विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: बालु महेंद्र- सिनेमा को नवजीवन देने वाला शख्सियत
बालु महेंद्र ने अपनी सिनेमाटोग्राफर से तमिल फिल्म को एक नई दिशा दी और ऊंचाई पर ले गए। बालु का पूरा नामबालनाथन बालु महेंद्रन था और उनका जन्म 20 मई 1939 को श्रीलंका में हुआ था। पर उनका कार्यक्षेत्र भारत, खासकर तमिलनाडु रहा।
विस्तार
एक समय तकरीबन सभी हिन्दी सिने-प्रेमियों ने फिल्म ‘सदमा’ देखी और सराही थी। फिल्म में उस समय की हिट जोड़ी कमलहसन और श्रीदेवी मुख्य भूमिकाओं में थीं। असल में यह तमिल फिल्म ‘मून्ड्राई पिरई’ (1982) थी और स्वयं निर्देशक के जीवन पर आधारित थी।
सिनेमाटोग्राफर राधु करमाकार प्रश्न करते हैं, ‘क्या एक अच्छे कैमरामैन का विकास एक अच्छे निर्देशक के रूप में हो सकता है?’ आगे वे लिखते हैं, ‘सिद्धांतत: इस पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं है। आखिरकार कैमरामैन का मुख्य काम निर्देशक के विचार को समझ कर उसे परदे पर रूपायित करना है, चाहे यह फिल्म के रूप में हो अथवा अभिनेताओं के अभिनय के माध्यम से हो।...
इसके दो अच्छे उदाहरण हॉलीवुड की दुनिया के रुडोल्फ मैट और जेम्स वांग हॉवे हैं।’ हमारे देश में इसका एक उदाहरण बालु महेंद्र हैं। बालु महेंद्र भी फिल्म-निर्देशक बनने के पहले सिनेमाटोग्राफर थे और कुछ समय बाद वे सिने-निर्देशक बने। यह अक्सर होता है, बेहतरीन फोटोग्राफार जल्द निर्देशन का काम संभाल लेते हैं और दोनों क्षेत्र में खूब बढ़िया काम करते हैं। भरतीय सिने-संसार में भी इसके कई उदाहरण मिलते हैं।
बालु महेंद्र ने अपनी सिनेमाटोग्राफर से तमिल फिल्म को एक नई दिशा दी और ऊंचाई पर ले गए। बालु का पूरा नाम बालनाथन बालु महेंद्रन था और उनका जन्म 20 मई 1939 को श्रीलंका में हुआ था। पर उनका कार्यक्षेत्र भारत, खासकर तमिलनाडु रहा। उन्होंने तमिल एवं मलयालम दोनों भाषा में फिल्म बनाई। इन फिल्मों की बदौलत उन्हें पांच नेशनल एवं तीन फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु चेन्नई में 13 फरवरी 2014 को हृदयाघात से हुई।
सिनेमाटोग्राफी, लेखन, निर्देशन सभी में उस्ताद
बालु महेंद्र ने अपनी अधिकतर फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी, लेखन, निर्देशन तथा एडिटिंग स्वयं की। कहा जाता है, वे चेन्नई फिल्म उद्योग के पहली लहर के सिने-व्यक्तित्व थे और उन्होंने तमिल सिनेमा को नवजीवन प्रदान किया।
बालु ने एफटीआईआई पुणे से सिनेमाटोग्राफी में ग्रेजुएशन किया और वे वहां के स्वर्ण पदक विजेता थे। उन्होंने अपने पेशेगत जीवन की शुरुआत मलयालम फिल्म ‘नेलु’ से बतौर कैमरामैन 1974 में की। अपनी पहली फिल्म के लिए उन्हें केरल सरकार का सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफी का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
दक्षिण भारत में रंगीन फिल्म के लिए कैमरा शैली का अन्वेषण करने वाले वे अग्रणी थे। उनकी सराहना प्लॉट के ट्रीटमेंट के लिए तथा तकनीक कलात्मकता दोनों के लिए होती है। यही कारण है, उन्हें अपनी सिनेमाटोग्राफी के लिए दस बार सर्वोत्तम का खिताब मिला।
‘मून्ड्राई पिरई’ की खूब होती है चर्चा
बालु ने कथानक में एक नई शैली से उस समय के सिनेमा को परिचित कराया, इस शैली में फिल्मांकन द्वारा पात्र की अभिव्यक्ति को प्राकृतिक लाइट के साथ मिलाया जाता है। इस कारण दर्शक तत्काल कहानी से जुड़ जाता है। इसका जीता-जागता उदाहरण ‘मून्ड्राई पिरई’ (हिन्दी में ‘सदमा’) तथा उनकी एक अन्य फिल्म ‘वीडू’ है। उनकी फिल्मांकन की विशेषता को ‘छत्तकारी’, ‘मुलुम मलरम’, ‘शंकराभरणम्’ जैसी फिल्मों में भी देखा जा सकता है।
इस स्टाइलिश सिनेमाटोग्राफर ने अपने पीछे इस कला की एक भरी-पूरी विरासत छोड़ी है। सिनेमाटोग्राफी के इसी ज्ञान के चलते उन्होंने जो फिल्में बनाई वे भी विशिष्ट हैं। निर्देशन उन्होंने किया, सफल फिल्मों का किया मगर उनका पहला जुनून फोटोग्राफी ही रहा। उनके फिल्माए सिनेमा को देखते ही पहचाना जा सकता है।
उनके पेशे के अन्य लोग उनको सम्मान देते थे, उनकी प्रशंसा करते थे इसीलिए सत्यजित राय के सिनेमाटोग्राफर सुब्रत मित्रा ने उनकी प्रतिभा को मान्यता देते हुए उन्हें व्यूफाइंडर उपहार में दिया था। कमल हासन उन्हें कला और लोकप्रिय सिनेमा में संतुलनकर्ता कहते हैं।
प्रकृति से प्रेम
बालु उन विरल सिने-व्यक्तित्व में से हैं, जो कहानी को चाक्षुष रूप से कहते हैं। तमिल फिल्मों में पारदर्शी हरियाली विरले ही नजर आती थी, बालु ने सोचा इसे परदे पर आना चाहिए। परदे पर आना चाहिए मगर प्रयोगशाला में प्रोसेसिंग के द्वारा नहीं। आसपास जीवन की जो हरियाली दीखती है, उसे वे परदे पर लेकर आए।
प्रकृतिवाद उनका सिग्नेचर है। इसे आप पत्तों से छन कर आती धूप में देख सकते हैं। उनके यहां यह बाहरी शॉट्स में भी दिखता है और आंतरिक दृश्यों में भी नजर आता है। भीतर यह खिड़की-दरवाजों से झांकता है। कभी कोने में रखे लैंप से झरता है, इस कारण कभी-कभी कमरा रहस्यमय लगता है। वे अभिनेताओं के भारी मेकअप के खिलाफ थे और आप उनके काम में अभिनेताओं को ऐसे देखते हैं, मानो वे पहली बार नजर आ रहे हों।
सिनेमाटोग्राफर के अनुसार, बालु ने पहली बार एफटीआईआई से निकले सिनेमाटोग्राफर को प्रसिद्धि दिलाई। उनको ‘प्राकृतिक प्रकाश’ के लिए जाना जाता है। बालु चाहे गानों को फिल्मा रहे हों, अथवा नृत्य या फिर मूक संवाद को, वे यह सब दर्शक तक अपने कैमरे से संप्रेषित कर पाने में समर्थ थे। यदि कोई गलती करता था तो इतने कुशल और प्रसिद्ध सिनेमाटोग्राफर को बहुत भयंकर गुस्सा आता था।
उनकी अंतिम फिल्म ‘तलैमुरैगल’ के समय कार्तिक शुभ्रमणियन को उनका एक साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। यह साक्षात्कार लेने कार्तिक चेन्नई के पास वडपलनि गए। बालु के वर्कशॉप में कार्तिक के सिनेमाटोग्राफर ने इस साक्षात्कार के दौरान एक गलती कई बार की और बालु का गुस्सा फट पड़ा। पर बाद में उन्होंने उस व्यक्ति को उसकी गलती बताई और उसे ठीक करने केलिए विस्तार से समझाया। ऐसे थे बालु महेंद्र। उनके वर्कशॉप में कई फिल्म स्टूडियो और पोस्ट-प्रोडक्शन की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
हालांकि वे यथार्थवाद से प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने अमेरिकन सिनेमा से भी काफी कुछ ग्रहण किया। वे स्वयं नेस्टर एलमेंड्रोज एवं माइकेल चैपमैन जैसे कैमरामैन से प्रभावित थे और वे स्वयं संतोष शिवन, रवि चंद्रन, नटराजान शुभ्रमणियम तथा के. वी. आनंद जैसे सिनेमाटोग्राफर की प्रेरणा हैं।
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