वर्तमान की जरूरत: बच्चों का विकास और बाल मनोविज्ञान
विडंबना है की हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ रही है इसके बावजूद भी मानसिक स्वास्थ्य विषय उपेक्षित है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2016 दर्शाता है की भारत में ऐसे करीब 150 मिलियन नागरिक हैं जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य कल्याण के लिए देखभाल और सहायता की आवश्यकता है। इनमें 70 से 90 प्रतिशत लोग सही समय पर गुणवत्ता युक्त सहायता प्राप्त नहीं कर पाते।
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कहते हैं स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण होता है और मानव मस्तिष्क से गहरा संबंध स्थापित करता है मनोविज्ञान! बच्चों के उत्तम विकास के लिए उनके बाल मन को समझना उतना ही आवश्यक है जितना समाज के लिए उनका 'विकास'। किसी भी देश- समाज का निर्माण यदि मजबूत हाथों में हो तो निश्चित रूप से वह समाज और देश तरक्की के नए आयामों को छुएगा। बच्चों के शारीरिक विकास के लिए उनके मनोविज्ञान को समझना होगा।
हैडो कमेटी रिपोर्ट इंग्लैंड के अनुसार, 'ग्यारह-बारह वर्ष की आयु में बालकों की नसों में ज्वार उठना आरंभ होता है, उसे किशोरावस्था के नाम से जाना जाता है। यदि इस ज्वार के चढ़ाव के समय का उपयोग कर लिया जाए और इसकी शक्ति और धारा के साथ नई यात्रा आरंभ कर दी जाए तो बालकों का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है और सफलता प्राप्त की जा सकती है।
बच्चों के विकास और सीखने की प्रक्रिया उनके जन्म से ही शुरू हो जाती है। उनके कोमल हृदय में सुनहरा संसार मौजूद रहता है, भले ही वे उम्र में बेहद छोटे हों लेकिन उनकी सीखने की शक्ति बड़ों से तेज होती है। वे ज्यादातर आचरण देखकर ही सीख जाते हैं और धीरे- धीरे यह आचरण व्यवहार में तब्दील हो जाता है। यदि हम सभ्य समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो अत्यंत आवश्यक है अपने बच्चों को उचित शिक्षा दें। बच्चों के सर्वांगीण विकास की शुरुआत उनके मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाकर की जाए तो यह उनके सफल भविष्य की आधारशिला बन सकती है।
पारिवारिक वातावरण और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य
एक सर्वे के अनुसार मनोवैज्ञानिकों का कहना है की बच्चों को बुरी तरह प्रभावित करने वाले अभिभावक अक्सर वे होते हैं जो अपने बचपन में अपने अभिभावकों के द्वारा या तो उपेक्षित रहे थे या किसी ना किसी वजह से पीड़ित किए गए थे। संभवतः इसीलिए कहा गया है की पारिवारिक वातावरण का प्रभाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
आधुनिक परिवारों में ज्यादातर माता- पिता दोनों ही कामकाजी होते हैं ऐसे में अक्सर बच्चों की जिम्मेदारी घर के नौकरों पर आ जाती है, जो कभी-कभी बच्चों के जीवन के लिए काल बन जाती है। बच्चों को प्रताड़ित करने के दिल दहलाने वाले कई वीडियो सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं, जिन्हें देख मानवता शर्मसार होने लगती है। ऐसे घटनाक्रम समाज का भयावह रूप प्रस्तुत करते हैं। बच्चों के मानसिक स्वस्थ्य पर यह प्रभाव कई बार लम्बे समय तक गहरा असर छोड़ जाते हैं।
बच्चें जैसे-जैसे बड़े होते हैं उनके मानसिक स्वास्थ की देखभाल और भी जरूरी हो जाती है। माता पिता को उन्हें समझना अति आवश्यक हो जाता है। हर बच्चे में कोई ना कोई विशेष गुण होता है, कुछ बच्चे पढ़ने में अच्छा करते हैं तो कुछ का मन पढ़ने में बिल्कुल नहीं लगता उन्हें कुछ और करना होता है, इस पर हम नंबरों का दबाव उनपर बनाते हैं जो बिल्कुल भी उचित नहीं है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जैसे- पढ़ाई से संबंधित समस्याएं, शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं, अकेलापन, एकाग्रता का कम होना, वर्तमान में सोशल मीडिया और मोबाइल का अत्याधिक प्रयोग भी ज्यादातर समय तनाव में रहने के लिए जिम्मेदार है।
कहते हैं बचपन का सबसे कठिन दौर किशोरकाल होता है जिसमें बच्चों को सबसे ज्यादा मानसिक असंतुलन का सामना करना पड़ता है। हमारा प्रयास होना चाहिए की हम बच्चों को मशीनी दौड़ से निकालकर प्रकृति से सुनहरा तालमेल बैठाना सिखाएं। ताकि उनका संपूर्ण विकास हो सके। हमारे बच्चों में बचपन से ही बढ़ता तनाव उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर रहा है, जिसे समझना बेहद आवश्यक है।
कोरोना काल का दुष्प्रभाव
कोरोना काल में जब स्कूल- कॉलेज बंद रहे, ज्यादातर बच्चे प्रमोट कर दिए गए ऐसे में उन्हें समझना और उनकी समस्याओं को हल करना बेहद जरूरी है ताकि उनकी पढाई को तनाव मुक्त बनाया जा सके। बदलती जीवनशैली में बच्चे कई तरह की मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई बच्चे तो ऐसे भी हैं जिन्हें किसी मनोचिकित्सक की तत्काल आवश्यकता है, ताकि उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान मिल सके।
अक्सर बच्चें बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते सामाजिक जीवन से दूर होते जा रहे हैं, जीवन के उतार- चढ़ाव को पार करने की शक्ति उनमें लगातार कम हो रही है, ऐसे बच्चों को पढ़ाई के अलावा दूसरी बातों के लिए जीवन में स्पेस की आवश्यकता है, जिसे हमें समझना बेहद जरूरी है।
विद्यालय और परिवार ऐसी सामाजिक इकाइयां हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं कल्याण से सीधा संबंध रखती हैं। विद्यालयों का प्रमुख दायित्व है की छात्रों का समग्र विकास हो ताकि वे जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी हल खोज सकें। वर्तमान में हमारे स्कूल, कालेजों में मनोवैज्ञानिकों की बेहद आवश्यकता है। जो देश के अधिकांश स्कूलों में मौजूद ही नहीं है। स्वस्थ जीवन का आधार शिक्षा है। छात्रों के बेहतर प्रदर्शन के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य का फिट रहना अत्यंत आवश्यक है।
विडंबना है की हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ रही है इसके बावजूद भी मानसिक स्वास्थ्य विषय उपेक्षित है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2016 दर्शाता है की भारत में ऐसे करीब 150 मिलियन नागरिक हैं जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य कल्याण के लिए देखभाल और सहायता की आवश्यकता है। इसके साथ यह भी पता चलता है की इनमें से 70 से 90 प्रतिशत लोग सही समय पर गुणवत्ता युक्त सहायता प्राप्त नहीं कर पाते।
विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार किशोरावस्था में आत्म क्षति दर वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा होती है। ज्यादातर शारीरिक बीमारी के लिए भावनात्मक तनाव और अन्य चिंताएं भी एक कारण हैं। यदि इन समस्याओं का सही समय पर पुखता हल ढूंढ लिया जाए तो कई खतरों से बचा जा सकता है। स्टेनले हाल का यह कथन कि "किशोरावस्था बड़े संघर्ष, तनाव तथा विरोध की अवस्था है, वास्तव में सही जान पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए पहल
हालांकि भारत सरकार ने हाल के दिनों में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कई ऐप और हेल्प लाइन शुरू की हैं जिनमें सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के द्वारा तनाव, चिंता, अवसाद और आत्महत्या के विचारों आदि मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं का सामना करने वाले लोगों की सहायता करने के लिए 24/7 टोल फ्री हेल्प लाइन है।
मनोदर्पण पहल- यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत शिक्षा मंत्रालय की एक पहल है l जिसका उद्देश्य कोविड-19 के दौरान मनो सामाजिक सहायता प्रदान करना रहा है।
सीबीएसई द्वारा कक्षा 9 से 12 के लिए ऐप "दोस्त फॉर लाइफ" लॉन्च किया था, जिसका उद्देश्य छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना ही था। सरकार द्वारा किए गए ये सकारात्मक प्रयास मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए ही हैं। यद्यपि इतना कुछ करने के बावजूद मानसिक स्वास्थ्य की चिंता समाप्त नहीं होती और ना ही चुनौतियां पूरी होती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या एक जटिल समस्या है इसके लिए सरकार को और अधिक प्रयास करने होंगे साथ ही और अधिक मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकों की संख्या में वृद्धि करनी होगी साथ ही समाज और परिवार को भी अपने बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य पर नज़र रखनी होगी ताकि कोई पुख्ता हल निकाला जा सके।
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