एक उत्सव की स्मृति रेखा: जानता हूं तुम मूलाधार के स्वामी हो लेकिन मैं तुम्हें स्मृतियों के अनाहत में पाता हूं-
मनुष्य देह में स्थित सात चक्रों में गणेश मूलाधार चक्र के स्वामी हैं, किंतु मैं उन्हें अपने अनाहत चक्र में पाता हूं। हृदय संसार में। जहां अतीत प्रवाहित होता है।
मेरे लिए गणेशोत्सव यानी छोटे से पंडाल में कसी जा रही जूट की रस्सी और बांस की सुगंध का भीतर तैरना। 11 दिन के प्रसाद का मेनू कार्ड-खीरे-केले का महकना। खोपरे और शक्कर के बुरादेे की सुगंध। कस्बे के बाजारों की मूर्ति के पीछे घूमते थकते पैर..! धड़कता हुआ इंदौर, झांकियों में गूंजता उल्लास, मुंबई की सैंकड़ों गलियों में उमड़ाता जनसैलाब, लोकल ट्रेन में गूंजते जयकारे, लालबाग के राजा की भव्यता, लोअर परेल में कहीं गुम हो जाना है..!
मेरे लिए गणेशोत्सव यानी छोटे से पंडाल में कसी जा रही जूट की रस्सी और बांस की सुगंध का भीतर तैरना। 11 दिन के प्रसाद का मेनू कार्ड-खीरे-केले का महकना। खोपरे और शक्कर के बुरादेे की सुगंध। कस्बे के बाजारों की मूर्ति के पीछे घूमते थकते पैर..! धड़कता हुआ इंदौर, झांकियों में गूंजता उल्लास, मुंबई की सैंकड़ों गलियों में उमड़ाता जनसैलाब, लोकल ट्रेन में गूंजते जयकारे, लालबाग के राजा की भव्यता, लोअर परेल में कहीं गुम हो जाना है..!
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वे रूप में स्थायीत्व हैं। स्थापित की स्थिरता। पृथ्वी तत्व का प्रतीक। पौराणिक कथाओं की अनगिनत श्रृंखला उनके स्वरूपों को उनके जीवन के समानांतर रचती चलती है। नामों की असंख्य पुकार भी तो वही है। प्रार्थना के आर्त भाव से उपजी अभिव्यक्तियां। कहीं विघ्नों को हरने की उपस्थिति है तो कहीं शुभ और मंगल को अच्छादित कर देने वाली शक्ति।
वे वेदव्यास के लेखक/लिपिक और गणों के ईश श्री गणेश हैं/ गज मुख वाले गजानन हैं/ वरदमूर्ति और मंगलमूर्ति हैं/ विनायक के अष्टरूपों में विराजित हैं। ऊर्जावान योगी और नर्तक भी तो हैं। रिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ और मंगल के देवता।
सभी दिशाओं के स्वामी और प्रथम पूज्य के रूप में गणेश जितने ऐतिहासिक हैं उतने ही पौराणिक भी हैं।
पुरातत्व की विरासत में उनकी उपस्थिति देश के संग्रहालयों में शोभा बढ़ाती रही है। धातुओं और मिट्टी में आकार लिए उनकी देह की गौरवशाली प्रतिमाएं मिथकों और इतिहास के बीच कौतुहूल रचती यात्रा ही तो है।
विनायक हर जगह हैं क्योंकि वे प्रथम में समाहित हैं तो अनंत का विसर्जन भी हैं। उनके आयाम बहुआयामी हैं। हर दिक्-दिशाओं में विराजित देव। स्वामी। वे राष्ट्र की पौराणिक यात्रा की धुरी हैं तो इतिहास से वर्तमान में चली आ रही ऐसी स्मृति रेखा हैं जो काल के प्रवाह में आजतलक फीकी नहीं पड़ी। मंद नहीं पड़ी अपितु जितनी ज्यादा अनवरत् हुई उतनी ज्यादा सुर्ख और गहरी होती चली गई है-
सच कहूं तो श्री गणेश मेरे मानस पटल पर रची वही स्मृति रेखा है जो समय के साथ जितनी दूर चली जाती है उतनी ही आत्मा में गहरी खिंचती चली जाती है।
दरअसल, श्री गणेश अपने सामाजिक/ सांस्कृतिक/पौराणिक और अध्यात्मिक स्वरूपों के इतर मेरे लिए स्मृतियों के देवता रहे हैं। वे मेरे लिए अतीत की स्मृतियों का ऐसा रोचक/ आश्चर्य और उल्लास व उमंग से भरा गलियारा है जहां से लौटना मुझे सदा समृद्ध की आंतरिक संपदा से सम्पन्न करता रहा है।
लंबोदर- तुम्हें देखते ही मेरे भीतर गली-मोहल्ले का बचपन साकार हो उठता है। तुम्हें स्थापित करने की योजनाएं किसी महत्वपूर्ण चर्चा की तरह मुस्काने लगती है। मूर्ति के तरह-तरह के आकार सामने आते हैं। 11 से 21 रुपये तक की चंदे की रसीदें और 51 रुपये मिलने की खुशी मुस्कुाने लगती है। छोटे से पंडाल में कसी जा रही जूट की रस्सी और बांस की सुगंध अंदर तैरने लगती है। 11 दिन के प्रसाद का मेनू कार्ड आंखों के सामने तैरने लगता है। खीरे-केले महकने लगते हैं/ खोपरे और शक्कर के बुरादेे की सुगंध तैरने लगती है /कस्बे के बाजारों की मूर्ति के पीछे घूमते थकते पैर याद आने लगते हैं- तरह-तरह के चक्र, साज-सज्जा की चीजें, झालरें, चमचमाती लाइट की लड़ियां, देर रात का जगना, भोली-मासूम कल्पनाओं में खो जाना और फिर कस्बे की तमाम झांकियों/ गणपति पंडालों में देर रात भटकते हुए घर लौट आना यह सबकुछ मेरे भीतर आकार लेने लगता है- तुम्हारी आंखों में झांकते ही स्मृतियों की असंख्य बेल देखते ही हरी-भरी होने लगती है-
गणपति का होना मेरे लिए यही सबकुछ तो होना रहा है-
हे विनायक..
योग की अवधारणा में निहित मनुष्य देह में स्थित सात चक्रों में भगवान गणेश मूलाधार चक्र के स्वामी हैं, किंतु मैं तुम्हें अपने अनाहत चक्र में पाता हूं! हृदय संसार में। जहां मेरा अतीत प्रवाहित होता है।-
मेरे लिए गणेशोत्सव यानी धड़कता हुआ इंदौर, झांकियों में गूंजता उल्लास, मुंबई की सैंकड़ों गलियों में उमड़ाता जनसैलाब, लोकल ट्रेन में गूंजते जयकारे, लालबाग के राजा की भव्यता, लोअर परेल में कहीं गुम हो जाना है। औरंगाबाद के अद्भुत और अद्वितीय परंपरा संसार में भटकने लगना है, लेजिम की थाप और लता-उषा के मराठी संगीत से सराबोर हो उठना है-
तुम्हें पता है वरमूर्ति, तुम्हारा होना मेरे भीतर उमंग से नहाना/ प्रेम व स्नेह के गूंजते उल्लास में खो जाना है जिसका कहीं किसी शब्द संसार में वर्णन नहीं है-
गणेश तुम मेरे भीतर चमकता हुआ स्मृति पुंज हो। सुदूर कोनों से उठती पुकार जो हममें एकता स्थापित करती है।
हे गणेश..!
दिल की इन गलियों में देखो ना आज मेरी भी पीढ़ियां शामिल हो रही हैं. मैं तुम्हारा स्थायीत्व नहीं विसर्जन स्वीकार करुंगा-
मंगलकामनाएं..