विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: बल्गारिया का सिनेमा
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बल्गारिया का फिल्म उद्योग काफी फला-फूला, यहां बनी डॉक्यूमेट्री की खूब पूछ रही है। एनीमेटेड कार्टून खूब पसंद किए जाते हैं। यहां के दर्शक देश-विदेश दोनों स्थानों की फिल्मों में रुचि रखते हैं।
विस्तार
यूरोप के दक्षिणी पूर्वी भाग में बसा बल्गारिया, रिपब्लिक ऑफ बल्गारिया के नाम से ऑफिसियली दर्ज है। यूरोप महादेश का एक प्राचीनतम देश कई लोगों द्वारा शासित हो, अंतत: आज एक स्वतंत्र देश है। एक समय ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा रहा बल्गारिया द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद काफी समय कम्युनिस्ट देश रहा। अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के प्रारंभ में यह छिटककर अलग हुआ। 2004 में एनएटीओ (NATO) का सदस्य बना और 2007 में यूरोपियन यूनियन से जुड़ गया।
बल्गारिया की प्राकृतिक सुषमा आकर्षक है और यहां संस्कृति का मिश्रण देखने को मिलता है। स्लाविक समुदाय लोकल समुदाय से घुलमिल गया है। साथ ही तुर्क, रोमा, अर्मेनियन, रूसी, यूनानी, तातार भी हैं। बल्गारियन भाषा और कई बोलिया यहां प्रयुक्त होती हैं। लोककथाओं, लोकगीत, उत्सवों, गुलाब का इत्र बनाने के साथ लाइबेरी, ऑपेरा, कल्चरल इंस्ट्यूशन, थियेटर, संगीत यानी सांस्कृतिक रूप से खूब समृद्ध देश बल्गारिया के रचनाकार एलियास कैनेटी को 1981 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। सोफ़िया इसकी राजधानी है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की डॉक्यूमेंट्री
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बल्गारिया का फिल्म उद्योग काफी फला-फूला, यहां बनी डॉक्यूमेट्री की खूब पूछ रही है। एनीमेटेड कार्टून खूब पसंद किए जाते हैं। यहां के दर्शक देश-विदेश दोनों स्थानों की फिल्मों में रुचि रखते हैं। लेकिन नब्बे के दशक में यहां का फिल्म उद्योग एक बार भहरा गया। वैसे सोफिया में प्रतिवर्ष इंटरनेशनल फिल्म समारोह होता है। अधिकांश फिल्में सोफिया के नजदीक बने राज्य द्वारा संचालित बोयानाफिल्म स्टूडियोज में बनती हैं।
वैसे तो अन्य देशों की भांति 1896 में ही बल्गारिया में फिल्म पहुंच गई। 1915 में स्क्रीनराइटर, डॉयरेक्टर तथा अभिनेता वैसिल गेन्डेव का लिखा- ‘बल्गारियनफिल्म! बल्गारियन आर्टिस्ट अंडर बल्गारियन स्काई!’ और 13 जनवरी 1915 को बल्गारिया की पहली फिल्म ‘बल्गारियन इज गैलान्ट’ सोफिया में परदे पर थी। आज इसका नाममात्र का हिस्सा उपलब्ध है।बाकी द्वितीय विश्वयुद्ध में सोफिया पर हुई बमबारी में नष्ट हो गया।
कॉमेडी फिल्म का बचा हुआ हिस्सा देखेंगे तो इतना मजा आएगा, जो शायद आज की फिल्मों को मात कर दे। वैसिल गेन्डेव की इस मूक फिल्म में एक मनचला भद्रयुवा एक लेडी को फंसाने के चक्कर में खुद बुरी तरह फंस जाता है। वह लेडी उसे खूब नचाती है, उससे खूब रकम खर्च करवाती है, उसका कुली की तरह उपयोग करती है और अंत तो आपको खुद देखना होगा। लेडी की भूमिका में मारा लिपिना है और युवक निर्देशक वैसिल गेन्डेव स्वयं है।
जैसे कई अन्य फिल्म कारों को उनकी पत्नी का सहयोग मिला वैसे ही इस निर्देशक को भी मिला। फालके तथा सत्यजित राय की पत्नी ने अपने आभूषण बेच कर अपने पति को फिल्म बनाने में सहयोग दिया था, वैसिल गेन्डेव की पत्नी झाना ने उसे पहली फिल्म बनाने में आर्थिक योगदान किया। बाद में दोनों ने मिल कर ‘यंत्र फिल्म’ हाउस की नींव डाली, यह बल्गारिया का पहला प्रोडक्शन हाउस था।
इन्हीं लोगों ने इस देश की पहली सवाक फिल्म ‘द स्लाव’स रिवोल्ट’ बनाई। इस फिल्म को इन्होंने बल्गारिया के नेशनल हीरो तथा स्वतंत्रता सेनानी वैसिल लेवन्स्की को समर्पित किया। फिल्म को लेकर कुछ विवाद भी हुआ।
फिल्म की ही ताकत है, आज इस सेनानी का घर एक संग्राहलय है। यह भी उल्लेखनीय है कि जीते-जी इन पति-पत्नी को वह सम्मान न मिला जिसके ये हकदार थे। लेकिन यह भी सत्य है, आज उन्हें बल्गारियन फिल्म का संस्थापक माना जाता है।
बोरिस ग्रेझोव, वैसिल बैकर्डझिव, निकोलाई लैरिन आदि बल्गारिया के उस समय के कुछ और सिने-निर्देशक हैं। एलेक्जेंडर वैजोव को भी बल्गारियन सिनेमा का अग्रणी माना जाता है। 1944 में सत्ता पलटने तक के समय को बल्गारिया के सिनेमा का प्रथम खंड माना जाता है। इस समय बनी 50 फिल्मों में से मात्र 17 ही आज उपलब्ध हैं। इसके बाद वहां दूसरा चरण प्रारंभ होता है।
दोनों चरणों की फिल्मों में बड़ा अंतर है, क्योंकि तभी देश में राजशाही के बाद कम्युनिस्ट शासन आया था। अब फिल्म बनाने पर राज्य का कब्जा था। जैहारी झैन्डोव इस काल का एक प्रमुख सिने-व्यक्तित्व है। शुरुआत में उन्होंने ‘पीपुल इन द स्काईज’ तथा ‘ए डे इन सोफिया’ दो डॉक्यूमेंट्री बनाई। ‘ए डे इन सोफ़िया’ सोफिया पर बम गिरने के बाद के जीवन को दिखाती है। ‘बॉयन्स्की मास्टर’ (1981) झैन्डोव की अंतिम फिल्म है।
‘एन्जाइटी’ (1951), ‘कैपिटान्ट’ (निर्देशक डिमिटर पेट्रोव, 1963), ‘ओपैसेन पोलेट’ (निर्देशक डिमिटर पेट्रोव, 1968), ‘द पीच थीफ’ (निर्देशक वुलो रैडेव, 1964), ‘टोबैको’ (निर्देशक निकोला कोराबोव, 1962), ‘द पैजेंट विथ ए बाइक’ (लुडमिल किर्कोव, 1974), ‘मैटिआर्की’ (लुडमिल किर्कोव, 1977) इस दौर की कुछ प्रसिद्ध फिल्में हैं।
अस्सी-नब्बे के दशक में कई अच्छी फिल्में बल्गारिया में बनीं। 1988 में ‘यस्टरडे’ नाम से इवान एंडोनोव ने करीब ड़ेढ़ घंटे की फिल्म बनाई, जिसमें साठ के बीट्ल्स तथा रोलिंग स्टोन का बल्गारिया के जीवन पर असर दिखाया गया है। फिल्म ने दो पुरस्कार जीते। इसी साल ‘टाइम ऑफ वायलेंस’ करीन पौने पांच घंटे से ऊपर की फिल्म बनी। ओटोमन साम्राज्य के काल में स्थित इस फिल्म में जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन की कहानी दिखाई गई है।
17वीं सदी में एक ईसाई इलाके के लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए चुना गया है। इसके लिए सुल्तान के एक सैनिक को चुना जाता है। हालांकि तुर्की गवर्नर शांतिपूर्ण हल ढूंढने का प्रयास करता है, लेकिन चारों ओर अत्याचार, विद्रोह, सताना, हिंसा फूट पड़ती है। इस काल में युवाओं को उनके परिवार-घर से जबरन निकालकर उन्हें मुसलमान के रूप में बड़ा किया जाता और एक भयंकर योद्धा के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था। इस फिल्म को कई पुरस्कार मिले।
बल्गारिया में बच्चों के लिए कई फिल्म बनीं। ‘विथ चिल्ड्रेन एट द सी साइड’ (1972), ‘ए डॉग इन ए ड्रॉयर’ (1982), ‘अप इन द चेरी ट्री’ (1984) आदि ऐसी ही फिल्में हैं। 1989 में सेंसरशिप का बोलबाला रहा और कई बार बिना बात के फिल्में बंद कर दी गईं। जो फिल्में प्रतिबंधित हुई उनमें से कुछ के नाम हैं- ‘ऑन ए स्मॉल आईलैंड’, ‘मंडे मॉर्निंग’, ‘व्हेल’, ‘द टाइड अप बैलून’, ‘ए वूमन एट थर्टी-थ्री’। 1999 के बादफिर यहां कीफिल्मों के दिन फिरे।
अब फिर से आशा बंधी है कि यहां से अच्छी फिल्में दुनिया को मिलेंगी। शुरुआत हो चुकी है। 2008 में इंग्लिश टाइटिल में आई ‘द वर्ल्ड इज बिग एंड साल्वेशन लर्क्स अराउंड द कोर्नर’। पौने दो घंटे की इस फिल्म ने 10 पुरस्कार बटोरे। स्टीफन कोमान्डारेव की इस फिल्म में एलैक्स अपनी जादुई ग्रैंड मदर के साथ एक यात्रा पर निकलता है और स्व की खोज करता है।
ईमानदारी का नतीजा दिखाती, 2016 की ‘ग्लोरी’ ने 35 पुरस्कार पाए। इसी साल निर्देशक याना टिटोवा कीफिल्म ‘डिआडा डिडा डायडा’ को चार ईनाम मिले। भविष्य में और आशा बंधती है।
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