क्या भावनाओं के उन्माद के हाथों न्याय व्यवस्था पिट रही है?
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उन्नाव में जब भाजपा के मंत्री कह रहे थे कि बलात्कार जैसे दुष्कर्म को भगवान राम भी नहीं रोक सकते, उसी समय हैदराबाद में पुलिस कथित दुष्कर्मियों को क्रास फायरिंग के कथित प्रयास में गोलियां मार रही थी। कई पत्रकार इसे नगद न्याय बता रहे हैं तो कई इसे अनुचित बता रहे हैं। जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस पर फूलों की बारिश कर रहा था, उसे सेल्यूट कर रहा था।
यह मिश्रित प्रतिक्रिया देश के विभाजित मन का संकेत दे रही है। ऐसा लगता है अराजकता भीड़वाद, रेपवाद, गैंगवाद से थका हुआ देश इस कथित त्वरित न्याय के पक्ष में खड़ा हो रहा है। प्रश्न यह उठता है कि क्या वे ताकतें जो संविधान की निरर्थकता सिद्ध करने को आतुर हैं वे सफल हो रहीं हैं। क्या भावनाओं के उन्माद के हाथों न्याय व्यवस्था पिट रही है। भीड़ के हाथ में फैसले छोड़ देने की चेष्टाएं जीततीं दिखाई दे रहीं हैं। तर्क और नियमन परास्त हो रहे हैं।
72 साल के परिपक्व जनतंत्र में यह थकान कैसे आई ? क्या हमें यह एक राष्ट्र के रूप में नहीं सोचना चाहिए? आखिर न्याय को इतना लंबा खींचने की प्रवृत्ति कि वह निरर्थक लगने लगे ही तो इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं है? आखिर ये सवाल एक राष्ट्र के रूप में क्यों नहीं उठता कि जो न्यायाधीश मैदान में उतरकर देश से कह रहे थे कि अब मौन रहना देश, लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए खतरा है वे ही साल भर बाद जाते- जाते कहने लगे कि मौन रहने में ही स्वतंत्रता है।
क्या यह छोटा वक्तव्य है कि समूची न्याय व्यवस्था इस धारणा से अभिप्रेत हो जाए कि मौन ही स्वायत्तता है। क्या इस गूंगी न्याय व्यवस्था को आगे बढ़ाने का ही यह परिणाम है कि जनता इस कथित नकद न्याय पर फूल बरसा रही है। न्याय व्यवस्था के लिए यही उचित समय है कि वह मौन को स्वाधीनता मानने वाले इस धुंधलके से न्याय को रोशनी में लाए, अन्यथा कल न्याय व्यवस्था ही निरर्थक सिद्ध हो जायेगी, लोग हाथ में कानून उठायेंगे और नकद न्याय की उत्कंठा संविधान की अपरिहार्यता को धराशायी कर देगी।
न्याय के इस नए रूप ने देश में इस भावना को मजबूत कर दिया है कि यही त्वरित न्याय उन्नाव में क्यों नहीं किया गया? यही न्याय उन राक्षसों के साथ क्यों नहीं किया गया जो आश्रम जैसे पवित्र स्थानों का उपयोग व्याभिचार के लिये करते पाए गए हैं। राजनैतिक संरक्षणवाद के आगे न्याय व्यवस्था की लाचारी ही देश में नगद न्याय के पक्ष में एक ज्वार की तरह सामने आई है। क्या न्याय प्रणाली यह सोच पायेगी कि निर्भया को न्याय देने में उन्होने जो देरी की है वही उसे निरर्थक बना रहा है।
2014 में देश में 34 हजार रेप की घटनाएं हुईं थीं जो बढ़कर 2016 में लगभग 39 हजार तक पहुंच गईं। ये आंकड़े स्वयं एक वक्तव्य हैं। इन 39 हजारों मामलों में जो सबसे चर्चित निर्भया प्रकरण है, उसमें ही अब तक फैसला नहीं हुआ है। अब भले ही तीन दिन में बलात्कारियों को फांसी देने का सरकारें दावा करतीं रहें। किंतु वस्तुस्थिति यही है कि पीढि़तायें ही भयाक्रांत हैं ।
जिस तरह से भद्र समाज और कथित गुरु इत्यादि इस व्याभिचार प्रवाह में बहते दिखाई दे रहे हैं, उससे समाज दहल गया है । उसे लगता है कि किस पर विश्वास करें किस पर न करें। क्या ऐसा ही समाज बनाकर विश्व गुरू बना जा सकता है। इस त्वरित न्याय ने अराजक रूप धारण कर लिया तो सब कुछ हम खो देंगे। ऐसी घटनाएं सामने आने लगीं हैं जहां आरोपियों को जनता ने पुलिस सुरक्षा में घेरकर पीटना शुरू कर दिया और पुलिस को सुरक्षा करने में दो-दो पड़ गई।
न्यायपालिका एवं विधायिका पर राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण जनता में घोर अविश्वास ही इस वातावरण का जन्मदाता है। न्याय प्रणाली के पास अब भी समय है कि वह अपने अंदर झांके क्योंकि बढती घटनाएं और उनका नाद करने वाला प्रचार ही समाज को उस अंधेरे न्याय की तरफ धकेल रहा है जहां सिस्टम हार जाए, व्यवस्था विखर जाए और लाठी वाला जब भैंस लेकर निकले तो समाज तालियां बजाये। क्या राष्ट्र के रूप में यही हमारी अपेक्षा है ?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।