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'शाहीन-बाग': ग्राउंड रिपोर्ट से झांकती एक अलग तस्वीर

Wed, 22 Jan 2020 06:42 PM IST
Navaneet Rathaur नवनीत राठौर
Updated Wed, 22 Jan 2020 06:42 PM IST
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ground report a different picture peeping from the Shaheen Bagh protest against CAA
शाहीन बाग में प्रदर्शन में शामिल महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर शाहीन बाग में हो रहे प्रदर्शन को आज एक महीने से ज्यादा हो गए। 11 दिसंबर 2019 को उच्च सदन से भी नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद से इसके विरोध में देश के कई हिस्सों में जोरदार धरना-प्रदर्शन हुए। कहीं निराशा और नाउम्मीदी के साथ लोग शांत हुए तो कहीं उग्र और हिंसक प्रदर्शनों पर बल प्रयोग से तितर-बितर किया गया। 

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इन उग्र प्रदर्शनों के बीच कुछ मुस्लिम महिलाएं खामोशी के साथ मथुरा-दिल्ली रोड के बीचों-बीच आकर बैठ गईं। कुछ दिन गुजरे, हफ्ते बीते, लेकिन महिलाओं की भीड़ वहां जमी रही। भारतीय मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक इस प्रदर्शन ने सुर्खियां बटोरनी शुरू की। इस प्रदर्शन के पक्ष और विपक्ष में खबरें सुनते हुए मेरे मन में भी उत्सुकता हुई कि ये प्रदर्शन इतना सुचारू ढंग से कैसे चल रहा है।
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प्रदर्शन का 35वां दिन था। मैं जानना चाहता था कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो अव्यवस्थित सड़क पर एक व्यवस्थित जिंदगी स्थापित करने को कोशिश में लगे हैं। मैंने जामिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे अपने एक घनिष्ठ मित्र को फोन किया और तय हुआ कि दोनों शाहीन बाग जाकर इस पर चर्चा करेंगे। उसने कहा कि हो सकता है कि मुझे ज्यादा कुछ न बताना पड़े और तुम अपनी आंखों से देखकर समझ पाओ।
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मैं शाम में 6 बजे घर से यह कह कर निकला कि धरना स्थल जा रहा हूं और रात 10 बजे तक वापस आ जाऊंगा। जामिया मेट्रो स्टेशन के पास मेरा दोस्त आ गया और हम वहां से एक रिक्शा लेकर शाहीन बाग की ओर चल पड़े। इस धरना प्रदर्शन के लिए आने-जाने वाले लोगों से सड़क खचाखच भरी थी। थोड़ी मशक्कत के बाद हम मथुरा-दिल्ली रोड स्थित धरना स्थल पहुंच गए। 

ground report a different picture peeping from the Shaheen Bagh protest against CAA

लोगों की भीड़ अपने-अपने तरीकों से विरोध जाहिर कर रही थी। सड़क पर एक ओवरब्रिज भी है, जहां से मीडियाकर्मी तस्वीरें ले रहे थे। मैं भी अपने दोस्त के साथ ऊपर चढ़ने के लिए बढ़ा तो वहां खड़े एक स्वयंसेवी यानी वॉलिंटियर ने हमें रोक दिया। थोड़ा निवेदन के बाद उन्होंने हमें ऊपर जाने दिया।  हालांकि बाद में उसने सॉरी भी कहा।

खैर, ओवरब्रिज से इस प्रदर्शन में उमड़ा जनसैलाब एक भव्य जनांदोलन की तरह लग रहा था, जैसा कि हमने किताबों में देखा-पढ़ा है। 

मैंने उस वॉलेंटियर से जब पूछा कि आपने हमें जाने से क्यों रोका तो उनका कहना था कि कुछ असामाजिक तत्व भीड़ को उकसाने के लिए आपत्तिजनक चीजों के साथ यहां आए थे, लेकिन हमारी मुस्तैदी के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। हमारा मकसद शांतिपूर्ण प्रदर्शन का है और हमारी पूरी कोशिश है कि लोग उग्र न हों।

वॉलिंटियर की बातों को सुनकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। मैंने उनसे पूछा कि यह आंदोलन और विरोध किसलिए, जबकि सरकार तो साफ कर चुकी है कि इस कानून से किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता खतरे में नहीं? इसपर उनका जवाब था कि देश में हजारों-लाखों लोग हैं, जो मूल रूप से भारतीय हैं, लेकिन उनके पास नागरिकता प्रमाणित करने के लिए कोई मूल दस्तावेज नहीं हैं। उदाहरण के लिए आप देश के 5वें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिवार को ही ले सकते हैं। उनके परिवार के लोग अपनी नागरिकता प्रमाणित नहीं कर पाए। उनके जैसे कई लोग हैं, जिस कारण हम सीएए और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं। 

उनके जवाब ने मुझे सोच में डाल दिया। मैं थोड़ी देर चुप रहा फिर सोचने लगा कि अगर सच में, अपनी नागरिकता प्रमाणित नहीं कर पाने वाले भारतीय लोगों को अगर ये देश छोड़ना पड़े तो कितना बुरा होगा। 

इसके बाद मैंने एक अन्य वॉलिंटियर से पूछा कि क्या प्रदर्शन से कुछ सकरात्मक हो पाएगा? उनका जवाब था- मुझे नहीं पता कि इसका परिणाम हमें मिलेगा, लेकिन प्रदर्शन हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है सो हम वह कर रहे हैं। 

उस ओवरब्रिज से मेरा ध्यान वहीं केंद्रित हो गया, जहां मुझे अनेकता में एकता दिख रही थी। न केवल मुस्लिम, बल्कि अलग-अलग धर्मों के लोग इस प्रदर्शन में दिखाई दे रहे थे। सिखों और हरियाणा छत्तीस बिरादरी समेत कई अलग-अलग समुदाय की ओर से लंगर चलाया जा रहा था। 

रात 10 बजे तक घर लौटने की बात कह के आया था, लेकिन कब पौ फटने लगी, पता ही न चला। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए छात्र उर्दू के इंकलाबी शायर असरारुल हक मजाज का लिखा तराना गा रहे थे- 

सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूं, पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूं
ये मेरा चमन है, मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं

कुछ सवालों को लेकर मैं शाहीन बाग आया था, जिसके जवाब में भी कुछ सवालों को अपने साथ लेकर लौट रहा था। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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