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क्या भावनाओं के उन्माद के हाथों न्याय व्यवस्था पिट रही है?

Bhupendra Guptaभूपेंद्र गुप्ता Updated Mon, 09 Dec 2019 10:17 AM IST
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72 साल के परिपक्व जनतंत्र में यह थकान कैसे आई ? क्या हमें यह एक राष्ट्र के रूप में नहीं सोचना चाहिए?
72 साल के परिपक्व जनतंत्र में यह थकान कैसे आई ? क्या हमें यह एक राष्ट्र के रूप में नहीं सोचना चाहिए? - फोटो : PTI
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उन्नाव में जब भाजपा के मंत्री कह रहे थे कि बलात्कार जैसे दुष्कर्म को भगवान राम भी नहीं रोक सकते, उसी समय हैदराबाद में पुलिस कथित दुष्कर्मियों को  क्रास फायरिंग के कथित प्रयास में गोलियां मार रही थी। कई पत्रकार इसे नगद न्याय बता रहे हैं तो कई इसे अनुचित बता रहे हैं। जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस पर फूलों की बारिश कर रहा था, उसे सेल्यूट कर रहा था।
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यह मिश्रित प्रतिक्रिया देश के विभाजित मन का संकेत दे रही है। ऐसा लगता है अराजकता भीड़वाद, रेपवाद, गैंगवाद से थका हुआ देश इस कथित त्वरित न्याय के पक्ष में खड़ा हो रहा है। प्रश्न यह उठता है कि क्या वे ताकतें जो संविधान की निरर्थकता सिद्ध करने को आतुर हैं वे सफल हो रहीं हैं। क्या भावनाओं के उन्माद के हाथों न्याय  व्यवस्था पिट रही है। भीड़ के हाथ में फैसले छोड़ देने की चेष्टाएं जीततीं दिखाई दे रहीं हैं। तर्क और नियमन परास्त हो रहे हैं।

72 साल के परिपक्व जनतंत्र में यह थकान कैसे आई ? क्या हमें यह एक राष्ट्र के रूप में नहीं सोचना चाहिए? आखिर न्याय को इतना लंबा खींचने की प्रवृत्ति कि वह निरर्थक लगने लगे ही तो इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं है? आखिर ये सवाल एक राष्ट्र के रूप में क्यों नहीं उठता कि जो न्यायाधीश मैदान में उतरकर देश से कह रहे थे कि अब मौन रहना देश, लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए खतरा है वे ही साल भर बाद जाते- जाते कहने लगे कि मौन रहने में ही स्वतंत्रता है।

क्या यह छोटा वक्तव्य है कि समूची न्याय व्यवस्था इस धारणा से अभिप्रेत हो जाए कि मौन ही स्वायत्तता है। क्या इस गूंगी न्याय व्यवस्था को आगे बढ़ाने का ही यह परिणाम है कि जनता इस कथित नकद न्याय पर फूल बरसा रही है। न्याय व्यवस्था के लिए यही उचित  समय है कि वह मौन को स्वाधीनता मानने वाले इस धुंधलके से न्याय को रोशनी में लाए, अन्यथा कल न्याय व्यवस्था ही निरर्थक सिद्ध हो जायेगी, लोग हाथ में कानून उठायेंगे और नकद न्याय की उत्कंठा संविधान की अपरिहार्यता को धराशायी कर देगी।
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