#हिंदीहैंहम: हिंदी भाषा और इसमें निहित भारत की संस्कृति वैश्विक धरोहर है
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पिछले 67 सालों से हम प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाते आ रहे हैं। इस वर्ष भी मनाएंगे, लेकिन कोरोना महामारी के चलते पाबंदियां होने के कारण वर्चुअल रूप से ही कार्यक्रमों का आयोजन कर सकेगें। इस बार हिंदी दिवस पर देशभर में कहीं भी बड़े कार्यक्रमों का आयोजन नहीं हो पाएगा।
हिंदी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ हमारी राजभाषा भी है। भारत की मातृ भाषा हिंदी को सम्मान देने के लिए प्रति वर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितबंर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी।
इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितबंर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है जो हिंदी भाषा के महत्व को दर्शाता है।
हिंदी ने भाषा, व्याकरण, साहित्य, कला, संगीत के सभी माध्यमों में अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं वर्चस्व कायम किया है। हिंदी की यह स्थिति हिंदी भाषियों और हिंदी समाज की देन है। लेकिन हिंदी भाषी समाज का एक तबका हिंदी की दुर्गति के लिए भी जिम्मेदार है।
अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है। यह धारणा हिंदी भाषियों में हीन भावना लाती है। जिंदगी में सफलता पाने के लिए हर कोई अंग्रेजी भाषा को बोलना और सीखना चाहता है। हिंदी भाषी लोगों को इस हीन भावना से उबरना होगा, क्योंकि मौलिक विचार मातृभाषा में ही आते हैं।
शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा होनी चाहिए। शिक्षा विचार करना सिखाती है और मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी जीता है। हमें अहसास होना चाहिए कि हिंदी दुनिया की किसी भी भाषा से कमजोर नहीं है।
हिंदी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, और दिल्ली राज्यों की राजभाषा भी है। राजभाषा बनने के बाद हिंदी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में लोगों से संपर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है, लेकिन विश्व भाषा बनने के लिए हिंदी को अब भी संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्यों के दो तिहाई देशों के समर्थन की आवश्यकता है।
भारत सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। हम संभावनाएं जता सकते हैं कि शीघ्र ही हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में शामिल कर लिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा के दौरान अधिकतर अपना संबोधन हिंदी भाषा में ही देते हैं, जिससे हिंदी भाषा का महत्व विदेशी धरती पर भी बढ़ने लगा है।
चीनी भाषा मंदारिन के बाद हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। नेपाल, पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी को हिंदी बोलना, लिखना, पढ़ना आता है। बांग्लादेश, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं।
फिजी, सुरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश की सरकारे तो हिंदी भाषियों द्वारा ही चलाई जा रही हैं। पूरी दुनिया में हिंदी भाषियों की संख्या करीबन एक सौ करोड़ से अधिक है।
हिंदी के ज्यादातर शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं। यह मुख्य रूप से आर्यों और पारसियों की देन है। इस कारण हिंदी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। जहां अंग्रेजी में मात्र 10 हजार मूल शब्द हैं। वहीं हिंदी के मूल शब्दों की संख्या 2 लाख 50 हजार से भी अधिक है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हिंदी का अंतरराष्ट्रीय विकास बहुत तेजी से हुआ है। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैंकड़ों छोटे-बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध के स्तर तक हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है।
विदेशों से हिंदी में दर्जनों पत्र-पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी भाषा और इसमें निहित भारत की सांस्कृतिक धरोहर सुदृढ और समृद्ध है। इसके विकास की गति बहुत तेज है।
हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिए...
हिंदी भाषा एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए बहुत आसान और सरल माध्यम प्रदान करती है। यह प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है। हिंदी विविध भारत को एकता के सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लेकिन यह कैसी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति आज भी इतनी उपेक्षा व अवज्ञा क्यों? प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिंदी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है, इसलिए इसे सामान्य जनता की भाषा अर्थात् जनभाषा कहा गया है।
हिंदी के प्रयोग एवं प्रचार हेतु मनाया जाने वाला हिंदी-दिवस न केवल हिंदी के प्रयोग का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इस बात का ज्ञान भी दिलाता है कि हिंदी का प्रयोग भारतीय जनता का अधिकार है, जिसे उनसे छीना नहीं जा सकता है।
हम जानते हैं कि इतने बड़े जनसमुदाय वाले देश में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना आसान नहीं है। यदि महात्मा गांधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पण्डित मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, आचार्य केशव सेन, काका कालेलकर, गोविन्दवल्लभ पन्त जैसे अनेको महान व्यक्तियों के अथक प्रयासों से हमें हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने का अधिकार मिला है तो उसे हम छोड़े क्यों ?
हिंदी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिए। देश में तकनीकी और आर्थिक समृद्धि के एक साथ विकास के कारण हिंदी ने कहीं ना कहीं अपना महत्ता खो दी है। आज हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन तेजी से बढ़ने लगा है।
बहुत से बड़े समाचार पत्रों में भी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का उपयोग किया जाने लगा है। जो हिंदी भाषा के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। रही सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है। जहां सॉफ्टवेयर की मदद से रूपांतर कर अंग्रेजी से हिंदी भाषा बनाई जाती है। जिसमें ना मात्रा का ख्याल रहता है और ना ही शुद्ध वर्तनी का। वर्तमान समय में हिंदी भाषा के समाचार पत्र व पत्रिकाएं धड़ाधड़ बंद हो रही हैं।
किसी भी देश की भाषा और संस्कृति उस देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हिंदी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में अनेक क्षेत्रों में प्रयास हुए हैं। हिंदी भारत की संपर्क भाषा भी है। अतः हम कह सकते हैं कि हिंदी एक समृद्ध भाषा है। भारत की राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में हिंदी भाषा का बहुत बड़ा योगदान है।
हिंदी दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम पूरे मनोयोग से हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना निस्वार्थ सहयोग प्रदान कर हिंदी भाषा के बल पर भारत को फिर से विश्व गुरु बनवाने का सकारात्मक प्रयास करेंगें। अब तो कंप्यूटर पर भी हिंदी भाषा में सब काम होने लगे हैं। कंप्यूटर पर हिंदी भाषा के अनेकों सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जिनकी सहायता से हम आसानी से कार्य कर सकते हैं।
कोई भी भाषा तब और भी समृध्द मानी जाती है, जब उसका साहित्य भी समृध्द हो। आदिकाल से अब तक हिंदी के आचार्यों, संतों, कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं हिंदी-प्रेमियों ने अपने ग्रंथों, रचनाओं एवं लेखों से हिंदी को समृध्द किया है, परंतु हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपने विचारों, भावों एवं मतों को विविध विधाओं के माध्यम से हिंदी में अभिव्यक्त करें एवं इसकी समृध्दि में अपना योगदान दें। हिंदी के विकास के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।