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दिवाली विशेष: पहाड़ की बग्वाल, लोगों के साथ रोशनी भी कर गई पलायन
सार
गढ़वाल में दीपावली को बग्वाल कहा जाता है। यह पर्व पहाड़ी समाज का सबसे बड़ा उत्सव और वर्षभर की कठिन दिनचर्या के बीच सामूहिक आनंद का प्रमुख अवसर रहा है। इसकी तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं।
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पहाड़ों की दिवाली
- फोटो : AI Generated
विस्तार
कभी उत्तराखंड के पहाड़ी गांव दीपावली की रात तेल के दीयों और भैलो की रोशनी से जगमगा उठते थे। घरों की देहरियों पर टिमटिमाते दीपक, आंगनों में उत्सव मनाते परिवार, गांव के चौकों में झुमैलो-चौंफला की गूंज और अंधेरे में घूमते जलते भैलो पहाड़ की दीपावली को अनूठी पहचान देते थे।
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बच्चों की किलकारियां, महिलाओं के मंगलगीत, युवाओं का उत्साह और बुजुर्गों की आत्मीयता मिलकर पूरे गांव को एक विशाल परिवार बना देते थे। लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि जिन घरों में कभी दीपावली की चकाचौंध और उल्लास हुआ करता था, उनमें से अनेक में अब अंधेरा और सन्नाटा पसरा है। रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में लोगों ने पहाड़ छोड़ा तो उनके साथ त्योहारों की रौनक भी पलायन कर गई।
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गांवों की रोशनी नगरों और महानगरों में खिसक गई। पीछे रह गए बंद दरवाजे, उजड़े आंगन, बंजर खेत और जीवनविहीन मकान। जिन पहाड़ियों पर कभी भैलो की लपटें प्रकाश की लकीरें खींचती थीं, वहां अब अनेक बस्तियां अंधकार में डूबी हैं।
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बग्वाल: जब पूरा गांव एक परिवार होता था
गढ़वाल में दीपावली को बग्वाल कहा जाता है। यह पर्व पहाड़ी समाज का सबसे बड़ा उत्सव और वर्षभर की कठिन दिनचर्या के बीच सामूहिक आनंद का प्रमुख अवसर रहा है। इसकी तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं।
घरों की लिपाई-पुताई होती, आंगन सजते और देहरियों पर तेल के दीये जलाए जाते। उस दौर की बग्वाल आज की तरह बिजली की रंगीन झालरों और पटाखों के शोर पर निर्भर नहीं थी। मिट्टी के दीयों, स्थानीय संसाधनों और सामूहिक उल्लास से उसका सौंदर्य निखरता था। पारंपरिक बग्वाल अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल उत्सव थी।
घरों में पूरी-पकौड़ियां और पारंपरिक पकवान बनते। पड़ोसी परिवार एक-दूसरे के यहां पकवान पहुंचाते। पशुधन को भी इस उत्सव में विशेष स्थान मिलता। गायों के लिए विशेष आहार तैयार किया जाता। यह उस कृषि और पशुपालन आधारित संस्कृति की अभिव्यक्ति थी, जिसमें मनुष्य की समृद्धि को पशुधन और प्रकृति से अलग नहीं देखा जाता था।
बग्वाल की सबसे बड़ी विशेषता अपनों का घर लौटना था। मैदानी शहरों में नौकरी करने वाले लोग छुट्टी लेकर गांव आते। सेना में तैनात जवान भी अवकाश मिलने पर परिवार के बीच त्योहार मनाने पहुंचते। विवाह के बाद ससुराल गई बेटियां मायके आतीं। किसी घर में सैनिक बेटे के लौटने की खुशी होती, तो कहीं मायके आई बेटी के स्वागत का उल्लास। बग्वाल रिश्तों के पुनर्मिलन का सबसे बड़ा अवसर बन जाती थी।
शरद ऋतु की लंबी रातों में झुमैलो और चौंफला जैसे सामूहिक लोकगीतों तथा नृत्यों की गूंज सुनाई देने लगती। गांवों के चौकों और आंगनों में लोकनृत्य होते। ढोल-दमाऊं की थाप और सामूहिक गायन से पहाड़ की निस्तब्ध रातें जीवंत हो उठतीं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों से दूर उस समाज में बग्वाल केवल त्योहार नहीं, बल्कि वर्षभर की सांस्कृतिक ऊर्जा का उत्सव थी।
भैलो की लपटों से जगमगाती थीं पहाड़ियां
पहाड़ की दीपावली की एक विशिष्ट पहचान भैलो भी था। चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी के छिलकों और पतली फट्टियों को बांधकर भैलो बनाए जाते थे। इन्हें जलाकर युवा सामूहिक रूप से घुमाते और लोकगीतों के साथ उत्सव मनाते। अंधेरी रात में घूमते जलते भैलो प्रकाश के अद्भुत वृत्त बनाते थे। दूर-दूर पहाड़ियों पर बसे गांवों में जब भैलो जलते, तो लगता मानो समूचा पर्वत दीपमालाओं से सज गया हो।
गढ़वाल की इगास-बग्वाल, जिसे बूढ़ी दीपावली भी कहा जाता है, सामान्य दीपावली के ग्यारह दिन बाद मनाई जाती है। इसके उद्भव को लेकर एक प्रसिद्ध लोककथा वीर सेनानायक माधो सिंह भंडारी और उनके सैनिकों की युद्ध अभियान से विलंबित वापसी से जुड़ी है। दूसरी लोकमान्यता भगवान राम की अयोध्या वापसी का समाचार पहाड़ों में देर से पहुंचने की है। इन कथाओं का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाणीकरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन्हें लोकविश्वास के रूप में ही देखना उचित है।
इन कथाओं में एक समान भावना है—अपनों के लौटने की प्रतीक्षा। कभी युद्ध से लौटने वाले सैनिकों की प्रतीक्षा की कथा सुनाई जाती थी, आज महानगरों में रोजगार करने गए बेटे-बेटियों की राह देखी जाती है। अंतर यह है कि पहले लौटने वाले अपने गांवों में फिर बस जाते थे, जबकि आज अनेक प्रवासी कुछ दिन त्योहार मनाकर वापस चले जाते हैं।
ढाई लाख से अधिक खाली ग्रामीण मकानों की कहानी
भारत की 2011 की जनगणना के मकान-सूचीकरण आंकड़े इस सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने रखते हैं। उस समय उत्तराखंड में कुल 33,83,410 जनगणना मकान दर्ज थे, जिनमें 3,36,409 खाली थे। ग्रामीण क्षेत्रों के 25,12,569 जनगणना मकानों में से 2,57,825 खाली पाए गए। अर्थात ग्रामीण उत्तराखंड में लगभग हर दसवां जनगणना मकान खाली था। हालांकि जनगणना में खाली दर्ज सभी मकान पलायन के कारण परित्यक्त आवास नहीं थे।
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की वर्ष 2023 में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2018 से सितंबर 2022 के बीच 28,531 लोगों ने स्थायी और 3,07,310 लोगों ने अस्थायी पलायन किया। इसी अवधि में 24 और गांव निर्जन हो गए तथा ऐसे गांवों की कुल संख्या 1,792 तक पहुंच गई।
इन आंकड़ों के पीछे अनगिनत मानवीय कहानियां छिपी हैं। किसी बंद घर की दीवार पर आज भी परिवार की पुरानी तस्वीर टंगी हो सकती है। किसी सूने आंगन में लगा पेड़ अब भी फल देता होगा, लेकिन उन्हें तोड़ने वाला कोई नहीं। किसी घर के भीतर पूजा का वह स्थान अब भी होगा, जहां कभी दीपावली पर पूरा परिवार एकत्र होता था। किसी गांव के चौक में भैलो खेलने की स्मृतियां आज भी बुजुर्गों के मन में जीवित होंगी। पलायन केवल मनुष्यों का स्थानांतरण नहीं, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और सामूहिक संस्कृति का बिखराव भी है।
जब गांवों से उत्सव की आत्मा चली गई
पलायन का सबसे गहरा आघात पहाड़ की सामूहिक संस्कृति पर पड़ा है। पहले बग्वाल किसी एक परिवार का निजी उत्सव नहीं होती थी। पूरा गांव उसमें भागीदार होता था। अब अनेक गांवों में केवल बुजुर्ग दंपती रह गए हैं। कहीं कुछ परिवार ही बचे हैं और कहीं पूरी बस्तियां निर्जन हो चुकी हैं। जिन चौकों में कभी युवाओं की टोलियां भैलो घुमाती थीं, वहां घास उग आई है। जिन आंगनों में झुमैलो-चौंफला की गूंज होती थी, वहां सन्नाटा है।
सबसे मार्मिक स्थिति उन घरों की है, जहां कभी बेटियां बग्वाल मनाने मायके आती थीं। अब अनेक परिवारों के शहरों में बस जाने से उनके पैतृक घर ही खाली हो गए हैं। नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में पल रहा है। उसके लिए पैतृक गांव धीरे-धीरे स्थायी निवास के बजाय छुट्टियां बिताने का स्थान बनता जा रहा है।
विकास की रोशनी पहुंची, मगर जीवन क्यों उजड़ गया?
उत्तराखंड राज्य गठन के छब्बीस वर्षों में सड़क, बिजली, संचार और अन्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। लेकिन इस विकास यात्रा का विरोधाभास यह है कि जिन गांवों में कभी बिजली नहीं थी, वहां अब बिजली पहुंच गई है, मगर कुछ गांवों में उसे उपयोग करने वाले परिवार ही नहीं बचे। जिन घरों तक सड़क पहुंचने की प्रतीक्षा थी, उनके निवासी पहले ही शहरों में बस गए।
खेती से घटती आय, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, रोजगार के सीमित अवसर, बेहतर शिक्षा की चाह और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने पलायन को बढ़ावा दिया है। युवाओं के सामने गांव छोड़ना कई बार विकल्प नहीं, विवशता बन जाता है। इसलिए गांवों का पुनर्जीवन केवल भावनात्मक अपील से संभव नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और क्षेत्रीय संतुलन पर आधारित विकास नीति आवश्यक है।
सूनी चौखटों को अब भी रोशनी की प्रतीक्षा
दीपावली और इगास के अवसर पर कुछ प्रवासियों का गांव लौटना निश्चित रूप से सुखद है। कुछ दिनों के लिए बंद मकानों के दरवाजे खुलते हैं। पुराने आंगन सजते हैं और कहीं-कहीं वर्षों बाद भैलो भी जलते हैं। लेकिन उत्सव समाप्त होते ही लोग वापस चले जाते हैं और गांव फिर उसी निस्तब्धता में डूब जाते हैं।
पहाड़ की त्रासदी यह है कि उसके त्योहार तो निर्धारित समय पर लौट आते हैं, लेकिन उन्हें मनाने वाले लोग नहीं लौटते। दीपावली हर वर्ष आती है, मगर अनेक बंद घरों की चौखटों पर उसका स्वागत करने वाला कोई नहीं होता। इगास आती है, लेकिन भैलो घुमाने वाले युवाओं की टोलियां नहीं जुटतीं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना ऐसे जीवंत और समृद्ध पहाड़ का था, जहां लोगों को सम्मानजनक जीवन के लिए अपनी जन्मभूमि छोड़ने की विवशता न हो। आज आवश्यकता है कि गांव केवल पर्यटन स्थलों या प्रवासियों के पैतृक स्मारकों में न बदल जाएं। उनमें फिर से जीवन लौटे, खेतों में हल चलें, विद्यालयों में बच्चों की आवाजें गूंजें और बग्वाल पर घरों के साथ गांव के चौक भी भैलो की रोशनी से जगमगाएं।
पहाड़ की दीपावली का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि वहां रोशनी के साधन नहीं रहे, बल्कि यह है कि रोशनी करने वाले लोग ही चले गए। गांवों का उजाला नगरों और महानगरों में जा बसा और पीछे रह गईं अंधेरे में डूबी चौखटें। पहाड़ की असली दीपावली उस दिन लौटेगी, जब भैलो की लपटों के साथ गांवों में जीवन की लौ भी फिर से जल उठेगी।
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