दुष्यंत कुमार जयंती विशेष: भावनाओं को शब्दों के माध्यम से बयां करने की कला थी दुष्यंत में, एक महान कवि-गज़लकार
गज़ल कहने का जो सलीका और अंदाज होना चाहिए, वह फ़िराक साहब के बाद कुछ हद तक दुष्यंत कुमार में दिखती है। पर जो गहराई और दूर दृष्टि फ़िराक साहब की नज्मों और गज़लों में है, वह कहां किसी और को नसीब हुआ। फिर भी साफ़गोई के साथ अपनी बात कहने में दुष्यंत कुमार का भी कोई जोड़ नहीं था।
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अंग्रेजी भाषा के सुप्रसिद्ध कवि-आलोचक कार्लाइल कहते हैं- "काव्य नायक वही कवि होता है, जो स्पष्ट रूप से कानों और दिलों में गूंजने वाली आवाज से उन भावनाओं और आंतरिक अनुभवों को संगीतमय रूप से प्रतिध्वनित करे, जो पूरे समाज की अर्धचेतना में वाणी पाने की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन जिन्होंने अभी तक वाणी नहीं पाई थी।"
कहना गलत न होगा कि अपने समय में जनता की सुप्त चेतना को जगाने के लिए गज़लों के जरिए यहीं काम हिंदी के सुपरिचित गज़ल लेखक दुष्यंत कुमार ने किया। उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी है।1 सितंबर को उनकी 99वीं जयंती थी। उनका जन्म बिजनौर जिले के राजपुर नेवादा में हुआ। हालांकि वे कुल 42 साल ही जीवित रहे, पर अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक उथल पुथल और बदलाव को जिस शिद्दत और साफ़गोई से उन्होंने अपने गजलों के जरिए बयां किया, वह मुकाम आजतक किसी अन्य को हासिल नहीं हो सका।
आपातकाल के दौरान दुष्यंत की रचनाएं
देश में आपातकाल के दौरान उनका कविमन अत्यंत क्षुब्ध और आक्रोशित हुआ, जिसकी अभिव्यक्ति उनकी कुछ कालजई गज़लों में दिखाई देती है। दुष्यंत कुमार की एक शिकायत यह रहीं कि आजादी के बाद सता के नायकों ने अपनी संस्कृति को भूलकर शोषण की तहजीब को अपना आदर्श माना, जिसे दुष्यंत कुमार ने इन शब्दों में बयां किया है-
अब नई तहजीब के पेशे नज़र हम,आदमी को भूलकर खाने लगे है।
कल की नुमाइश में मिला वो चिथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान है।
शोषण की यह तहजीब उस ब्रिटिश हुकूमत की देन है, जिसके प्रति 'हिन्द स्वराज' के जरिए गाँधी जी हमें सावधान करते हैं। जिसे फ़ारसी के सुपरिचित शायर-दार्शनिक अल्लामा इक़बाल ने दो टूक ढंग से चेताया है-
तुम्हारी तहज़ीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करेगी
जो शाखे नाज़ुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा।
इक़बाल की ये पंक्तियां एक चर्चित गज़ल की हैं, जिसे 1907 में लिखा गया। इसकी अनुगूंज फैज अहमद फैज के 'तराना'-2 में संकलित (सन्1982) चंद पंक्तियों में भी देखा जा सकता है-
लाज़िम है के, हम भी देखेंगे
वो दिन के जिसका वादा है
जब जुल्मों-सितम के कोहे-गरां
रुई की तरह उड़ जाएंगे
सब बुत उठवाये जाएंगे
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराये जाएंगे
और राज करेगी खल्के ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।
हिंदी कविता में विद्रोह के ऐसे तेवर 'मुक्तिबोध' और 'धूमिल' की कविताओं में भी दिखाई देता है। जिस समय ये कवि-लेखक, शायर अपने रचना कर्म में सक्रिय थे, ये वो समय था- जब देश में सत्ता से लोगों का मोहभंग हो रहा था। देश में गैर कांग्रेसवाद के रूप में नया विकल्प पेश करने की कोशिशें हो रही थीं और नौजवानों का एक बड़ा और पढ़ा-लिखा तबका नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित होकर सक्रिय रुप से उस आंदोलन में शामिल हुआ।
कुछ ही दिनों बाद देश में आपातकाल भी लागू हुआ। उस दौर की पीड़ा से आक्रोशित दुष्यंत कुमार को कहना पड़ा-
हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही,
हो कही भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
दुष्यंत कुमार के काव्य संग्रह
वैसे दुष्यंत कुमार के अन्य काव्य संग्रह 'सूर्य का स्वागत' 'आवाजों के घेरे' और 'जलते हुए वन का वसन्त' भी प्रकाशित हुए।उन्होंने 'आंगन के वृक्ष' और 'दुहरी जिंदगी' नाम से दो उपन्यास 'और मसीहा मर गया' नाम से नाटक भी लिखा।पर उन्हें लोकप्रियता हासिल हुई "साए में धूप" के गज़ल संग्रह से ही।
गज़ल कहने का जो सलीका और अंदाज होना चाहिए, वह फ़िराक साहब के बाद कुछ हद तक दुष्यंत कुमार में दिखती है। पर जो गहराई और दूर दृष्टि फ़िराक साहब की नज्मों और गज़लों में है, वह कहां किसी और को नसीब हुआ। फिर भी साफ़गोई के साथ अपनी बात कहने में दुष्यंत कुमार का भी कोई जोड़ नहीं था-
पतों से चाहते हो बजे साज की तरह
पेड़ों से पहले उदासी तो लीजिए,
और यह भी कि-
फिरता है - कैसे-कैसे सवालों के साथ वो
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।
'साए में धूप' की भूमिका में दुष्यन्त कुमार कहते हैं कि "उर्दू और हिंदी अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती है, तो उसमें फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नियत और कोशिश रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा करीब ला सकूं। इसलिए गज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसमें मैं बोलता हूं। यह भी कि ग़ज़ल एक पुरानी किंतु सशक्त विधा है। निराला से लेकर नए कवियों और गीतकारों ने भी इस विधा को आजमाया है। इस विधा में उतरते हुए आज भी संकोच है। पर उतना नहीं, जितना होना चाहिए।"
इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान दुष्यंत कुमार 'परिमल' और 'नए पते' जैसी साहित्यक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े। इलाहाबाद से कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यंत कुमार कुमार ने संयुक्त रूप से "विहान" नामक पत्रिका भी निकाली। अब उसके कुछ अंक ही प्राप्त हैं। पर उस समय के लगभग सभी प्रमुख लेखकों ने इस पत्रिका में लिखा हैं।
इलाहाबाद की साहित्यिक 'सर्किल' उस वक्त कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यन्त कुमार की तिकड़ी 'त्रिशूल' नाम से खूब चर्चित हुई। कमलेश्वर के बारे में दुष्यन्त कुमार की यह स्वीकारोक्ति काबिलेगौर है कि अगर कमलेश्वर न होता तो, शायद यह सिलसिला यहां तक नहीं आता।
हाथों में अंगारो को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
दुःख तकलीफों को शब्दों में उतारना जानते थे दुष्यंत
आम आदमी के दुःख तकलीफों को आम आदमी की भाषा में और वह भी गज़ल जैसी विधा में कहने की वजह से ही दुष्यन्त कुमार के जरिए हिंदी ग़ज़लों की लोकप्रियता की दरअसल शुरुआत हुई। इस लोकप्रियता की असली वजह यह है कि जब भी समाज जीवन में उदासी और हताशा का साया चारों ओर फैला दिखाई देता है, तब दुष्यन्त कुमार जैसे कवि-लेखकों की रचनाएं घने कुहासे को छिन्न-भिन्न कर उम्मीदों की नई किरण बनकर नयी राह दिखाती है।
इस अर्थ में ही मुंशी प्रेमचंद ने साहित्कारों को "समाज के आगे लेकर चलने वाला मशाल बताया है।" अपने अल्पायु में यह काम दुष्यन्त कुमार बखूबी कर गए। जो कवि लेखक अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक सवालों से रूबरू होता उसे ही वह मुकाम हासिल होता है, जो दुष्यंत कुमार को है। गूंगे निकल पड़े है जुबां की तलाश में सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिए।
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