कोरोना संकट और डूबती अर्थव्यवस्था: गिरती GDP और बिगड़ते आर्थिक हालात पर भी सोचिए
जिन दिनों मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के रूप में देश को उदारीकरण की तरफ ले जा रहे थे उन दिनों मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में एमए कर रहा था। तब प्रो. एके सेन गुप्ता और प्रो.अरविंद मोहन जैसे बेहतरीन अर्थशास्त्री गुरु हुआ करते थे। जहां एमए की पढ़ाई होती थी। अर्थशास्त्र की पढ़ाई संजीदगी से करने के बावजूद ये विषय मुझे बहुत रूखा-सूखा और नीरस लगा।
एमए कर डिग्री मिलते ही पत्रकारिता में चला आया तो अर्थशास्त्र से नाता लगभग खत्म सा हो गया। जिस विश्वविद्यालय में कभी पढ़ने जाता था उसी विश्वविद्यालय में रिपोर्टिंग शुरू कर दी। कुछ ही दिनों में विश्वविद्यालय में मेरा सिक्का जम गया। हर हफ्ते कैंपस पर एक कॉलम लिखता था, जो खूब पढ़ा जाता था। यूनिवर्सिटी के छात्र से लेकर कुलपति तक शनिवार को उस कॉलम का इंतजार करते थे। कॉलम की खासियत ये थे कि उसमें आप बिना किसी का नाम लिए लिख सकते थे।
खैर, ये पुरानी बातें इसलिए याद आ रही हैं कि मैं देख रहा हूं कि हमारा देश एक भयानक आर्थिक संकट की ओर जा रहा है। कुछ ही सालों पहले तक हमारी अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की विकास दर से बढ़ रही थी, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी, लेकिन अब हालात बद से बदतर हो रहे हैं।
इस तिमाही की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश की जीडीपी गिरकर 23.9 फीसदी रह गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था में इसे 1996 के बाद ऐतिहासिक गिरावट माना जा रहा है और इसकी वजह है कोरोना वायरस की वजह से हुआ दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन।
जब पहली बार लॉकडाउन लगा उसी दिन मैंने लिखा कि ये समस्या का समाधान नहीं है। लॉकडाउन का कोरोना से कोई लेना-देना नहीं है। ये बस मुसीबत को कुछ दिनों के लिए स्थगित करने जैसा है।
खैर, सच तो ये है कि इस लॉकडाउन से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई थी। कार से लेकर कालीन उद्योग तक बार्बाद और बंद होने लगे थे। रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। जीडीपी 40 साल में पहली बार इतनी नीचे गिरी।
अब तो आपको साफ दिख रहा होगा कि बेरोजगारी अब तक के चरम पर है। विकास के बड़े इंजन, खपत, निजी निवेश या निर्यात ठप्प पड़े हैं। सबसे खतरनाक बात ये कि सरकार के पास इस मंदी से बाहर निकलने और खर्च करने की न क्षमता है न समझ है और न इच्छाशक्ति।
देश में भ्रष्टाचार और अफसरों का नाकारापन चरम पर है। एक छोटा सा उदाहरण दूंगा आपकी समझ में आसानी से आ जाएगा। कोरोना संकट के दौर में आत्मनिर्भर भारत का नारा चरम पर है ऐसे में प्राइवेट कंपनी में मेरे एक मित्र की कोरोना के कारण नौकरी चली गई तो वे मजबूरन या जबरन 'आत्मनिर्भर' हो गए।
एक समय भारत का सबसे मजबूत रहा निर्माण उद्योग 39 फीसदी तक सिकुड़ गया है...
आपदा में अवसर तलाशते हुए उन्होंने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर लंदन में नाइट्रिल गल्वस यानी रबर के दस्तानों का एक बड़ा ऑर्डर लिया। भारत सरकार ने कोविड-19 से जुड़े सामानों के निर्यात पर रोक लगा दी है।
खैर, भारत में तो ये ग्ल्वस बनते ही नहीं तो मित्र ने मलेशिया के एक उत्पादक से ये ग्लव्स खरीद का लंदन सप्लाई करने का फैसला किया। अब मलेशिया से ग्लव्स खरीद कर बाहर ही बाहर लंदन भेजने हैं।
ये काम भी भारत में नहीं हो सकता, क्योंकि रिर्जव बैंक को इसके लिए विदेशी व्यापार मंत्रालय से NOC चाहिए, जो वह देने को तैयार नहीं। इसके पीछे कोई तर्क नहीं है। आजकल करते हुए दो हफ्ते बीत गए और देर होता देख लंदन के उस आयातक ने ये सामान चीन से मंगा लिया। अब मित्र परेेशान है.
आप कह सकते हैं सब कुछ तो ठीक चल रहा है। आलू- प्याज 30 रुपए किलो है। आटा, चावल अरहर की दाल कुछ महंगा नहीं हुआ फिर ये कम्बख्त अर्थशास्त्री गिरती जीडीपी का मातम क्यों मना रहे हैं। फिर सारी दुनिया कोरोना की चपेट में है। सबकी अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है फिर केवल मोदीजी की सरकार पर निशाना क्यों?
पहली नजर में यह तर्क जायज लगता है। पर ऐसा है नहीं। देश की अर्थव्यवस्था को अगर किसी ने संभाला है तो वह हमारे किसान हैं। इस तिमाही में सिर्फ कृषि क्षेत्र से ही अच्छी खबर आई है। इस साल मानसून की अच्छी बारिश के कारण कृषि सेक्टर में 3 फीसदी से 3.4 फीसदी के दर से बढ़ोत्तरी हुई, इसीलिए सब्जी और किराना बाजार पर मंदी का असर नहीं दिख रहा है और कोरोना काल में सिर्फ इन्हीं चीजों की मांग और सप्लाई है। लेकिन बाकी हर तरफ तंगहाली है।
छोटे व्यवसाइयों से जाकर पूछिए क्या हाल है उनका। शोरूम में मध्यमवर्गीय बिजनैसमैन से जाकर पूछिए कितने टीवी फ्रिज आदि बिक रहे हैं? होटल वालों से पूछिए। व्यापार, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में 47 फीसदी की गिरावट आई है।
एक समय भारत का सबसे मजबूत रहा निर्माण उद्योग 39 फीसदी तक सिकुड़ गया है। शहरों में फैल्टस के दाम 20 फीसदी तक गिर गए हैं। कोई खरीददार नहीं है। पिछले साल अगस्त में कार बिक्री में 32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जो दो दशकों में सबसे अधिक थी।
ये कोरे आंकड़े नहीं हैं, जमीनी हकीकत है। बेशक आपको कार और होटल से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन आपके पड़ोसी के बच्चे कल तक वहां नौकरी करते थे, आज वे बेकार हैं, क्योंकि उनके मालिक ने उन्हें घर बैठा दिया है।
पिछले साल कितने ही प्रतिभाशाली बच्चों का मल्टीनेशनल कंपनियों में प्लेसमेंट हुआ था, लेकिन उन्हें ज्वाइनिंग लैटर का इंतजार है, क्योंकि बाजार इतना नीचे गिरा है कि न बिक्री हो रही है न सप्लाई। लेकिन आपको ये नहीं दिख रहा क्योंकि ये सब आपके पड़ोस में हो रहा है।
अब आप कह रहे हैं पूरी दुनिया का यही हाल है। बिलकुल यही हाल है, लेकिन इतना बुरा नहीं जितना भारत का है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में जहां इसी तिमाही में 9.5 फीसदी की गिरावट है, वहीं जापान की अर्थव्यवस्था में 7.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
चीन में 6 फीसदी गिरावट के बाद 2 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन हम 23 फीसदी नीचे चले गए। और सबसे दुखद बात ये कि फिलहाल ऊपर आने के कोई संभावनाएं नहीं दिख रही हैं।
(लेखक अर्थशास्त्र में एमए हैं और आर्थिक विषयों पर लिखते रहे हैं. )
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