
इस फिल्म के लिए जिब्रील डियोपी मेम्बेटी को मास्को इंटरनेशनल फिल्म समारोह में दो पुरस्कार प्राप्त हुए। इसके अलावा उन्होंने ‘हायनाज’, ‘द लिटिल गर्ल हू सोल्ड द सन’, ‘बैडोउ बॉय’ आदि फिल्में बनाई। ‘बैडोउ बॉय’ (1970) एक कॉमेडी फिल्म है, मगर अस्सी के दशक में सरकार को इंटरनेशनल मोनिटरी फंड के दबाव के कारण फिल्म उद्योग का बजट कम करना पड़ा जिसके चलते सेनेगल ही नहीं तमाम अफ्रीकी देशों का फिल्म उद्योग प्रभावित हुआ।
डकर में जन्मी सैफी फाये (1943-2023) ने ‘लेटर फ्रॉम माई विलेज’ (1976), ‘फैद’जैल’ (1979), ‘मोसाने’ (1996) में बनाई। वे निर्देशन के अलावा अभिनय भी करती थीं। उन्हें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म समारोह में तीन एवं लुकास– इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ फिल्म्स फॉर चिल्ड्रेन एंड यंग पिपुल का एक मतलब कुल चार पुरस्कार प्राप्त हुए थे।
इक्कीसवीं सदी का सिनेमा
इसके बावजूद इक्कीसवीं सदी में सेनेगल का सिनेमा दुनिया का ध्यान खींच रहा है। सरकार द फिल्म एंड ऑडियोविजुअल इंडस्ट्री प्रमोशन फंड द्वारा आजकल छोटे स्केल के प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता दे रही है। 2017 के बर्लिन फिल्म समारोह में अलान गोमिस की फिल्म ‘फेलिसाइट’ को सिल्वर बेयर ग्रैंड ज्यूरी प्राइज मिला। 2019 में मैटी डिओप की फिल्म ‘एटलांटिस’ को कान फिल्म समारोह में ग्रैंड प्री प्राप्त हुआ। मैटी डिओप पहली अश्वेत स्त्री निर्देशक थीं जिसकी फिल्म इस समारोह की प्रतियोगिता में शामिल हुई थी।
पेरिस में जन्मे उस्मान विलियम एम्बाइए ने 2009 में अपनी मां एनेट एम्बाइए पर एक डॉक्यूमेंट्री ‘मेरे-बी’ (मदर-बी) बनाई। उनकी मां लेखक तथा सेनेगल की पहली पत्रकार थीं। उन्होंने स्त्री अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी। एक लम्बी उम्र (82 साल) पाई यह स्त्री आज भी सेनेगल के लोगों केलिए एक प्रेरणा है।
आशा है, जल्द ही सेनेगल से हमें कुछ और अच्छी फिल्म देखने को मिलेंगी।
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