हिंदी दिवस 2019ः भारतीयों के व्यवहार और विचार की भाषा है हिंदी
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निज भाषा उन्नति अहैं, सब उन्नति को मूल
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल
भारतेंदु जी की यह उक्ति भाषा के संदर्भ में अपने देशकाल वातावरण से लेकर आज के समय में भी सार्थक है। अपनी भाषा के बिना व्यक्ति का विकास संभव नहीं है फिर वह मातृभाषा हो या राष्ट्रभाषा। भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास की सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होती है।
यही माध्यम उसे जमीन से जोड़ता है और विकास की ओर बढ़ाता है। लेकिन वर्तमान समय में 'ज्ञान’ पर अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के कारण बच्चों पर अंग्रेजी भाषा को थोप दिया जाता है। उनकी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा नहीं बल्कि विदेशी भाषा बना दी जाती है। ज्ञान का प्रवाह कठिन से सहज की ओर बहना आरंभ हो जाता है। जबकि भाषा के संबंध में मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि भाषा ज्ञान की परंपरा सहज से कठिन की ओर बढ़ती है।
मातृभाषा में शिक्षा का अभाव बच्चों की सीखने की क्षमता को प्रभावित करता है और उन्हें हीनता बोध से ग्रसित करता है। वर्चस्व के कारण आज भी अंग्रेजी विज्ञान और तकनीक की भाषा बनी है और यही कारण है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इससे दूर है।
अंग्रेजी के वर्चस्व का एक प्रमुख कारण स्थानीय भाषाओं का संघर्ष है। कुछ जीवित रहने का संघर्ष कर रही हैं तो कुछ बोली से भाषा बनने की। कुछ का संघर्ष पहचान का है पर सबसे ज्यादा यह संघर्ष वर्चस्व का है। झगड़ा बोलियों में भी है और भाषाओं में भी।
इन दोनों की टकराहट ने ही आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी को न राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया न पूरी तरह से राजभाषा का। व्यवहारिक व सामाजिक स्तर पर बेशक हम हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं मगर संवैधानिक स्तर पर हिंदी संपर्क भाषा तक सीमित है।
हमारा बहुभाषिक होना एक ओर हमारी शब्द संपदा को समृद्ध करता है तो दूसरी ओर हिंदी और गैर-हिंदी भाषी के मध्य मतभेद उत्पन्न करता है।
यही कारण भी है कि आज भी दक्षिण भारत में मातृभाषा के बाद दूसरी सर्वाधिक प्रयोग की भाषा अंग्रेजी है। ऐसे में एक भाषा के सूत्र के लिए हिंदी की बहुसंख्यक आबादी की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। आज़ादी के आंदोलन में हिंदी प्रेम को सर्वाधिक देखा गया क्योंकि उस समय हिंदी भाषा वर्चस्व से अलग सभी के राष्ट्रीयजन भावनाओं की भाषा थी। हिंदी के प्रति प्रेम ने ही महात्मा गांधी को गुजराती से हिंदी-हिन्दुस्तानी से प्रेम कराया दूसरी ओर मुंशी प्रेमचंद उर्दू से हिंदी में लिखने लगे।
इतना ही नहीं एक बड़ा जनसमूह ‘हिंदी’ को अपनी भाषा मानकर अपनाने लगा और यह संपूर्ण राष्ट्र के हृदय की भाषा बन गई। किंतु कुछ अतिशुद्धतावादी लोग हिंदी को विशेष संदर्भित करने लगे जिससे कि एक वर्ग में हिंदी के प्रति अविश्वास उत्पन्न कर दिया। यह अविश्वास आज तक बना हुआ है जिसका सबसे अधिक फायदा अगर किसी ने उठाया है तो वह अंग्रेजी भाषा है।
हमें इस बात को समझना होगा। हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने की दृष्टि से कई संस्थाओं का गठन किया गया था, किंतु उनकी स्थिति आज जीर्ण-शीर्ण है। आज इन संस्थाओं को पुन: सशक्त बनाने का प्रयास किया जाना आवश्यक है। कभी सोचा हमने कि क्यों अपनी ही मातृभाषा और राष्ट्रभाषा को दिवस के रूप में मनाए जाने की आवश्यकता महसूस हुई। किसी भी देश का विकास उसकी अपनी भाषा से होता है।
हिंदी भारत की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। यह भारतीयों के व्यवहार और विचार की भाषा है। वर्तमान समय में व्यक्ति के विचार और व्यवहार में अंग्रेजी हावी हो गई है क्योंकि अंग्रेजी व्यवहार और विचार से भी अधिक रोजगार की भाषा बनकर उभरी है। अंग्रेजी विज्ञान, तकनीकी और प्रोद्योगिकी की भाषा है। विकास का मानक है। ऐसे समय-परिवेश में हिंदी का व्यवहार और विचार हिंदी भाषी को दोयम स्थिति में ला खड़ा करता है।
युवा भी अपने ही देश के भीतर हिंदी की इस दोयम स्थिति से वाकिफ है। उसकी प्रतिभा से अधिक अंग्रेजी ज्ञान उसके लिए रोज़गार के साधन उपलब्ध कराता है। ऐसे में भविष्य की संभावनाओं में अंग्रेजी का ज्ञान उसके लिए अनिवार्य हो जाता है। वर्तमान समय में अंग्रेजी की अनिवार्यता के सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। यही व्यक्ति के विकास की भाषा और माध्यम है।
ऐसे में हिंदी का अवरुद्ध प्रवाह तभी प्रवाहमान हो सकेगा जब हिंदी विज्ञान और तकनीक की भाषा बनेगी और रोजगार उपलब्ध कराएगी। वैश्विक मंचों पर आयोजित प्रतियोगिताओं में अपने गौरव से पहचान बनाएगी।
इसके अभाव में हिंदी सिर्फ और सिर्फ एक भाषा एक व्यवहार बनकर रह जाएगी। अंग्रेजी वर्चस्व की भाषा बनकर परचम लहराएगी। बेशक संख्या बल के आधार पर हिंदी का वर्चस्व देखा जाता है परंतु इसके विपरीत अंग्रेजी भाषा का ही बोलबाला है क्योंकि आज भी ज्ञान और तकनीक की भाषा अंग्रेजी ही है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।