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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Historical moment of Hindi's prestige When Acharya Ramchandra Shukla became the Hindi Secretary of Alwar State

हिंदी की प्रतिष्ठा: जब आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने एक झटके में छोड़ दिया था अलवर रियासत के हिंदी सचिव का पद

Mon, 19 May 2025 06:16 PM IST
Neeraj Kumar Patel नीरज कुमार पटेल
Updated Mon, 19 May 2025 06:16 PM IST
सार

आचार्य रामचंद्र शुक्ल 1924 में अलवर रियासत में हिंदी सचिव नियुक्त हुए। महाराज जयसिंह उनकी विद्वत्ता से प्रभावित थे। परंतु राजसी जीवन में बनावटीपन और स्वाभिमान पर समझौता न होने के कारण शुक्ल जी ने वह पद छोड़ दिया। यह प्रसंग उनकी विद्वत्ता, दृढ़ता और हिंदी के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

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Historical moment of Hindi's prestige When Acharya Ramchandra Shukla became the Hindi Secretary of Alwar State
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का प्रसंग (प्रतिकात्मक तस्वीर) - फोटो : Freepik.com

विस्तार

Ramchandra Shukla: हिंदी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884–1941) का जीवन अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों से परिपूर्ण रहा है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण प्रसंग 1924 में घटित हुआ, जब वे अलवर रियासत में ‘हिंदी सचिव’ के पद पर नियुक्त हुए। यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं थी, बल्कि हिंदी भाषा और साहित्य की प्रतिष्ठा की एक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति थी। इसका प्रमाण हमें आचार्य शुक्ल के पुत्र स्वर्गीय चंद्रशेखर शुक्ल द्वारा लिखित जीवनी में मिलता है, जिसका संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने किया है।

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अलवर के महाराज सवाई जयसिंह न केवल एक प्रबुद्ध शासक थे, बल्कि वे विद्यानुरागी, हिंदी-प्रेमी और संगीत-रसिक भी थे। उनकी अंग्रेजी की ख्याति विलायत तक थी, किंतु तुलसीदास जैसे भक्त कवियों के प्रति उनका विशेष अनुराग था। वे स्वयं ‘विनय पत्रिका’ पढ़ते थे और रात दो-दो बजे तक अध्ययन में तल्लीन रहते थे। 1906 में उन्होंने अलवर की राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दी और 1916 में दो लाख वार्षिक के व्यय से एक ‘इतिहास कार्यालय’ की स्थापना की, जहां अलवर का इतिहास हिंदी में संकलित किया जाता था।
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1924 में शुक्ल जी अपने अनुज हरिश्चंद्र जी के यहां अलवर गए हुए थे। वे वहीं के इतिहास कार्यालय में उपाध्यक्ष थे। एक रात 12 बजे राज्य के शिक्षा मंत्री का पत्र लेकर एक सवार आया। पत्र में लिखा था कि महाराज ‘विनय पत्रिका’ पढ़ रहे हैं, जिसमें ‘खेहर’ शब्द का अर्थ न प्रधानाध्यक्ष जान सके, न शिक्षा निदेशक। यह कार्य शुक्ल जी को सौंपा गया। शुक्ल जी ने उत्तर लिखा: “खेहर का अर्थ है ‘धूल’। बस और कुछ ज़रूरत नहीं।” यही वह प्रसंग था जिसने महाराज को शुक्ल जी की विद्वत्ता से प्रभावित किया।

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इसी वर्ष महाराज जयसिंह ने अपने लिए एक हिंदी सचिव नियुक्त करने का विचार किया और 450-1500 रुपये मासिक वेतन पर नियुक्ति हेतु विज्ञप्ति प्रकाशित की। बहुतों के आग्रह पर शुक्ल जी ने भी आवेदन दिया, जबकि उस समय उन्हें विश्वविद्यालय से केवल 150 रुपये वेतन मिल रहा था। मालवीय जी ने छुट्टी देते हुए उनसे कहा- 

 

“गो यू मस्ट। बट आई नो इट वेल, देट नाइदर अलवर विल सूट यू, नार विल यू सूट अलवर।” यह कथन बाद में सच भी सिद्ध हुआ।


अक्टूबर 1924 में शुक्ल जी अलवर पहुंचे। एक भव्य गोलमेज परिषद आयोजित हुई, जिसमें अनेक विद्वान भाग ले रहे थे। सभी अपने-अपने कार्यों और योग्यताओं का प्रदर्शन कर रहे थे। शुक्ल जी केवल अपने लेख, कविताएं और चुने हुए ग्रंथ लेकर चुपचाप बैठे थे। महाराज सबसे मिलते हुए उनके पड़ोसी के पास आए और सुनने के बाद बोले- 
 

“बट दिस इज ऑल दैट योर फादर डिड। आई वांट टू नो व्हाट यू हैव डन योरसेल्फ।” इंटरव्यू समाप्त हुआ और बाद में शुक्ल जी को ‘हाउस ऑफ लाइस’ के भाषण के हिंदी अनुवाद के आधार पर नियुक्त किया गया।


परंतु अलवर का राजसी जीवन शुक्ल जी के मन को नहीं भाया। उन्हें सर्वत्र बनावटीपन और दासता दिखाई दी। स्वाभिमानी शुक्ल जी को यह स्वीकार्य न था। महाराज की कई बातें भी उन्हें अप्रिय लगीं। अंततः जनवरी 1925 में जब महाराज विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाषण देने आए, तब शुक्ल जी उनके साथ काशी लौट आए। फिर बार-बार बुलाए जाने पर भी वे अलवर न लौटे। पत्नी के आग्रह पर उन्होंने यह पद्य सुनाकर अपनी दृढ़ता व्यक्त की:
 

“चीथड़े लपेटे चने चाभैंगे चौखट चढ़, चाकरी करेंगे नहीं चौपट चमार की।” अर्थात् हम फटे पुराने कपड़े पहन लेंगे, भुने चने खाकर गुजारा कर लेंगे, लेकिन मूर्ख या अज्ञानी व्यक्ति की चाकरी (नौकरी) नहीं करेंगे।


इस संक्षिप्त किंतु महत्वपूर्ण प्रसंग ने आचार्य शुक्ल के स्वाभिमान, विद्वता और हिंदी-सेवा के प्रति समर्पण को उजागर कर दिया। अलवर की रियासत में उनकी नियुक्ति मात्र एक प्रशासकीय घटना नहीं थी, वह हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा का एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का कार्य किया।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।  

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