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हिन्दी पत्रकारिता दिवस 2022 विशेष: हिन्दी पत्रकारिता को यथोचित सम्मान की दरकार

Mon, 30 May 2022 06:30 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 30 May 2022 06:30 PM IST
सार

भारत में हिन्दी पत्रकारिता के जनक जुगुल किशोर सुकुल ने 30 मई 1826 को जब कलकता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से पहला हिन्दी अखबार शुरू किया तो उसका नाम "उदन्त मार्तण्ड" रखा। इसका शाब्दिक अर्थ तो "उगता सूरज" था ही लेकिन इसके शब्दिक अर्थ से अधिक महत्वपूर्ण इसका भावार्थ था। हालांकि आर्थिक संकट के कारण पंडित सुकुल (शुक्ल) को 79 अंक निकालने के बाद अंतिम अंक में लिखना पड़ा कि, "आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।"

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Hindi Journalism Day 2022 Special Indian Journalism Need proper Honor
भारत में हिन्दी पत्रकारिता के जनक जुगुल किशोर सुकुल ने 30 मई 1826 को जब कलकता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से पहला हिन्दी अखबार शुरू किया तो उसका नाम "उदन्त मार्तण्ड" रखा। - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

भारत के सबसे बड़े भूभाग में तथा सर्वाधिक लोगों द्वारा बोले जाने के बाद भी जिस तरह राष्ट्रभाषा हिन्दी को पूरा सम्मान नहीं मिलता उसी तरह सर्वाधिक प्रकाशनों और सर्वाधिक प्रसार संख्या के बाद भी देश में हिन्दी पत्रकारिता को वह महत्व और सम्मान हासिल नहीं हो पाया जो कि मुठीभर अंग्रेजी लोगों द्वारा पढ़े जाने वाले अखबारों की पत्रकारिता को मिलती है। हालत यह है कि जिन लोगों को पूरी तरह अंग्रेजी समझ में भी नहीं आती है वे अंग्रेजी के अखबार को अपना स्टेटस सिम्बल मान कर खरीद लेते हैं। अगर कोई हिन्दी का पत्रकार किसी नौकरशाह के पास जाता है तो उसे उतनी तबज्जो नहीं मिलती जितनी कि अंग्रेजी के पत्रकार को मिलती है।

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हिन्दी पत्रकारिता के उगते-डूबते मार्तण्ड

भारत में हिन्दी पत्रकारिता के जनक जुगुल किशोर सुकुल ने 30 मई 1826 को जब कलकता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से पहला हिन्दी अखबार शुरू किया तो उसका नाम "उदन्त मार्तण्ड" रखा। इसका शाब्दिक अर्थ तो "उगता सूरज" था ही लेकिन इसके शब्दिक अर्थ से अधिक महत्वपूर्ण इसका भावार्थ था। हालांकि आर्थिक संकट के कारण पंडित सुकुल (शुक्ल) को 79 अंक निकालने के बाद अंतिम अंक में लिखना पड़ा कि, "आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।" 
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लेकिन डेढ साल में ही डूबने वाले इस "मार्तण्ड’’ ने जो रोशनी भविष्य की पीढ़ी को दिखाई उसका लाभ स्वाधीनता आन्दोलन को भी मिला तो समाज को अब भी निरन्तर मिल रहा है। यह बात दीगर है कि चापलूसों, अवसरवादियों और निहित स्वार्थी तत्वों की भीड़ के बावजूद जुगुल किशोर सुकुल पैदा होते ही रहते हैं। पत्रकारिता के मार्तण्ड डूबते हैं तो फिर उगते भी रहते हैं। ’’उदन्त मार्तण्ड’’  भले ही उगने के कुछ समय बाद ही डूब गया हो मगर हिन्दी पत्रकारिता के लिये उसकी चिताएं आज भी जीवित हैं। इन चिन्ताओं में एक उचित सम्मान की कमी भी है, लेकिन साथ ही विश्वसनीयता में गिरावट और सोशियल मीडिया का अतिक्रमण आदि भी कम चिन्तनीय नहीं हैं।
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हिन्दी पत्रकारिता भी शासितों के लिए

भारत में जिस तरह अंग्रेजी बोलने और पढ़ने वाले स्वयं को अंग्रेज शासकों का उत्तराधिकारी मानते हैं वही स्थिति अंग्रेजी की पत्रकारिता की भी है। आखिर होगी भी क्यों नहीं? अंग्रेजी अभिजात्य वर्ग की भाषा है जबकि हिन्दी आम लोगों की मजबूरी है। हिन्दी पत्रकारिता की अंग्रेजी की तुलना में कम सुनी जाती है। अंग्रेजी पत्रकारिता करने वालों के सामने बड़े से बड़े नौकरशाहों की घिग्गी बंधती है। 

यह मेरा अपना अनुभव भी है। नौकरशाह स्वयं को अलग दिखने के लिये अंग्रेज जैसा आचरण करता है। वे अंग्रेजी के ही अखबार पढ़ते हैं। विडम्बना देखिये कि आम आदमी भी आजादी के 7 दशक गुजरने के बाद भी अंग्रेजी को शासकों की और हिन्दी को शासितों की भाषा मानने वाली मानसिकता से अभी मुक्त नहीं हो पाया। अंग्रेजी अखबार का रुतवा ही है कि कई बार अंग्रेजी के अखबार को उल्टा कर पढ़ने वाले कार्टून भी देखने को मिल जाते हैं। फिल्मी सितारों को ही देख लें! उनकी रोजी रोटी हिन्दी फिल्में से चलती है, लेकिन बातचीत वे अंग्रेजी में करते हैं।

Hindi Journalism Day 2022 Special Indian Journalism Need proper Honor
विश्वसनीयता को पत्रकारिता का प्राण माना जाता है और इसी विश्वास पर लोग अखबारों में छपी बातों को सत्य मान लेते हैं - फोटो : istock

हिन्दी पत्रकारिता की निरन्तर उपेक्षा

भारत 30 मई 1826 से शुरू हुआ हिन्दी पत्रकारिता का सफर काफी गौरवशाली रहा। विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के तीब्र विस्तार के साथ ही संचार और सूचना क्रांति ने तब और अब के हालात में जमीन आसमान का अंतर कर दिया है। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता को मिलने वाले सम्मान में वृद्धि के बजाय निरन्तर ह्रास होता गया। समाचार पत्रों का पंजीकरण भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (आरएनआइ) द्वारा किया जाता है और उसके रिकार्ड में सबसे पुराने हिन्दी अखबार का नाम ’’जैन गजट’’ साप्ताहिक दर्ज है। 

जिसका प्रकाशन वर्ष 1895 बताया गया है। जबकि जुगल किशोर सुकूल जी का ’’उदन्त मार्तण्ड’’ 1826 का है। उत्तराखण्ड में ही 1867 में नैनीताल से हिन्दी उर्दू ’’समय विनोद’’ शुरू हो चुका था। इसी तरह जैन गजट हिन्दी साप्ताहिक से पहले उत्तराखण्ड के ही अल्मोड़ा से 1871 में ’’अल्मोड़ा अखबार’’ शुरू हो चुका था। इसका मतलब है कि भारत में हिन्दी अखबारों और हिन्दी पत्रकारिता का सम्पूर्ण रिकार्ड तक नहीं है।जबकि स्वाधीनता आन्दोलन में भी हिन्दी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सर्वाधिक प्रकाशन हिन्दी के फिर भी दोयम दर्जा

भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (आरएनआइ) के रिकार्ड के अनुसार 2020-21 तक देश में दैनिक, सप्ताहिक और पाक्षिक सहित कुल 1,44,520 पंजीकृत प्रकाशन या पत्र पत्रिकाएं थीं। इनमें सर्वाधिक 55,349 प्रकाशन हिन्दी के, 19,845 अंग्रेजी के, 10,160 मराठी के और 6,930 उर्दू के थे। कुल 19971 दैनिक अखबारों में भी सर्वाधिक 8,562 दैनिक हिन्दी के थे। उसके बाद क्रम से उर्दू, तेलगू और अंग्रेजी के दैनिक थे। साप्ताहिकों में भी सर्वाधिक साप्ताहिक हिन्दी के ही पंजीकृत थे। महानगरों में अंग्रेजी के प्रकाशन हिन्दी से अधिक होने का मतलब भी समझा जा सकता है। 2020-21 में भी सर्वाधिक 476 पंजीकरण हिन्दी के प्रकाशनों के हुये ।

हिन्दी पत्रकारिता की पहुंच सर्वाधिकलोगों तक, फिर भी रुतवा कम

जहां तक रीडरशिप या अखबारों की प्रसार संख्या का सवाल है, तो उसमें भी हिन्दी पत्रकारिता आगे है। आरएनआइ के रिकार्ड के अनुसार 2020-21 में सर्वाधिक 18,93,96,236 प्रसार संख्या हिन्दी के प्रकाशनों की ही थी जो कि सभी भाषाओं के प्रकाशनों की कुल प्रसार संख्या का 49.01 प्रतिशत है। भारत में विदेशी भाषाओं सहित कुल 189 भाषाओं में दैनिक, सप्ताहिक और पाक्षिक आदि पत्र-पत्रिकाएं छपती हैं। हिन्दी के बाद किसी भारतीय भाषा के बजाय अंग्रेजी की प्रसार संख्या सबसे अधिक 3,49,27,239 है। अंग्रेजी के बाद मराठी की 3,15,90,611 और उर्दू की प्रसार संख्या 2,61,14, 412 है।

वर्ष 2011 की जनगणना में भारत में हिन्दी भाषियों की संख्या 52,83,47,193 थी। जो कि कुल भाषा भाषियों की संख्या का 43.63 प्रतिशत है। हिन्दी भाषी 52.83 और हिन्दी के प्रकाशन 18.93 के हिसाब से देखा जाय तो हिन्दी भाषी लोगों में से भी लगभग एक तिहाई लोग ही हिन्दी के पत्र या पत्रिकाएं पढ़ते हैं। भले ही शून्य की कीमत शून्य या कुछ नहीं होती है लेकिन पत्र-पत्रिकाओं (चाहे किसी भी भाषा की क्यों न हों) के लिये शून्य बहुत लाभकारी होता है। प्रसार संख्या पर एक शून्य जोड़ने से भारी उछाल आ जाता है।

विश्वसनीयता का संकट तो अवश्य है

विश्वसनीयता को पत्रकारिता का प्राण माना जाता है और इसी विश्वास पर लोग अखबारों में छपी बातों को सत्य मान लेते हैं लेकिन आज की आधुनिक पत्रकारिता व्यावसायिक हो गयी है और उस व्यावसायिकता ने उस सहज और स्वाभाविक "विश्वसनीयता’’ के "प्राण’ निकालकर अपनी सहूलियत की विश्वसनीयता को पैदा कर नये जमाने की आधुनिक पत्रकारिता के अन्दर जान के रूप में फूंक दिया है। ऐसा नहीं कि पहले अखबारों को जीवित रखने के लिये सत्ता या संसाधनों पर काबिज लोगों के संरक्षण की जरूरत नहीं होती थी। 

लेकिन तब संरक्षणदाताओं की नीयत इतनी खराब नहीं होती थी और वे स्वयं अपनी या अपने वर्ग की आलोचना को सहन करने सहनशक्ति रखते थे। उनको लोकलाज का डर होता था। लेकिन आज स्थिति भिन्न है। सत्ताधरियों को अप्रिय समाचार देशद्रोह की श्रेणी में रखे जा रहे हैं। सरकारों को भी "सत्य’’ के ये थोक और फुटकर विक्रेता रास आ रहे हैं और इन विक्रताओं की औकात के हिसाब से उनके बिकाऊ "सत्य’’ को खरीदा जा रहा है। सोशियल मीडिया अफवाह फैलाने का प्रमुख साधन बन गया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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