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डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा कितना उचित है? अभी उनका इम्तिहान बाकी है...

Mon, 24 Feb 2020 10:58 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Mon, 24 Feb 2020 10:58 PM IST
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Donald Trump India Visit : How appropriate is trusting Donald Trump
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा - फोटो : Amar Ujala

डोनाल्ड ट्रंप मोटेरा स्टेडियम में इससे अधिक और क्या कह सकते थे? दूसरे कार्यकाल के लिए अभी उनका इम्तिहान बाकी है। उनके अपने मुल्क में गुजराती मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है। पाकिस्तानी भी कम नहीं हैं। इसलिए किसी को नाराज करने के इरादे से तो वे यकीनन नहीं आए थे। न ही वे  सिर्फ ताजमहल का दीदार करने वे आए थे।

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उनकी यात्रा सियासी अधिक, कूटनीतिक या कारोबारी कम है। फिर भी कहने में कोई हिचक नहीं कि अब हिंदुस्तान के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए अग्निपरीक्षा का अवसर है। उसे हिंदुस्तान के प्रति अब तक की नीति को बदलने की जरूरत है।
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मोटेरा के स्टेडियम में ट्रंप ने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चाहे जितनी तारीफ की हो, पर उसके पीछे की मंशा भी साफ है। इसलिए वास्तव में भारत अपनी ओर से नमस्ते ट्रंप से अधिक और कुछ नहीं कर सकता था। 
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सवाल यह है कि डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका पर भारत को कितना भरोसा करना चाहिए? अपने पहले कार्यकाल के अंतिम चरण में वे पहली बार भारत आए हैं और उसका रहस्य किसी परदे में नहीं है। मान लिया जाए कि वे दोबारा राष्ट्रपति बन रहे हैं तो उनका पहला कार्यकाल भारत के प्रति बहुत आशा नहीं जगाता।

एक के बाद एक उन्होंने भारत को लगातार कारोबारी झटके दिए हैं। इसके अलावा अनेक सार्वजनिक अवसरों पर इस देश का उपहास भी उड़ाने से नहीं चूके हैं। अफगानिस्तान में भारत ने पुस्तकालय बनाया तो उसकी खिल्ली उड़ाने से वे नहीं चूके थे। इसके बाद साल भर वे तालिबान से पाकिस्तान को साथ लेकर गुपचुप बात करते रहे।

भारत को इससे दूर रखा गया, जबकि भारत की अफगानिस्तान में भूमिका का मतलब अमेरिका अच्छी तरह समझता है। और प्रसंग के तौर पर स्मरण करना उचित होगा कि अमेरिका और पाकिस्तान ही तालिबान के जनक हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति  भारत के साथ अपने सैनिक सहयोग की चर्चा करते हैं तो दूसरी तरफ वे पाकिस्तान की सेना को भी प्रशिक्षण देने पर सहमति जताते हैं।

इसी तरह डोनाल्ड ट्रंप ईरान को कारोबारी तौर पर अलग थलग करने के लिए वे भारत के हितों की चिंता नहीं करते। भारत को अब ईरान से कच्चा तेल आयात बंद करके ऊंची दरों पर अन्य देशों से आयात करना पड़ रहा है।

एक संकेत अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए भी...

अमेरिका इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझता कि पाकिस्तान में चीन के ग्वादर बंदरगाह के उत्तर में भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाता है तो उसके बंद होने अथवा उससे कारोबार ठप्प होने के क्या अर्थ हैं और भारत को उससे क्या नुकसान है।

इसके बाद भी वे हैरत में डालने वाला बयान देते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें काफी पसंद हैं लेकिन वे इस बात से खफा हैं कि हिंदुस्तान ने अमेरिका के साथ कभी अच्छा बरताव नहीं किया। इसलिए वे अपनी भारत यात्रा के दौरान कोई बड़ा कारोबारी करार नहीं करेंगे।

अलबत्ता दो-चार बिलियन डॉलर का कोई औसत अनुबंध किया जा सकता है। ट्रंप ने इस बयान के बहाने भारत के लोगों को बता दिया कि जब उनके देश ने अमेरिका के प्रति रूखा रवैया रखा तो उसका कारण नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि पुरानी कांग्रेस सरकारें थीं।

इसके अलावा यह कि नरेंद्र मोदी के रहते भारत से किसी व्यापक व्यापारिक समझौते की संभावनाएं बनी रहेंगीं। एक संकेत अमेरिका में बसे गुजरातियों के लिए भी है कि वे अपने मुल्क के साथ बिजनेस का बड़ा सपना पाल सकते हैं।

अमेरिका का इतिहास पढ़ना भूल गए

दरअसल जब डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं कि भारत ने उनके देश के साथ कभी अच्छा सुलूक नहीं किया तो लगता है कि वे अमेरिका का इतिहास पढ़ना भूल गए हैं। यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि आजादी के बाद से ही अमेरिका का पलड़ा पाकिस्तान की ओर झुका रहा है।

कश्मीर समस्या को भारत के कलेजे की फांस बनाने का काम हरदम अमेरिका ने किया है। पाकिस्तान के फौजी तानाशाह जनरल अयूब के जमाने से ही वर्षों तक अमेरिका पाकिस्तान को खुल्लमखुल्ला मदद करता रहा है। उसने ही आठ सौ अरब रूपए का फौजी साजो सामान पाकिस्तान को साठ-पैंसठ साल पहले उपलब्ध कराया और पाकिस्तान में अपने सैनिक अड्डे की जमीन तैयार करता रहा।

यह अमेरिका ही था ,जिसने कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण होने दिया। क्या यह भुलाया जा सकता है कि पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की जंग में उसने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया। इसके बाद भी डोनाल्ड ट्रंप कश्मीर समस्या सुलझाने में बार बार मध्यस्थता का प्रस्ताव देते हैं। भारत आखिर उन पर यकीन करे भी तो कैसे? 

कालखंड के हिसाब से बदलते..

दुनिया के इस सबसे बड़े चौधरी को समझना होगा कि वर्तमान विश्व में कोई भी बड़ा देश लंबे समय तक अपने हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता। भारत की निर्वाचित सरकार को भी इस देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों के सामने उत्तर देना ही होगा कि किसी ऐसे देश पर वह क्यों भरोसा कर रही है, जिसका भूत और वर्तमान भारत विरोधी रहा है।

यह सत्य है कि देशों के बीच संबंध कालखंड के हिसाब से बदलते रहते हैं। अगर अमेरिका किसी पवित्र अंतरात्मा की आवाज सुनकर हिन्दुस्तान के साथ किए अतीत के अपराधों का प्रायश्चित करना भी चाहता है तो उसे समझना होगा कि पाकिस्तान अब लाइलाज मर्ज बन चुका है। इसके बाद भी वह एक डूबते जहाज की सवारी करना चाहता है तो इसके लिए आजाद है। 

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