फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Hindi Diwas 2019 Amazing Facts about Hindi Language in Hindi

हिंदी दिवस 2019ः देश के आर्थिक विकास की गति को बढ़ाया हिंदी ने

Sat, 14 Sep 2019 03:03 PM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Sat, 14 Sep 2019 03:03 PM IST
विज्ञापन
Hindi Diwas 2019 Amazing Facts about Hindi Language in Hindi
हिंदी लेखन की भाषा के तौर पर पूरे देश् में स्थापित नहीं हो पाई, लेकिन हिंदी बोलने वाल पूरे देश में मिल जाएंगे। - फोटो : अमर उजाला

किसी जमाने में हिंदी भाषा का मतलब होता था, उतर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा की भाषा। इन राज्यों में बोलचाल की भाषा हिंदी थी। राजकीय कामकाज की भाषा हिंदी थी। आजादी के बाद इन हिंदी भाषी राज्यों की राज्य सरकार ने भी अपने प्रदेश स्तरीय कामकाज में सरकारी भाषा हिंदी ही रखी।

विज्ञापन


हालांकि केंद्र से पत्राचार करते हुए इन राज्यों की राज्य सरकारें अंग्रेजी का इस्तेमाल भी करती रहीं। लेकिन राज्यों में शासन की भाषा हिंदी रही। अब समय के साथ हिंदी के प्रचार और प्रसार में भारी बदलाव नजर आया है। हिंदी बोलचाल की भाषा के तौर पर पूरे देश मे स्थापित हो गई है।
विज्ञापन


हिंदी बेशक लेखन की भाषा के तौर पर पूरे देश मे स्थापित नहीं हुई, लेकिन हिंदी समझने वाले और बोलने वाले अब पूरे देश में मिल जाएंगे। उतर पूर्व अरुणाचल प्रदेश से लेकर तमाम राज्यों में आपको हिंदी बोलने वाले समझने वाले लोग मिल जाएंगे। बेशक उनकी भाषा की वो शुद्धता नहीं होगी जिसकी आप अपेक्षा रखते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


दक्षिण के राज्यों में भी अब हिंदी समझने वाले और बोलने वाले लोग हैं। कुछ वो राज्य जहां हिंदी मातृभाषा नहीं रही, जिसमें पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्य शामिल है वहां हिंदी ने काफी मजबूती से अपनी पकड़ मजबूत की है। संचार के नए माध्यम जिसमें व्हाट्सएप, फेसबुक भी शामिल है ने भी हिंदी के प्रचार और प्रसार में खासा योगदान दिया है।  

 

Hindi Diwas 2019 Amazing Facts about Hindi Language in Hindi
आजादी के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का ज्यादा प्रयोग होता रहा है। - फोटो : अमर उजाला

सरकारी बैठकों में बोलचाल की भाषा 
बेशक हिंदी व्यवहारिक रूप में आज भी देश की राजभाषा नहीं बनी है। लेकिन हिंदी राष्ट्रभाषा जरूर बन गई है, क्योंकि देश की बहुसंख्यक आबादी हिंदी बोलती है। सरकारी कामकाज में कई राज्यों में हिंदी का प्रयोग न होना और केंद्र में भी सरकारी कामकाज में हिंदी के बजाए अंग्रेजी को आज भी ज्यादा महत्व देना हिंदी के प्रचार और प्रसार को रोक नहीं पाया। जाहिर है आमजन की भाषा के तौर पर हिंदी का विस्तार होता गया। तमाम बाधाओं के बीच आमजन की भाषा के तौर पर हिंदी तेजी से बढ़ती रही।


आजादी के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का ज्यादा प्रयोग होता रहा है। यह प्रयोग आज भी बदस्तूर जारी है। सरकारी कामकाज से संबंधित फाइलों में अंग्रेजी में टिप्पणी-लेखन आज भी जारी है। लेकिन टिप्पणी लेखन करने वाले अधिकारी या बाबू भी उसी फाइल से संबंधित बैठकों में बातचीत की भाषा हिंदी रखते है। अगर अधिकारी किसी वैसे राज्य से संबंधित है, जो हिंदी भाषी नहीं है, या अधिकारी को हिंदी नहीं आती है तो एक दूसरे को सूचित करने की भाषा अंग्रेजी हो जाती है।


हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार के तीन महत्वपूर्ण अंग हैं। इसमें हिंदी भाषा को समझने की क्षमता, लेखन और हिंदी में बोलने की क्षमता शामिल है। इन तीनों अंगों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि समय के साथ-साथ हिंदी बोलने वाले और समझने वालों की संख्या में खासी बढोतरी हुई है। इसके कई कारण  हैं।

दरअसल, आजादी के बाद देश में आर्थिक विकास की गति तेज हुई। लोगों का आपसी मेलजोल बढ़ा। बेशक पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश के तेज आर्थिक विकास और ज्यादा से ज्यादा रोजगार पैदा करने के लिए भिलाई, दुर्गापुर, बोकारो जैसे शहरों में बड़े-बड़े स्टील प्लांट लगवाए, इन प्लांटों ने आर्थिक विकास के साथ हिंदी का भी विकास किया।


इन प्लांटों में तमाम गैर हिंदी भाषी राज्यों के लोग भी आकर नौकरी करने लगे। अलग-अलग राज्यों से आकर बसने वाले लोगों ने अपनी बातचीत की भाषा के तौर पर हिंदी को अपनाया। इसके साथ हिंदी का विकास हुआ। निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों ने टाटा नगर जैसे शहर बसाए यहां बड़े औद्योगिक प्लांट लगाए। लेकिन इनका महत्वपूर्ण योगदान हिंदी के विकास में रहा। यहां नौकरी करने आए दक्षिण भारतीय लोगों ने स्थानीय लोगों से बातचीत की भाषा के तौर पर हिंदी को स्वीकार किया। इससे धीरे-धीरे हिंदी का प्रचार बढ़ता गया।


1980 के बाद देश में आर्थिक विकास की गति और बढ़ी। एक राज्य से दूसरे राज्य की तरफ लोगों का प्रवास बढ़ा। उतर के लोग दक्षिण की तरफ कारोबार की तलाश मे गए। दक्षिण के लोग उतर की ओर कारोबार की तलाश में गए। 1990 के आर्थिक उदारवादी नीति के बाद विकसित हुए कई महानगरों में महानगरीय संस्कृति की मुख्य भाषा हिंदी बन गई। यहां पर अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी का ज्ञान जरूरी हो गया, क्योंकि तमाम अलग-अलग राज्यों के लोगों को बडे शहरों मे जाने पर पता चला कि महानगरों में हिंदी बोलने वालों की संख्या ज्यादा है।


हालांकि दिल्ली और मुंबई जैसे राज्यों में हिंदी भाषी लोगों ने पहले ही रोजगार के तलाश में भारी जमावड़ा कर लिया था। मसलन दिल्ली के अंदर ज्यादातर टैक्सी और ऑटो ड्राइवर हिंदी भाषी राज्य उतर प्रदेश और बिहार के हैं। उसी प्रकार मुंबई में भी टैक्सी और ऑटो ड्राइवर ज्यादा हिंदी भाषी राज्यों के ही हैं।

दिल्ली में ऑटो और टैक्सी चलाने वाले ड्राइवरों से बातचीत की भाषा हिंदी है। इस कारण महानगरीय संस्कृति में अंग्रेजी और अन्य भाषा बोलने वाले लोगों को हिंदी में बोलचाल उनकी मजबूरी बन गई। वहीं कुछ सालों तक रहने के बाद गैर हिदीं भाषी लोगों को खुद ही हिंदी समझ में आने लगी।। वे बेशक टूटी फूटी बोले लेकिन हिंदी बोल सकते हैं। हिंदी समझने की क्षमता पूरी है। हां यह जरूर है कि उन्हें हिंदी लेखन नहीं आती।

 

Hindi Diwas 2019 Amazing Facts about Hindi Language in Hindi
हिंदी फिल्मों ने हिंदी का प्रचार और प्रसार में भारी योगदान दिया है। - फोटो : अमर उजाला

हिंदी फिल्मों और हिंदी धारावाहिक का हिंदी प्रचार में योगदान
हिंदी फिल्मों ने हिंदी का प्रचार और प्रसार में भारी योगदान दिया है। आजादी के बाद हिंदी फिल्मों ने उन राज्यों मे भी हिंदी का प्रचार किया जहां हिंदी का जोरदार विरोध था। मसलन तमिलनाडू, केरल आदि दक्षिण के राज्यों में हिंदी को उपनिवेशवादी भाषा के तौर पर देखा गया। इसे ब्राह्मणवादी भाषा के तौर पर देखा गया। शुरू में हिंदी का खूब विरोध भी इन राज्यों में हुआ। लेकिन समय के साथ हिंदी फिल्मों ने इस विरोध की धार कम की। हालांकि हिंदी विरोध आज भी इन राज्यों में है। लेकिन हिंदी फिल्मों ने दक्षिण के राज्यों के लोगों में हिंदी समझने की क्षमता विकसित की। आज आप दक्षिण भारतीय राज्यों के शहरों मे हिंदी में समझने और बोलने वालों की अच्छी संख्या देख सकते हैं। वे टूटी फूटी हिंदी में आपको जानकारी भी दे देंगे। बेशक वे हिंदी लिखने की क्षमता नहीं रखते हैं।


सूचना और मनोरंजन के तंत्र भाषा के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के कई शब्दों को उतर-पूर्व औऱ दक्षिण के राज्यों में लोकप्रिय किया। हिंदी के कई शब्दों का इस्तेमाल इन राज्यों में स्थानीय लोग आम बोलचाल की भाषा में करते हैं। 1990 के दशक में आई दूरसंचार क्रांति ने मनोरंजन से संबंधित टीवी चैनलों का खासा विस्तार किया। इसका सबसे ज्यादा लाभ हिंदी को मिला।


हिंदी धारावाहिक उत्तर भारतीय राज्यों से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में लोकप्रिय हुए हैं। उत्तर पूर्वी राज्यों में भी हिंदी धारावाहिक देखने वाले लोगों को अच्छी संख्या मिल जाएगी। टीवी धारावाहिक में गुजराती साड़ी पहनकर अभिनय करने वाली अभिनेत्री की बोलचाल की भाषा हिंदी होती है। अगर धारावाहिक से आर्थिक तौर पर गुजरात के साड़ी निर्माण करने वाली कंपनी का लाभ होता है तो साथ ही हिंदी भाषा का प्रचार भी होता है। नए फैशन को समझने के चक्कर में धारिवाहिक देखने वाले लोग हिंदी भी समझने लगते हैं।


हिंदी भाषी राज्यों में रोजगार की खासी उपलब्धता ने भी हिंदी के प्रचार में खासा योगदान दिया है। देश के कई बड़े हिंदी भाषी राज्यों  सरकारी नौकरियों की उपलब्धता काफी रही है। देश के तमाम राज्यों से लोग वहां नौकरी के लिए आवेदन करते रहे हैं। लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में नौकरी प्राप्त करने के लिए दसवीं स्तर की हिंदी आना जरूरी है। वहीं इन राज्यों में निजी क्षेत्र में भी कामकाज पाने के लिए हिंदी का ज्ञान जरूरी है।


मसलन देश के तमाम राज्यों में नलसाज (पलंबर) का काम करने वाले ज्यादातर लोग उड़ीसा के रहने वाले हैं। दिल्ली समेत उतर के कई राज्यों मे भारी संख्या में उड़ीसा के लोग प्लंबर का काम करते हैं। उड़ीसा के लोग भवन निर्माण के काम में भी लगे हैं और उन्हें अच्छी हिंदी आती है। वो हिंदी लिख नही सकते हैं, पर बोल सकते हैं और समझ सकते हैं।


हालांकि ज्यादातर नलसाज पूर्वी उड़ीसा के घोर उड़िया भाषी केंद्रपाड़ा, पुरी, भुवनेश्वर, गंजाम आदि जिलों के हैं। इन इलाकों में हिंदी बोलने और हिंदी समझने वालों लोगों की संख्या न के बराबर है। लेकिन जब यहां के लोग रोजगार के तलाश मे दूसरे राज्य में निकले तो उन्हें हिंदी बोलने भी आ गई और समझने भी आ गई।


उत्तर भारत के राज्यों और हिंदी भाषी प्रदेशों में कामकाज की तलाश में जाने के बाद उड़िया लोग हिंदी बोलना सीख गए। ये हिंदी समझ सकते हैं। बेशक ये हिंदी लिख नहीं सकते हैं। उड़ीसा जैसे राज्य के लाखों लोग गुजरात के कपड़ा उद्योग में काम करते हैं। यहां भी गुजराती लोगों के साथ उड़िया कामगारों की सूचना देने वाली भाषा हिंदी है, क्योंकि गुजराती हिदी बोल लेते हैं और यहां काम करने वाले उड़िया कामगार हिंदी समझते हैं।  

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed