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हिंदी दिवस 2023: हिंदी को सरल बनाने का चक्कर और हिंग्लिश की बेशर्म होती रचनात्मकता

Thu, 14 Sep 2023 09:06 AM IST
Dr. Shobha Jain डॉ. शोभा जैन
Updated Thu, 14 Sep 2023 09:06 AM IST
सार

अभी तक दुनिया के जितने देश सुपरपावर हैं, वे अपनी राष्ट्रीय भाषा में बड़े काम करते देखे जा सकते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और जापान जैसे सुपर पावर अपनी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच या जापानी में ही चिंतन, खोज और काम करते हुए समृद्ध हुए हैं। सिर्फ भारत में कल्पना की जाती है कि यह देश भारतीय भाषाओं और खास कर हिंदी को किनारे रख कर सुपर पावर बनेगा। भारत में औपनिवेशिक हैंगओवर छाया हुआ है। इसकी एक वजह  सांस्कृतिक आत्महीनता भी है।

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Hindi Diwas 2023: Importance of hindi language and hindi words common conversation
अभी तक दुनिया के जितने देश सुपरपावर हैं, वे अपनी राष्ट्रीय भाषा में बड़े काम करते देखे जा सकते हैं। - फोटो : istock

विस्तार

माना जाता है मनुष्य भाषा में जीता है। हम जिस समय में जी रहे हैं वह विश्व बाजारवाद का समय है, जिसमें समय मनुष्य का न होकर मशीन का है, उपकरण का है और नई-नई अवधारणाओं का है। हम सूचना के विस्फोट के ऐसे समय में हैं जहां प्रचार के बड़े माध्यमों का भाषा पर दबदबा है, जिसके चलते आज वह जड़विहीन और तात्कालिक होती जा रही है- बोलो और भूल जाओ की भाषा में है। इधर, भाषा अब कलात्मकता के साथ बनाई जाती है और मैन्युफैक्चर होती है। बाजार की सुविधा के लिए गढ़े जाने वाले शब्द जन्म ले रहे हैं।

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टेलीविजन पर उपभोक्ता सामग्री के विज्ञापनों में इस विरूपीकरण को देख रहे हैं, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी की खिचड़ी से निर्मित अशुद्ध भाषा सम्पन्न परिवारों की जीवन शैली और मूल्यों को प्रदर्शित करती है, जिनमें से अधिकांश का जीवन स्वार्थ बर्बरता स्पर्धा और आत्मकेंद्रिता पर टिका होता है।

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दरअसल, भाषा की इस अशुद्धि कहें या खिचड़ी में वंचित जनता की मार्मिक स्थितियों की छवि नहीं दिखाई पड़ती उनके जीवन के तनाव को नहीं देखा जा सकता। भाषा की ऐसी गति बुद्धिजीवियों को कैसे शांत रख सकती है जबकि सृजन की हर साहित्यिक विधा भाषा की कसौटी पर ही कसी जाती है, जिससे समाज का दिशा-निर्देशन होता है। निराशा तब ज्यादा महसूस होती है जब भाषा को सभ्यता का प्रतिनिधि और आदर्श बनाने वाले लेखक, पत्रकार, साहित्यकार निः शब्द मूक बन जाते हैं।

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हिंदी को अकादमिक जगत से बाहर जाकर देखना होगा 

मीडिया स्वयं हॉट न्यूज ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर टीआरपी बढ़ाने की कोशिश में भाषा के इस पतन को लेकर आलोचना तक नहीं करता। आखिर क्यों? अब तक सभ्य भाषा के प्रयोग पर कोई सख्त बयान जारी नहीं किया गया। सत्ता पक्ष की राजनीति करने वालों को सोचना होगा कि  लोकतंत्र की मर्यादा और भाषा की रक्षा कैसे की जाए? 


समाज और संस्कृति से भाषा की हालत का गहरा संबंध है। हम किसी भाषा को किस दृष्टि से देखते हैं और उसका कैसा उपयोग करना चाहते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हमारी सांस्कृतिक सोच क्या है, समाज के बारे में हमारी दृष्टि क्या है और हमारी भूमिका क्या है।  


अभी तक दुनिया के जितने देश सुपरपावर हैं, वे अपनी राष्ट्रीय भाषा में बड़े काम करते देखे जा सकते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और जापान जैसे सुपर पावर अपनी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच या जापानी में ही चिंतन, खोज और काम करते हुए समृद्ध हुए हैं। सिर्फ भारत में कल्पना की जाती है कि यह देश भारतीय भाषाओं और खास कर हिंदी को किनारे रख कर सुपर पावर बनेगा। भारत में औपनिवेशिक हैंगओवर छाया हुआ है। इसकी एक वजह  सांस्कृतिक आत्महीनता भी है।


इधर, दूसरी कसर टेलीविजन पूरी कर देता है जिसमें एसी लोकप्रियतावादी चीजें ज्यादा दिखाता है जिसके विज्ञापन से बाजार विकसित हो सके फिर उसकी भाषा चाहे जो भी हो। केवल माल बेचने और गांव-कस्बों में नए बाज़ार बनाने के लिए हिन्दी का जिस सुविधा के साथ प्रयोग हो रहा है, वह एक तदर्थ और व्यावहारिक उद्देश्य के लिए है। किसी व्यापार आदर्श, राष्ट्र निर्माण या मूलगामी परिवर्तन के लिए नहीं।

कारोबार में भी किसी उच्चाप्रशासनिक बैठक का वार्तालाप हिन्दी में नहीं होता, विज्ञापन एजेंसियों में सारे विज्ञापन पहले अंग्रेजी में बनते हैं, बाद में जैसे-तैसे उनका कामचलाऊ हिन्दी में अनुवाद कर दिया जाता है। भाषा की यह दुर्दशा केवल बाजार में नहीं राजनीति में भी है, जबकि लोकतंत्र में शपथ की भाषा अनुशासन है। 

 

Hindi Diwas 2023: Importance of hindi language and hindi words common conversation
मॉरीशस को बोलचाल की भाषा ही क्रियोल है जो भोजपुरी और फ्रांसीसी के मेल से जन्मी। - फोटो : istock

हिंदी और गांधी की विरासत 

गांधी जी विरासत में जो प्रतिरोध शैली हमें सौंप गए उसका सबसे अधिक प्रयोग हमने हिंदी को मौलिक बनाने में ही किया। हमारे देश में समय के कुप्रबंधन ने भाषा के प्रयोग में उसके लघुपथ (शॉर्ट कट) निर्मित कर दिए। प्रत्येक कार्य हड़बड़ी और जल्दी से जल्दी की भावना से संचालित होरहा है।


यह भी सत्य हैं भारतेन्दु पूर्व के युग में हिंदी का कोई निश्चित सर्वमान्य स्वरूप नहीं था जिसे जैसा लगता वैसा लिखता वर्ष 1903 में जब महावीर प्रसाद द्वेदी सरस्वती पत्रिका के सम्पादक बने तब उन्होंने हिंदी को  मानक रूप देने का यत्न किया। शब्दों की वर्तनी की एकरूपता पर भी पर्याप्य ध्यान दिया।  जैसे-जैसे हम स्वतंत्र हुए हमें आभास हुआ हम अपनी भाषा को लेकर पिछड़ गए अंग्रेजी तक का प्रयोग हम असामान्य ही करते हैं।

वहीं, अब स्थिति ये है कि भाषा के साम्राज्य में शब्दों की सीमा और अक्षरों की आचारसंहिता ने वर्तनी में इन दिनों नए शब्द सर्वमान्य प्रचलित परम्परा बनकर आ गए। या यूं भी कह सकते हैं हिंदी के घर में अंग्रेजी के आगत अतिथि के रूप जमात लगाकर बैठे हैं। इन शाब्दिक अतिथियों को घर से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए हिंदी दिवस पर अक्सर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते रहे हैं।

देशभर के लगभग सभी अख़बारों में इन्हें अंग्रेजों भारत छोड़ों की तरह अंग्रेजी घर छोड़ो के संवादात्मक असफल निवेदन किए जाते रहे हैं। अंग्रेजी के शब्द हिंदी के घर में जिस तरह ठूस-ठूसकर इन दिनों रह रहे हैं, वो भी बिना किसी शारीरिक दूरी  का पालन किए कोरोना की तरह किसी संक्रमण का शिकार होने की पूरी-पूरी आशंका है या फिर हिंदी के ही कुछ शब्द भीड़ तंत्र (मॉबलीचिंग) का शिकार हो जाए।

 

लेनिन ने लिखा है- 

"भाषा मानवीय सम्पर्क का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। सबसे महत्वपूर्ण साधन है" भाषा जो हमारी संस्कृति की पहचान होती है।


अपनी संस्कृति के माध्यम से ही जन-जन की चितवृत्ति में यह बसी है। यह भी सच है कि भाषा को मानवीय जीवन पद्धति के अनुसार विकासमान होना चाहिए। शिक्षा इसका उदाहरण है। क्या हम भारतीय मानस के अनुरूप शिक्षा का कोई प्रारूप तैयार कर पाए। निश्चित ही हम जैसे-जैसे कार्यक्षेत्र में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे व्याख्या में कठिनाइयां  भी मालूम होती हैं। अब जबकि जनतंत्र धीरे-धीरे बदल रहा है कुछ भी स्थिर नहीं है। हमारी भाषा बोलियां, जिसे कहते सुनते विचारते हैं वह भी।

माना जाता है कि मनुष्य भाषा में जीता है और साहित्य में संस्कारित होता है पर अब न तो भाषा में जीने जैसी कोई बात हैं न साहित्य से संस्कार ग्रहण कर पाने की ललक।  

 

Hindi Diwas 2023: Importance of hindi language and hindi words common conversation
इन दिनों ऐसा लगता हैं केवल प्रचलित शब्द ही सर्वमान्य नहीं हो रहे पूरा का पूरा वाक्य विन्यास भी प्रचलित हो चला है। - फोटो : istock

बाजार और भाषा की सिमटती दुनिया 

इन दिनों शिक्षित होने का टैग बाजार में वस्तुओं की तरह बिक रहा सम्भवतः जीवन बाद में पहले जीविका जिसके चलते हिंदी अब अंग्रेजी शब्दों के सदस्यों से मिश्रित परिवार का एक घरौंदा बन गई लेकिन अपना वजूद खोते हुए। इन दिनों ऐसा लगता हैं केवल प्रचलित शब्द ही सर्वमान्य नहीं हो रहे पूरा का पूरा वाक्य विन्यास भी प्रचलित हो चला है।

उदाहरण के लिए जिसे प्रतिष्ठित अखबारों में प्रकाशित किया जाता है जिसका उल्लेख राजकिशोर जी ने बरसों पहले अपने लेख में संदर्भ स्वरूप किया था उसी की पुनरावृत्ति है जिसे हिंदी के समाचार-पत्र में कुछ इस तरह लिखा गया-
 

''इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेन्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन आफिसर्स एक एक अर्जेन्ट मीटिंग ली जिसकी डिटेल्स रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी  जारी करेंगे।

 

''जब लेख में इस पूरे वाक्य को लिखा गया तो लेखक को स्पष्ट करना पड़ा कि विषय वस्तु को समझाने के लिए कोई काल्पनिक वाक्य नहीं गढ़ा गया बल्कि वाकई में उस समाचार-पत्र में शब्दशः ऐसा ही प्रकाशित हुआ था।

अंग्रेजी का बढ़ता प्रकोप हिन्दी के ही घरवासियों का ही घर खाली करवा रहा या यूं कहें हिंदी के शब्द निर्माण के प्रति हमारा आलस्य ही हमारे शब्दों को अपने ही घर से निकाल बाहर फेंक रहा, और बदले में हिंदी अंग्रेजी की दोगली भाषा हिंग्लिश को जन्म दे रहा और हम मूल को छोड़कर क्रियोल भाषा की तरफ अग्रसर हो गए।

क्रियोल उस भाषा को कहते हैं जो भाषा और शासित समूहों के मेलजोल से जन्मीं।

उदाहरण के तौर पर मॉरीशस को बोलचाल की भाषा ही क्रियोल है, जो भोजपुरी और फ्रांसीसी के मेल से जन्मी। हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि हमारे देश में अगर इस मिश्रित भाषा ने अपने पैर जमा लिए तो हिन्दी को लुप्त होने से कोई नहीं रोक सकेगा। छोटे-बड़े मंझोले सभी तरह के अखबार हिन्दी को दूषित करने का जो उपक्रम रच रहे उसके पीछे उनका कारण सर्वमान्य प्रचलित शब्दों को स्वीकारना हो सकता है पर अपनी  ही भाषा के शब्दों को प्रचलन में लाने और उन्हें सर्वमान्य बनाने की जिम्मेदारी भी तो हमपर ही हैं कोई देवदूत तो नहीं आएगा इस कचरे को साफ़ करने।  


हिंदी को बचाने की दिशा में पुनः किसी ऐतिहासिक घटना को दोहराने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए की देश में भाषा का क्रियोलीकरण केवल हिंदी का नहीं सभी भारतीय भाषाएं इस खतरे से गुजर रहीं। 

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह कि हमारे अपने घरों में दिनचर्या में प्रचलित हो चुकी अंग्रेजी का सर्वाधिक प्रयोग हिंदी माध्यम के विश्वविद्यालय विद्यालयों में लिखित और मौखिक रूप में अतिरेक के साथ किया जाता रहा है।

उदाहरण के तौर पर-

स्कूल, यूनिवर्सिटी, स्टूडेंट्स, टीचर्स, एग्जाम, पेरेंट्स, होम वर्क, प्ले ग्राउंड, लंच अपॉर्चुनिटी, इंस्टीट्यूशन, इंट्रेंस आदि आदि इन शब्दों के नई पीढ़ी को शायद शुद्ध हिंदी अर्थ भी न पता हो। उस पर इन दिनों नेताओं के नीति-निर्धारण से लेकर उनकी घोषणाओं तक सब में भाषा जिस तरह से आहत होती आई है, वह अलग।  

आखिर क्यों हमें भाषाई हिंसा नहीं खटकती जबकि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ आत्म-अनुशासन की व्यवस्था है किन्तु दोनों में से केवल प्रथम वाले अधिकार का भरपूर और मनमाना प्रयोग किया जाता है।

अगर नीति-निर्धारकों के नजरिए से यह विमर्श का विषय नजरअंदाज किया जा रहा है तो साहित्य और कलाएं जो भाषा की उच्चतम अभिव्यक्ति का पर्याय मानी जाती है उन्हें इस और कुछ कदम उठाने चाहिए।

लोकतंत्र को भाषा के अपराधीकरण से रोकना, भाषा के बर्ताव पर आवश्यक कदम उठाना भी उतना ही जरूरी मुद्दा है जितना वोट डालना। साहित्य में जो भाषा मानव को संस्कारित करती है राजनीति में वही अपनी शुचिता क्यों खो देती है यह विचारणीय है? 


डॉ. हजारी प्रसाद द्ववेदी ने अपनी कृति लिखा है- 

अब ऐसा साहित्य लिखना होगा जिसमें की सहज भाषा में ऊंचा विज्ञान और ऊंची टेक्नालाजी को समझया जा सके। जो पाठ्य पुस्तकें विद्यार्थी के समझ में नहीं आती उन्हें पढ़कर वह सर धुनकर रह जाता है।

भाषा में शब्द पर शब्द बैठाने से भाषा नहीं बनती उसमें अपना फ्लो होता है, अपनी कुछ जान होती है, उसकी प्राण धारा होती है, उस पर किसी प्रकार का आप दबाव डालेगे तो भाषा कराह उठेगी, इसलिए भाषा अपने ही घर में रहकर पोषित समृद्ध हो सके अपनी धमनियों में रक्त की तरह प्रवाहित हो सके। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं।  आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  अपने विचार हमें blog@auw। co। in पर भेज सकते हैं।  लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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