क्यों भारत ही नहीं दुनिया के लिए खतरा हैं जीएम फसलें? क्या अलर्ट है भारत सरकार?
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वैसे तो भारतीय कृषि पहले से ही भारी संकट में है, लेकिन अब जो संकट सामने खड़ा है उसका केवल गंभीर परिणाम ही नहीं खतरनाक प्रभाव सामने आने वाला है। दरअसल, यह खतरा अनुवाशिक संशोधित फसल के कारण होगा, जिसपर अभी से दबाव नहीं बनाया गया तो दुनिया के अनाज पर कब्जा करने वाली बीज की कंपनियां भारत को पूरी तरह से बर्बाद कर देंगी।
आखिर अनुवांशिक संशोधित फसलें हैं क्या?
आनुवांशिक संशोधित फसल वे फसलें हैं, जिनके आनुवांशिक पदार्थ (डीएनए) में बदलाव किए जाते हैं। ऐसी फसलों की उत्पत्ति इनकी बनावट में अनुवांशिकीय रूपांतरण से की जाती है। इनका आनुवांशिक पदार्थ आनुवांशिक अभियांत्रिकी से तैयार किया जाता है। इससे फसलों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है और आवश्यक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।
दरअसल, इस प्रकार के अनुवांशिक अभियंत्रण की शुरुआत रूस की साम्यवादी सरकार ने प्रारंभ कराई थी। इसके जनक निकोलाई बेबीलोव को माना जाना चाहिए। बेबीलोव, बोल्शेविक पार्टी के विज्ञान आयोग न के केवल चेयरमैन थे अपितु सोवियत साम्यवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य भी थे। उन्होंने दुनियाभर के पौधों का अध्ययन किया और एक विशाल प्रयोगशाला की स्थापना की। प्रकृति के विकासक्रम को समझने और उसके जीन का अध्ययन कर उसमें परिवर्तन की बात पहली बार बेबीलोव ने ही कही थी।
हालांकि बाद में बेबीलोव का सिद्धांत मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से मेल नहीं खाया और स्टालिन के नेतृत्व वाली रूस की साम्यवादी सरकार ने बेबीलोव को उसी जुर्म में नजबंद कर दिया। उनकी विशाल प्रयोगशाला को बंद करा दिया गया। इसके बाद बेबीलोव अपनी मृत्यु तक स्टालिन की कैद में रहे। हालांकि साम्यवाद के समर्थकों का दावा है कि जेनेटिक परिवर्तन के सिद्धांत के कारण मानवतावादी स्टालिन ने बेबीलोव के प्रयोग को खारिज कर दिया और उन्हें नजबंद कर दिया था। इसके बाद इस विषय पर अमेरिका के अंदर अनुसंधान प्रारंभ हुआ।
दुनिया भर में हुआ अनुवांशिक फसलों का प्रयोग
इस तरीके से पहली बार 1990 में फसल पैदा की गई थी। सबसे पहले इस विधि से टमाटर को रुपांतरित किया गया था। कैलिफॉर्निया की कंपनी कैलगेने ने टमाटर के धीरे-धीरे पकने के गुण को खोजा था, तब उसके उस गुण के गुणसूत्र में परिवर्तन कर ये नई फसल निकाली थी। इसी तरह का प्रयोग बाद में पशुओं पर भी किया जाने लगा है।
2006 में इसी तकनीक का प्रयोग सूअर पर किया गया। उत्तरी अमेरिका में अनुवांशिकीय रूपांतरित फसलों का उत्पादन सबसे अधिक किया जाता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार विश्वभर में खाद्य पदार्थो में कमी का मूल कारण खराब वितरण है न कि उत्पादन में कमी। इस स्थिति में अनुवांशिक छेड़छाड़ अनावश्यक है, तब ऐसी फसलों के उत्पादन पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।
बता दें कि हंगरी, वेनेजुएला जैसे कई देशों ने ऐसी फसलों के उत्पादन और आयात पर रोक भी लगा दी है। फिर भी बढ़ती जनसंख्या और खाद्यानों की बढ़ती मांग को देखते हुए विश्वभर में अब कई फसलों और जानवरों पर ऐसे प्रयोग हो रहे हैं।
भारत की क्या है स्थिति?
भारत की जैवप्रौद्योगिकी नियामक संस्था ‘‘द जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी’’(बायोटेक) आनुवांशिक बदलाव किए गए बैंगन को मान्यता देने पर विचार कर रही है, लेकिन इसका भारी विरोध हो रहा है। यदि ये मान्यता मिल गई तो यह भारत में पहला आनुवांशिक संशोधित खाद्य फसल होगा। विरोधी तर्क है कि इससे स्वास्थ्य प्रभावित होगा। अब तक भारत में सिर्फ बीटी कॉटन ही वाणिज्यिक तौर पर प्रमाणित फसल थी, लेकिन अब बैंगन पर विचार किया जा रहा है।
इस मामले में खेती विरासत के संस्थापक उमेन्द्र दत्त का आरोप है कि इस प्रकार की खेती भारतीय परिप्रेक्ष्य के लिए बिल्कुल प्रतिकूल है। उन्होंने बताया कि पूरे देशभर में कई संगठन इस प्रकार के फसलों का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि खेती की विविधता को बनाए रखा जाए तो अन्न का उत्पादन जनसंख्या के हिसाब से किया जा सकता है, साथ ही अन्न के उत्पादन के साथ ही साथ उसके वितरण पर सरकार को मुकम्मल ध्यान देना चाहिए।
भारत में जिस प्रकार की मिट्टी और जलवायु है, वैसे में यह फसल अनुकूल नहीं है। इस देश के अधिकतर किसान छोटे जोत वाले हैं और वे इतनी महंगी खेती को लंबे समय तक निरंतरता नहीं दे पाएंगे, जिसका प्रतिफल होगा कि वे अपनी जमीन बेच देंगे और बड़ी कंपनियां जमीन खरीदकर अन्न पर कब्जा कर लेगी।
उमेन्द्र दत्त का कहना है कि भारत सरकार ने जिस बीटी कॉटन के व्यापारिक उत्पादन की छूट दी है उसके कारण कई क्षेत्र में बड़ी समस्या आने वाली है। उन्होंने बताया कि विगत् दिनों पंजाब में कपास की खेती पर स्वेत टीके का जबरदस्त हमला हुआ और किसानों की खेती चैपट हो गई लेकिन इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन किसानों ने बीटी किस्म के कपास की खेती की थी उन्हीं के ऊपर इस कीट का आक्रमण हुआ, जिन किसानों ने पारंपरिक बीज का उपयोग किया और जैविक तरीके से खेती की उसपर इस प्रकार के कीट का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
उमेन्द्र दत्त का कहना है कि भारत सरकार बीटी कैटन के साथ ही साथ बीटी बैंगन की मान्यता देने जा रही है। इसके बाद कुछ इसी प्रकार के प्रयोग, सरसों पर भी होंगे और हमारे देश की सरसों जो हजारों प्रकार के बीमारियों का इलाज है उसका अस्तित्व का खत्म हो जाएगा।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
साम्यवादी चिंतक और पेशे से चिकित्सक डॉ. प्यारेलाल गर्ग का मानना है कि अनुवांशिक संशोधित फसलों का सीमित क्षेत्र में विस्तार किया जाना चाहिए। खासकर व्यापारिक फसलों में इसका उपयोग हो लेकिन खाद्य फसलों पर यह प्रयोग बेहद खतरनाक साबित होगा। उनका मानना है कि सामान्य रूप से दोगले किस्म के उत्पाद की मान्यता तो दी जा सकती है, लेकिन जीन में किसी प्रकार का छेड़छाड़ मानवता के साथ अन्याय है और प्रकृति के साथ धोखा, जिसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
डॉ. गर्ग का कहना है कि जेनेटिक परिवर्तन का प्रभाव मानव के जीन पर भी पड़ता है और कालांतर में इसके कारण दुनिया की आबादी बड़े संकट में फंस सकती है।
कई समस्याएं हैं और प्रभाव है जीएम फसलों का
बीटी या अनुवांशिक परिवर्तित फसलों में केवल एक प्रकार की समस्या नहीं है। इसके उत्पादन के लिए पूरी तकनीक का उपयोग करना पड़ता है, जिसका अपना एक पैकेज है। इस पैकेज के कारण इस प्रकार के फसलों का उत्पादन तो हो जाता है, लेकिन इसका असर बेहद खतरनाक होता है। जैसे कुछ उदाहरण हैं जिस पर गौर किया जाना चाहिए।
मसलन इस साल 10 अगस्त को सैन फ्रांसिस्को की एक कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दुनिया भर में सबसे अधिक प्रयोग किए जाने वाले राउंडअप हर्बीसाइड (खरपतवार नाशक) के प्रभाव से ड्वेन जॉनसन, जो सैन फ्रांसिस्को के पास के एक स्कूल में ग्राउंडकीपर थे, को लाइलाज कैंसर हुआ हो गया। न्यायिक समिति ने सजा और क्षतिपूर्ति के रूप में कृषि प्रौद्योगिकी कंपनी मोनसेंटो को आदेश दिया कि वह जॉनसन को 2116 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा दे।
बता दें कि राउंडअप मोनसेंटो की कंपनी है। जॉनसन ने अपनी गवाही में कोर्ट से कहा था कि वह हर्बीसाइड का प्रयोग साल में 20-30 बार करते थे और कम से कम दो बार उन्हें रसायन से नहाना पड़ा। फिर 2014 में उन्हें गैर-हॉजकिन लिंफोमा हो गया। यह एक दुर्लभ कैंसर है।
राउंडअप हर्बीसाइड में पड़ने वाला मुख्य रसायन ग्लाइफोसेट है। मनुष्य और पर्यावरण पर इस रसायन के जहरीले प्रभाव की आशंका के चलते सरकारें और अंतरराष्ट्रीय जनस्वास्थ संगठन इस पर अनुसंधान कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए 2013 में भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राउंडअप से कैंसर सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी खतरे की गंभीर आशंका है। दो साल बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आइएआरसी ने ग्लाइफोसेट को मनुष्यों के लिए कैंसरकारी बताया। इस दावे के बावजूद मोनसेंटो पर अमेरिका में 5000 के लगभग केस दर्ज हैं जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि राउंडअप से कैंसर होता है।
जॉनसन का मामला ऐसा पहला केस है जिस पर सुनवाई हुई। यह केस विश्वभर में ग्लाइफोसेट के प्रयोग और इससे संबंधित नियामकों को समझने के लिए अच्छा उदाहरण है। बहुत से देशों ने ग्लाइफोसेट और उन हर्बीसाइड को, जिनमें इस रसायन का प्रयोग होता है, प्रतिबंधित करने की कोशिश की है। 2013 में अल सल्वाडोर की संसद ने ग्लाइफोसेट वाले कीटनाशकों पर रोक लगा दी। इसके अगले सालों में बेल्जियम, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल ने ग्लाइफोसेट को प्रतिबंधित कर दिया।
फ्रांस में भी इस पर प्रतिबंध के बारे में अच्छी खासी बहस चल रही है। खेतिहर मजदूरों में किडनी के रोगों की वृद्धि के मद्देनजर, श्रीलंका की सरकार ने ग्लाइफोसेट रसायन वाले कीटनाशकों पर आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया गया। भारत में कीटनाशक संबंधी कमजोर नियामक तंत्र और इसके खतरे को पहचानने में सरकार की आनाकानी के चलते, इस रसायन पर गहरी छानबीन नहीं हो सकी है।
अब अनुवांशिक परिवर्तित फसलों के साथ इस खतरनाक कीटनाशक का क्या संबंध है इसे भी समझना जरूरी है। ग्लाइफोसेट को गैरकानूनी हर्बीसाइड टॉलरेंट (एचटी) कपास की फसल में प्रयोग किया जाता है।
बता दें कि एचटी कपास आनुवांशिक संशोधित कपास है जिस पर हर्बीसाइड का असर नहीं होता। (जब ग्लाइफोसेट को एचटी कपास और उसके आसपास उगे हुए खरपतवार पर छिड़का जाता है तब यह सिर्फ खरपतवार को ही नष्ट करता है।)।
आईएआरसी की 2015 के अध्ययन के अनुसार रसायन का असर न होने वाले आनुवांशिक संशोधित फसलों के अस्तित्व में आने के बाद से दुनिया भर में ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल बढ़ा है। भारत में भी इसका प्रयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। खबरों के अनुसार भारत में भी हर्बीसाइड टॉलरेंट फसलों की गैरकानूनी खेती बढ़ने से ग्लाइफोसेट के प्रयोग में बढ़ोतरी आई है।
भारत में सरकार नहीं हैं सर्तक, मानवता की दुश्मन बनीं कंपनियां
भारत में लागू कीटनाशक नियामकों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। उदाहरण के लिए 2001 में केरल सरकार ने दुनिया भर में व्यापक स्तर पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक इंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया था।
फिर 2002 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया (हवाई छिड़काव पर प्रतिबंध जारी रहा)। जबकि, इस बात के सबूत हैं कि इस रसायन के असर से विलंबित पौरुष, शारीरिक विकृति और मानसिक रोग होते हैं)। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में देशभर में इंडोसल्फान के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
कुल मिलाकर देखें तो दुनिया के खाद्य बाजार पर दुनिया के बीज की कंपनी की नजर है। वह चाहती है कि अनाज पर नियंत्रण किया जाए। इसके लिए बीज बनाने वाली कंपनी नित् नये हथकंडे अपना रही है। यही नहीं किसानों को सब्जबाग दिखाकर वह किसानों को लूटने में भी लगी है। यह क्रम चल रहा है।
अब इन्हीं कंपनियों ने उत्पादन और गुणवत्ता के नाम पर अनुवांशिक संशोधित फसलों के उत्पादन का खेल प्रारंभ किया है। इसके उत्पादन के लिए जिस कीटनाशक दवाओं का प्रयोग हो रहा है वह मानव जाति के विनाश की आहट है। इसे समझने की जरूरत है। इसके लिए दुनिया के मानवतावादियों को इकट्ठा होना चाहिए।
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