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किसान आंदोलन के 100 दिनः बस एक कॉल की दूरी
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सौ दिन के आंदोलन का नतीजा अब तक सिफर रहा
- फोटो : social media
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6 मार्च यानी आज दिल्ली में किसान आंदोलन के सौ दिन पूरे गए हैं। सौ दिन के आंदोलन का नतीजा अब तक सिफर रहा। सरकार और आंदोलनकारी किसान महज एक फोन कॉल की दूरी पर हैं, लेकिन कॉल कनेक्ट नहीं हो रही है। आंदोलन में सियासत दोनों तरफ जारी है। 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगा अपमान की घटना के बाद एक बार फिर आंदोलनकारियों ने सौ दिन पूरे होने पर 6 मार्च को कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) एक्सप्रेस वे जाम कर शक्ति प्रदर्शन का निर्णय लिया है। हालांकि यह समर्थन जुटाने और समर्थन परखने की कोशिश है। शनिवार को दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर के आंदोलनस्थलों पर जाम की तैयारी है। 8 मार्च को महिला दिवस पर महिलाओं की जुटान होगी। 9 मार्च को संयुक्त मोर्चा आगे की रणनीति तय करेगा।
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यूपी में पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है। हरियाणा, यूपी, राजस्थान में ताबड़तोड़ किसान पंचायतें हो रही हैं। निकाय चुनाव से इतर बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खुद किसान मुद्दे को उछाल रहा है। निशाने पर ममता बनर्जी हैं। वहां किसानों के सवाल त्रिकोण रूप ले चुका है। एक तरफ केंद्र सरकार राज्य सरकार को किसान विरोधी बता रही है। दूसरी तरफ आंदोलनकारी किसान केंद्र सरकार को किसान विरोधी ठहरा रही है। किसान मुद्दे की फसल किसकी जमीन पर लहलहाती है, यह नतीजे से साफ होगा।
भाजपा कहती है कि ममता की वजह से बंगाल के 70 लाख किसानों को पीएम सम्मान निधि का लाभ नहीं पहुंचा। केरल के वाम किले में किसान आंदोलन के वाम रिश्ते से केंद्र विरोधी हवा तेज हो सकती है। पहले किसान संगठनों ने सियासी नेताओं से छुआ-छूत जैसी दूरी बनाए रखी लेकिन अब यूपी में कांग्रेस की अलग, रालोद की अलग, सपा की अलग-अलग किसान पंचायतें होने लगी हैं। कहीं प्रियंका, कहीं जयंत तो कहीं अखिलेश नजर आ रहे है। इनके साथ कई किसान नेता। इसे यूपी विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव में आजमाने की तैयारी है।
पंजाब के किसान संगठनों का कहना है कि दरअसल, पंजाब में महापंचायत की जरूरत नहीं। जहां जरूरत है, वहां पंचायतों के जरिए विस्तार दिया जा रहा है। हालांकि, अंदर की बात यह है कि 26 जनवरी की घटना के बाद एकाएक राकेश टिकैत के उभरने से पंजाब के किसान संगठनों में बेचैनी है। हालांकि, इसी बेचैनी को देखकर राकेश टिकैत बार-बार यह बयान दे रहे हैं कि न मंच बदला, न पंच, फैसले संयुक्त मोर्चे के बैनर तले ही होंगे।
हरियाणा में गुरनाम सिंह चढूनी ने हरियाणा के किसान संगठनों को मिलाकर अपना अलग मोर्चा बना रखा है। पंजाब के संगठन, यूपी के हरियाणा, राजस्थान के खाप और जाट के अलावा नरम और गरम विचार वाले किसान संगठन अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। हालांकि, संयुक्त मोर्चा की बागडोर संभालने वाले छह में से कई नेता मानते हैं कि अगर आंदोलनकारी किसान संगठन एक नहीं रहें तो नुकसान होगा। उधर, सरकार समर्थक कई किसान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट के पैनल के सामने अपनी बात रख रहे हैं। किसानों की रायशुमारी भी जारी है। सुप्रीम कोर्ट पर भी नजरें टिकी हैं। ऐसे में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच दूरी बरकरार है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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- महज एक कॉल की दूरी
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- सियासत इधर भी
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यूपी में पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है। हरियाणा, यूपी, राजस्थान में ताबड़तोड़ किसान पंचायतें हो रही हैं। निकाय चुनाव से इतर बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खुद किसान मुद्दे को उछाल रहा है। निशाने पर ममता बनर्जी हैं। वहां किसानों के सवाल त्रिकोण रूप ले चुका है। एक तरफ केंद्र सरकार राज्य सरकार को किसान विरोधी बता रही है। दूसरी तरफ आंदोलनकारी किसान केंद्र सरकार को किसान विरोधी ठहरा रही है। किसान मुद्दे की फसल किसकी जमीन पर लहलहाती है, यह नतीजे से साफ होगा।
भाजपा कहती है कि ममता की वजह से बंगाल के 70 लाख किसानों को पीएम सम्मान निधि का लाभ नहीं पहुंचा। केरल के वाम किले में किसान आंदोलन के वाम रिश्ते से केंद्र विरोधी हवा तेज हो सकती है। पहले किसान संगठनों ने सियासी नेताओं से छुआ-छूत जैसी दूरी बनाए रखी लेकिन अब यूपी में कांग्रेस की अलग, रालोद की अलग, सपा की अलग-अलग किसान पंचायतें होने लगी हैं। कहीं प्रियंका, कहीं जयंत तो कहीं अखिलेश नजर आ रहे है। इनके साथ कई किसान नेता। इसे यूपी विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव में आजमाने की तैयारी है।
- सियासत उधर भी
पंजाब के किसान संगठनों का कहना है कि दरअसल, पंजाब में महापंचायत की जरूरत नहीं। जहां जरूरत है, वहां पंचायतों के जरिए विस्तार दिया जा रहा है। हालांकि, अंदर की बात यह है कि 26 जनवरी की घटना के बाद एकाएक राकेश टिकैत के उभरने से पंजाब के किसान संगठनों में बेचैनी है। हालांकि, इसी बेचैनी को देखकर राकेश टिकैत बार-बार यह बयान दे रहे हैं कि न मंच बदला, न पंच, फैसले संयुक्त मोर्चे के बैनर तले ही होंगे।
हरियाणा में गुरनाम सिंह चढूनी ने हरियाणा के किसान संगठनों को मिलाकर अपना अलग मोर्चा बना रखा है। पंजाब के संगठन, यूपी के हरियाणा, राजस्थान के खाप और जाट के अलावा नरम और गरम विचार वाले किसान संगठन अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। हालांकि, संयुक्त मोर्चा की बागडोर संभालने वाले छह में से कई नेता मानते हैं कि अगर आंदोलनकारी किसान संगठन एक नहीं रहें तो नुकसान होगा। उधर, सरकार समर्थक कई किसान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट के पैनल के सामने अपनी बात रख रहे हैं। किसानों की रायशुमारी भी जारी है। सुप्रीम कोर्ट पर भी नजरें टिकी हैं। ऐसे में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच दूरी बरकरार है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।