वायु प्रदूषण: सांस नहीं, जहर भीतर ले रहे दिल्ली-एनसीआर के लोग, रविवार का हाल सबसे बुरा
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वायु प्रदूषण की वजह से दिल्ली-एनसीआर की स्थिति बेहद खतरनाक होती जा रही है। रविवार को हल्की बारिश ने दिल्ली के एयर क्वालिटी इंडेक्स को 447 से ज्यादा पहुंचा दिया है जबकि शनिवार शाम तक इसका स्तर 402 के करीब था। दिल्ली के सबसे भीड़-भाड़ वाली जगहों में शामिल आईटीओ क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा 486 रहा। रविवार को स्मॉग की अधिकता के साथ ही विजिविलिटी का स्तर भी काफी कम है और कई लोगों को घरों के भीतर भी धुआं-धुआं सा घिरने का अहसास हो रहा है। हेल्थ इमरजेंसी की वजह से दिल्ली-एनसीआर के स्कूल पहले से ही बंद हो चुके हैं और निर्माण कार्य पर भी रोक लगी हुई है। लेकिन इसके बाद भी रविवार की सुबह शनिवार से ज्यादा प्रदूषित रही है।
यह हैरान करना वाला है कि आनंद विहार और अलीपुर से भी ज्यादा आईटीओ का वायु प्रदूषण स्तर रहा है। आनंद विहार में एयर क्वालिटी इंडेक्स 478 और अलीपुर में 463 है। एम्स के डॉक्टर भी वायु प्रदूषण को लेकर अपनी चिंता जता चुके हैं। एम्स का कहना है कि वायु प्रदूषण अब स्वस्थ लोगों को भी प्रभावित कर रहा है। बच्चे वायु प्रदूषण की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कैंसर, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित मरीजों के लिए तो दिल्ली मृत्यु का शहर ही बन गया है! दूसरी तरफ सरकारे हैं कि एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने के सिवा कोई काम नहीं।
दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण के लिए कौन-जिम्मेदार?
दिल्ली-एनसीआर के गैस चेंबर बनने के साथ ही ब्लेम गेम भी शुरू हो गया है। जो राजनीति हो रही है किसी से छिपी नहीं है। इस सबसे बीच यह समझना बेहद जरूरी है कि दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों की हवा के इस कदर जहरीली होने की असली वजह क्या है? दरअसल, दिल्ली-एनसीआर की हवा कोई पहली बार जहरीली नहीं हो रही है। हर बार दिवाली के बाद से ही दिल्ली-एनसीआर के आसमां में स्मॉग छा जाता है और घरों में नवजात बच्चों से लेकर बुजुर्गों की शामत आ जाती है। यह सच है कि दिल्ली-एनसीआर के 65 फीसदी से ज्यादा वायु प्रदूषण के लिए स्थानिय स्त्रोत ही जिम्मेदार हैं। इस बात की तस्दीक ईपीसीए भी करता है।
दूसरा पंजाब और हरियाणा के किसान द्वारा जलाई जाने वाली पराली इसके लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन सिर्फ 5-8 फीसदी ही वायु प्रदूषण के लिए पराली जिम्मेदार है। इन राज्यों में इस महीने जलाई जाने वाली पराली की वजह से भी दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण की स्थिति खतरनाक हो जाती है क्योंकि उत्तर से चलने वाली हवा पराली के धुएं के साथ ही दिल्ली-एनसाआर की हवा को दूषित कर देती है। दिवाली में फोड़े गए खतरनाक पटाखे भी वायु की गुणवत्ता को प्रभावित करने के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि इस बीच ईपीसीए ने यूपी, हरियाणा और दिल्ली को खत लिखकर ठोस कदम उठाने के लिए कहा है। दिल्ली, फरीदाबाद, नोएडा, गुड़गांव में निर्माण कार्य को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
हम सांस नहीं, जहर ले रहे हैं अपने भीतर, औसत उम्र हो रही है कम
शिकागो यूनिवर्सिटी की एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट रिपोर्ट में भारत की एयर क्वॉलिटी पर किए गए विश्लेषण में कहा गया है कि उत्तर भारत के लोगों की औसत उम्र सात साल कम हो रही है। इसकी वजह है कि साल 1998 से लेकर 2016 के बीच इस क्षेत्र में वायु प्रदूषण में 72 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस वायु प्रदूषण में जीवाश्म ईधन की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ये ही वजह है कि एम्स में सबसे ज्यादा लोग हार्ट संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीज आ रहे हैें।
शुद्ध हवा के लिए राजनीति
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बच्चों से दिल्ली के वायु प्रदूषण को लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को खत लिखने की सलाह दी है। जबकि केजरीवाल खुद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को वायु प्रदूषण को लेकर खत लिख चुके हैं। जिसमें केंद्र सरकार से उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से निपटने के लिए अपने स्तर पर पहल करने की गुहार लगाई गई है। जबकि दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी वायु प्रदूषण को लेकर केजरीवाल पर राजनीति करने का आरोप लगा चुके हैं। मनोज तिवारी केजरीवाल के मास्क बाटने पर भी सवाल खड़े कर चुके हैं।
भाजपा सांसद विजय गोयल तो वायु प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार के खिलाफ एक दिन का अनशन भी रख चुके हैं। हालांकि जहां एक तरफ ईपीसीए का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण के लिए पराली कम ही जिम्मेदार है, वहीं दिल्ली के उप मुख्यमंत्री सिसोदिया का कहना है कि केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय में अपने एक हलफनामे में कह चुकी है कि दिल्ली में प्रदूषण की असली वजह पराली है।
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वायु के जहरीले स्तर पर पहुंचने को सही मायने में वो ही तबका झेल रहा है जो कि निम्न और मध्यवर्ग से आता है। इसमें बड़ी तादाद में मजदूर और कर्मचारी हैं। इसके अलावा, झुग्गी झोपड़ियों और कच्ची कॉलोनियों में रहने वाले लोग भी शामिल है। इनके घरों में ना ही एयर प्यूरीफायर है और न ही किसी आपात स्थिति में ये लोग झट से किसी बड़े अस्पताल जा सकते हैं। ऐसे में यहां रहने वाले बच्चे और बुजुर्गों की स्थिति वाकई में गंभीर है। घरों के भीतर रहा भी जाए तो कब तक और कब तक घर से बाहर न निकला जाए। आंखों में जलन, सिर में दर्द और सांस लेने में होने वाली तकलीफ घर से बाहर निकलने वाले हर शख्स के लिए आम हो गई है।
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