फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Gig Workers The harsh reality of 'delivery partners' and the challenge of social security

Gig Workers: 'डिलीवरी पार्टनर' की कड़वी हकीकत और सामाजिक सुरक्षा की चुनौती

Tue, 06 Jan 2026 03:02 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Tue, 06 Jan 2026 03:02 PM IST
सार

Social Security Code 2020 GIG Workers: भारत में बढ़ते गिग इकॉनमी के बीच जोमैटो-स्विगी जैसे डिलीवरी पार्टनर्स कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। हालिया हड़ताल के बाद केंद्र सरकार ने 'सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020' के तहत उन्हें श्रमिक मानकर बीमा और पेंशन के दायरे में लाने का महत्वपूर्ण ड्राफ्ट पेश किया है।

विज्ञापन
Gig Workers The harsh reality of 'delivery partners' and the challenge of social security
गिग वर्कर्स (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : AI

विस्तार

Gig Workers Labor Laws India: तीन दशक पहले तक इस देश में ‘हड़ताल’ ऐसा शब्द था, जिसकी गूंज और असर व्यापक होता था। सरकारी, अर्द्ध सरकारी दफ्तरों और कपड़ा मिलों आदि में आए दिन हड़तालें होती रहती थीं। समाजवादी नीतियों में हड़ताल को श्रमिक का अधिकार माना जाता रहा है, जिसका वो भरपूर उपयोग करते थे। बल्कि कई बार तो यह सवाल पूछा जाता था कि सरकारी दफ्तरों में हड़ताल के अलावा काम कब होता है?
विज्ञापन


लेकिन नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद हड़ताल भी अब विरल शब्द हो गया है। अलबत्ता बीते साल के आखिरी दो दिनो में देश भर में हुई एक हड़ताल ने लोगों का ध्यान जरूर खींचा। ये वो लोग थे, जिन्हें लोग पहचानते तो हैं, लेकिन उनकी  कठिन जिंदगी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। बल्कि उनके साथ उनके नियोक्ताओं और कस्टमर का व्यवहार भी गुलामों की माफिक होता है। ये हैं-गिग वर्कर।
विज्ञापन


दो दशक पहले इन गिग कर्मचारियों के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था। लेकिन ऐप आधारिक क्विक कॉमर्स कंपनियों का जमाना आया तो लाखों युवा ( जिन्हें राइडर कहा जाता है) रोजगार की मजबूरी में ‘जो हुक्म मेरे आका’ की तर्ज पर काम करने लगे। गिग वर्कर्स को स्वतंत्र ठेकेदार, आॅन लाइन प्लेटफार्म वर्कर्स अथवा आॅन डिमांड वर्कर भी कहा जाता है। कुछ लोग इन्हें डिजीटल बंजारा भी कहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


हाल में इन्होंने अपने काम की बेहतर परिस्थितियां और ज्यादा पारिश्रमिक की मांग को लेकर दो दिन हड़ताल की थी। दावा था कि इससे देश में फूड डिलीवरी सिस्टम बैठ जाएगा। कहा गया कि इसमें 70 हजार से ज्यादा गिग वर्कर्स ने भाग लिया। हालांकि उसका ज्यादा असर नहीं हुआ और उनकी नियोक्ता कंपनियों ने हड़ताल को फेल बताया। दरअसल आजकल दो शब्द हमारे  दैनंदिन शब्दकोश का हिस्सा बन गए हैं, ये हैं-डिलीवरी ब्वॉय और कैब ड्राइवर।

कर्मचारियों की यह ऐसी जमात है, जो न तीन में है और न तेरह में। यानी वो न तो कंपनी के नियमित कर्मचारी हैं और न ही दिहाड़ी मजदूर। नियोक्ता कंपनियां इन्हें ‘ डिलीवरी पार्टनर’ कहती हैं और ऑर्डर की डिलीवरी के हिसाब से पैसा देती हैं। कहने को यह ‘पार्टनर’ हैं, लेकिन हकीकत में उनकी हैसियत ‘बिजेनस लिव-इन पार्टनर’ से भी बदतर है। कस्टमर ने जरा भी शिकायत  की तो डिलीवरी पार्टनर की आईडी ब्लॉक कर दी जाती है। डिलीवरी निर्धारित समय में करने की मजबूरी  के चलते जान का जोखिम बना ही रहता है।

यूं ‘गिग’ शब्द का निश्चित अर्थ अभी भी अस्पष्ट है। अंग्रेजी में मोटे तौर पर इसका मतलब ‘वो कोई भी काम जिसके बदले में भुगतान किया जाता से हो’ से है।‘ आधिकारिक तौर पर गिग शब्द का सबसे पहले प्रयोग अमेरिकी उपन्यासकार जैक केरोऑक ने 1952 में वहां के रेलवे ब्रेकमैन के लिए किया था। लेकिन गिग वर्करों की तस्वीर सन 2000 में तब साफ हुई, जब दुनिया में आर्थिकी का डिजीटल कायांतरण होने लगा। इंटरनेट और स्मार्टफोन इसके मुख्य टूल बने। यानी आप किसी भी क्विक कॉमर्स कंपनी के लिए ऑर्डर बुक करिए और दस मिनट में इच्छित माल हाजिर।

वस्तु की पैकिंग और उसे ग्राहक तक यथाशीघ्र डिलीवर कराने का काम गिग वर्करों का होता है। कुछ ऐसी ही स्थिति कैब ड्राइवरों की है। लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि जो इस व्यवस्था के सूत्रधार हैं, खुद उनकी जिंदगी क्या है? क्विक काॅमर्स अथवा ट्रैवल एजेंसियों के लिए ग्राहक भगवान है, लेकिन उसे संतुष्ट रखने वाला गिग वर्कर कंपनी और कस्टमर दोनो का गुलाम है।

गिग वर्करों का जाॅब फुल टाइम है, क्योंकि कब किस कंपनी का कहां से सप्लाई ऑर्डर आ जाए अथवा कब कौन कहां के लिए कैब बुक कर दे, कहा नहीं जा सकता। ग्राहक के लिए दिन और रात बराबर होते हैं। उसकी सोच है कि चूंकि वह पैसा फेंक रहा है, इसलिए उसे सब मनमाफिक चाहिए।

 जहां सेवा शर्तों की बात है तो गिग वर्कर्स नौ से पांच की पक्की नौकरी के बजाय अस्थायी, लचीले समय अवधि वाले या फ्रीलांसर के रूप में काम करते हैं। इन्हें हर काम के लिए अलग-अलग पेमेंट मिलता है। जितना काम करते हैं, उतना मेहनताना मिलता है। लेकिन तस्वीर उतनी सहज नहीं है, जितनी दिखाई पड़ती है।

इन्हीं गिग वर्करों की यूनियन तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) ने विगत 25 व 31 दिसंबर को हड़ताल का आव्हान किया था। उसे तोड़ने के लिए स्विगी और जोमैटो ने कंपनियों ने  पीक ऑवर्स और ईयर-एंड डेज पर ज्यादा इंसेंटिव देने का ऐलान भी किया। फिर भी गिग कर्मचारी उस प्रतिरोध को सफल मानते हैं।

हालांकि, उनकी नाराजगी केन्द्र सरकार की भूमिका को लेकर भी है। यूनियन के मुताबिक ऐप कंपनियां कर्मचारियों को ‘पार्टनर’ बताकर श्रम कानूनों से बच रही हैं। यह भी तय नहीं है कि वो कर्मचारी हैं या स्वतंत्र ठेकेदार।

गिग कर्मचारियों को उनके नियोक्ताओं से W-2 फॉर्म मिलता है, जिसके तहत वो कर्मचारियों को कुछ लाभ प्रदान करने, वेतन कर काटने, न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने और भेदभाव-विरोधी कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। इसके विपरीत, स्वतंत्र ठेकेदारों को 1099 फॉर्म प्राप्त होते हैं, जब वे किसी कंपनी के लिए सेवाएं प्रदान करते हैं, लेकिन वे प्रत्यक्ष कर्मचारी नहीं होते हैं।

वैसे गिग वर्कर्स की हालिया हड़ताल का इतना लाभ तो हुआ कि केन्द्र सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एक नया ड्राफ्ट पेश किया। इस सर सभी हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं। केंद्र सरकार की मंशा जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो, अमेजॉन, फ्लिपकार्ट, समेत तमाम प्लेटफॉर्म के डिलीवरी ब्वॉयज तथा ओला-उबर कैब ड्राइवर को सोशल सिक्योरिटी दायरे में लाना है। पहली बार गिग वर्कर को श्रमिक’की श्रेणी में लाया गया है।

गौरतलब है कि सरकार ने विगत 21 नवंबर 2025 को चार नई श्रम संहिताएं नोटिफाई की थीं, जिनमें गिग वर्करों का भी उल्लेख था। नए प्रस्ताव के तहत देश में गिग वर्कर के लिए एक अलग सामाजिक सुरक्षा कोष बनाया जाएगा, जिसमें कंपनियों से प्राप्त  योगदान जमा होगा। यदि कोई कंपनी तय समय पर निश्चित योगदान जमा नहीं करती है, तो उसे हर महीने एक प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। सामाजिक सुरक्षा पाने के लिए गिग वर्कर को किसी कंपनी के साथ साल भर में कम-से-कम 90 दिन काम करना होगा।

दूसरे, अगर इस अवधि में वह एक से अधिक ऐप या कंपनियों के साथ काम करता है, तो कुल मिलाकर उसे न्यूनतम 120 दिन काम करना होगा। तीसरे, गिग वर्कर को किसी दिन चाहे जितनी भी कमाई हुई हो, यदि काम किया है तो उसे एक कार्यदिवस माना जाएगा।

चौथे, अगर कोई डिलीवरी पार्टनर या कैब ड्राइवर किसी दिन ऐप के जरिये एक भी ऑर्डर या सफर को पूरा करता है, तो वह दिन उसके कामकाजी दिन के रूप में गिना जाएगा। पांचवा, यदि कोई व्यक्ति एक ही दिन में तीन अलग-अलग ऐप के लिए काम करता है, तो उसे तीन दिन का काम माना जाएगा।

इसके अलावा हर कंपनी को अपने साथ जुड़े अस्थायी कामगारों की जानकारी नियमित रूप से सरकारी पोर्टल पर अद्यतन करनी होगी। 16 साल या उससे अधिक उम्र के हर अस्थायी कामगार को 'आधार' जैसे दस्तावेजों के आधार पर एक निर्धारित पोर्टल पर अपना पंजीकरण करना होगा। पंजीकरण के बाद उन्हें एक डिजिटल पहचान पत्र मिलेगा, जिसे पोर्टल से डाउनलोड किया जा सकेगा।

हालांकि क्विक कॉमर्स कंपनियां गिग वर्करों के शोषण से इंकार करती है। जोमैटो की कंपनी इटरनल के सीईओ दीपेंदर गोयल  के अनुसार  डिलीवरी पार्टनरों का किसी तरह कोई शोषण नहीं हो रहा है। हड़ताल शरारती तत्वों ने कराई थी। इसमें कुछ राजनीतिक लोग भी थे।

उन्होंने 10 मिनट में डिलीवरी के वादे को भी तर्कसंगत बताया। बहरहाल भारत में गिग वर्कर्स की संख्या बढ़ती जा रही है। नीति आयोग ने 2022 में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि देश करीब 77 लाख गिग वर्कर्स हैं। इनमें एप बेस्ड कैब ड्राइवर से लेकर डिलीवरी एजेंट तक शामिल हैं।

आयोग का अनुमान है कि 2030 तक इन वर्कर्स की संख्या 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है। इनमें करीब 30 फीसदी महिलाएं हैं, जिनकी कार्य परिस्थितियां और भी कठिन हैं। महिला गिग वर्करों के लिए अलग से वॉशरूम भी नहीं होते।

इसी तरह ‘एक्शन एंड मूवमेंट’ और ‘इंडियन फेडरेशन ऑफ एप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स’ ने साथ मिलकर भारत में गिग वर्कर्स पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। नाम था- 'Prisoners on Wheels'।

रिपोर्ट के मुताबिक, 31% एप बेस्ड कैब ड्राइवर 14 घंटे से ज्यादा काम करते हैं।   अधिकांश को साप्ताहिक छुट्टी भी नहीं मिलती। खर्चे काटकर वो दिन में 500 से 1000 रू. तक कमा पाते हैं। सर्वे में चौंकाने वाली जानकारी यह थी कि गिग वर्करों में करीब 62% दलित और 60% आदिवासी ड्राइवर हैं, जो दिन में 14 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। इनके मुकाबले जनरल कैटेगरी के 16% और ओबीसी कैटेगरी के 26% ड्राइवर ही इतनी देर काम करते हैं।  

देश में राजस्थान और कर्नाटक ने सबसे पहले गिग वर्कर्स पर ध्यान देकर उनके हित कानून में बनाए हैं। लेकिन गिग कर्मचारियों के मिनिमम वेज, काम के घंटे और दूसरी मांगों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। ऊपर से कंपनी के वादे के मुताबिक दस मिनट में यदि डिलीवरी नहीं हुई और कस्टमर इसकी शिकायत कर दे तो नुकसान गिग वर्कर को अपनी जेब से भरना पड़ता है। यही नहीं, ऑर्डर डिलीवरी के लिए  आने-जाने के परिवहन खर्च में भी एकरूपता नहीं है।

हालांकि, कंपनियां ऑर्डर पूरा करने पर इंसेंटिव भी देती हैं, लेकिन इसकी शर्तें पूरी करना आसान नहीं होता। इसके पहले कि रोजगार का यह सेक्टर मर्ज बन जाए गिग वर्करों पर अभी से गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है, उन्हें उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि बड़ी संख्या में युवा इस क्षेत्र में रोजगार पा रहे हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed