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एग्जिट पोल 2019: कितने भरोसेमंद हैं अनुमान? क्या सटीक होंगे परिणाम?

Gautam Chaudharyगौतम चौधरी Updated Sun, 19 May 2019 07:15 PM IST
ये अनुमान हर बार सटीक भले ही न बैठें हों लेकिन सीटों का अनुमान सामने आता है
ये अनुमान हर बार सटीक भले ही न बैठें हों लेकिन सीटों का अनुमान सामने आता है - फोटो : Amar Ujala
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17वीं लोकसभा के लिए रविवार को सातवें चरण यानी अंतिम चरण का मतदान संपन्न हो गया। वोटिंग खत्म होते ही सभी पार्टियों और आम जनता की नजर अब चुनाव परिणाम पर जाकर टिक गई है। चुनाव परिणाम का अनुमान लगाने वाली एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं। ये अनुमान हर बार सटीक भले ही न बैठें हों, लेकिन नतीजों से पहले चुनाव परिणाम की झांकी यह तो साबित ही कर देती है कि आखिर किसका पलड़ा भारी है और किसका हल्का। मसलन एग्जिट पोल्स यह साबित तो कर ही देता है कि किस पार्टी की स्थिति कैसी है। 
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कैसे शुरू हुआ एग्जिट पोल 
लगभग सभी बड़े चैनल्स विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स दिखाती हैं। इसमें बताया जाता है कि नतीजे किसके पक्ष में होंगे और किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं। इनसे एक मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है कि नतीजे क्या आ सकते हैं। हालांकि, यह कहना ठीक नहीं कि चुनाव के नतीजे एग्जिट पोल्स के अनुसार ही हों। भारत में सबसे पहले एग्जिट पोल 1960 में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने जारी किए थे। 

क्यों नहीं होते हैं सटीक परिणाम? 
सबसे पहले यह जानते है कि एग्जिट पोल करने का तरीका क्या होता है? एग्जिट पोल के लिए तमाम एजेंसीज वोट डालने के तुरंत बाद वोटर्स से उनकी राय जानती हैं और उन्हीं रायों के आधार पर परिणाम पूर्व अनुमान लगाया जाता है। भारत में जहां चुनाव विकास से लेकर जाति-धर्म जैसे तमाम मुद्दों पर लड़ा जाता है, ऐसे में मतदाता ने किसको वोट दिया है, यह पता करना भी आसान नहीं है। अक्सर मतदाता इस सवाल का सही जवाब नहीं देते कि उन्होंने किसे वोट दिया। इस वजह से भी एग्जिट पोल्स चुनावी नतीजों से विपरीत जाते रहे हैं। ऐसे में एग्जिट पोल पर पूर्णतः भरोसा नहीं किया जा सकता। 

ओपिनियम पोल और एग्जिट पोल 
यहां यह बताना जरूरी है कि एग्जिट पोल और चुनाव से पहले ओपिनियन पोल में थोड़ा अंतर है। ओपिनियन पोल में वोटर्स की राय जानी जाती है और उसी आधार पर सर्वे तैयार किया जाता है, जबकि एग्जिट पाल में चुनाव परिणाम के बारे में बताई जाती है।

रीप्रिजेंटेशन ऑफ द पीपल ऐक्ट, 1951 के सेक्शन 126 के तहत चुनाव के शुरू होने से पहले और आखिर चरण की वोटिंग के खत्म होने के आधे घंटे बाद ही एग्जिट पोल्स दिखा सकते हैं। सेक्शन में साफ कहा गया है कि कोई भी किसी भी तरह के एग्जिट पोल को मीडिया के किसी रूप (प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक) में दिखा या छाप नहीं सकता। इस नियम को तोड़ने पर दो साल की सजा, जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। 
 
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