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POCSO Act: जब चीखें सुनाई ना दें और अन्याय के खिलाफ बोल ना फूटें तब न्याय और भी जरूरी हो जाता है..!

Sat, 07 Jun 2025 01:06 PM IST
Shruti Agrawal श्रुति अग्रवाल
Updated Sat, 07 Jun 2025 01:06 PM IST
सार

Deaf and Mute Children and the POCSO Act 2012: नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में यह साफ है कि हर साल देश में 50,000 से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं। हालांकि इनमें से कितने मूक-बधिर या अन्य दिव्यांग है, इसकी कोई स्पष्ट गणना या विवेचना नहीं है। 

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Deaf and Mute Children and the POCSO Act 2012 Protective Shield For speech and hearing impaired Minor
जब मूक-बधिर बच्चों के साथ किसी तरह की यौन हिंसा होती है तो उनके सामने सबसे बड़ा संकट सही और गलत का होता है। - फोटो : AdobeStock

विस्तार

वे जो सुन नहीं सकते... बोल नहीं सकते....अपनी तकलीफ पर रो नहीं सकते...चिल्ला नहीं सकते....इस बात का मतलब यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता। उन्हें दर्द होता है, बस हम उस दर्द की आहट नहीं ले पाते। उनका दर्द महसूस नहीं कर पाते हैं। भारत में मूक-बधिर के साथ होने वाले यौन शोषण समाज के नैतिक पतन का आईना हैं। ये उस शर्मनाक हकीकत को उजागर करते हैं, जो अक्सर अनकही-अनदेखी रह जाती है। ये अबोध बच्चे ना सिर्फ जघन्य अपराधों का शिकार होते हैं बल्कि उनकी चुप्पी का फायदा अपराधी सिस्टम को गुमराह करने के लिए उठाते हैं।

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ये बच्चे बचपन से बोल-सुन नहीं पाते। इसलिए अपनी पीड़ा खुलकर बता नहीं पाते। अक्सर समाज-प्रशासन ही नहीं परिजन भी इनकी मौन चीखों को अनसुना कर देते हैं। मूक बधिर बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था आनंद की संचालक मोनिका पुरोहित लंबे समय से मूक बघिर बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही हैं।
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वे कहती हैं- 

जब मूक-बधिर बच्चों के साथ किसी तरह की यौन हिंसा होती है तो उनके सामने सबसे बड़ा संकट सही और गलत का होता है। कई बार यह अबोध बच्चे समझ भी नहीं पाते कि उनके साथ क्या हो रहा है। वे यूं भी समाज की मुख्यधारा से कटे हुए रहते हैं। उन्हें यौन शिक्षा नहीं दी जाती। कई बार उनके परिजन भी उन्हें समझ नहीं पाते। ऐसे में अपराधियों का हौसला बुलंद होता है। वे पहले छेड़छाड़ करते हैं। जब देखते हैं कि कोई रोक-टोक नहीं हो रही तो यौन शोषण करने में हिचकिचाते नहीं। यह जरूर है कि समाज मौन चीखों को आसानी से सुन-समझ नहीं पाता लेकिन यकीन मानिए यह संकट जाना पहचाना है। यूं भी नाबालिग बच्चे अपराधियों के लिए ईजी टारगेट होते हैं। ऐसे में मूक बधिर बच्चे ...वहां तो अपराधियों के हौसले कुछ ज्यादा ही बुलंद होते हैं। लेकिन एक समाज के रूप में हम सचेत रहकर इस तरह की दुर्घटनाओं को घटने से पहले ही रोक सकते हैं।

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पॉक्सो एक्ट और मूक-बधिर नाबालिग

2012 में लागू पॉक्सो एक्ट ने बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा का कानूनी आधार तो दिया है। पॉक्सो की धारा 26 और 38 में यह प्रावधान है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के मामलों में दुभाषियों, काउंसलरों और विशेषज्ञों की मदद ली जाए, लेकिन जमीनी हकीकत थोड़ी कठोर है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में साफ है कि हर साल देश में पचास हजार से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं। लेकिन इनमें से कितने पीड़ित मूक-बघिर या अन्य विकलांगता से ग्रस्त हैं, इसकी कोई स्पष्ट गणना नहीं है। यह डेटा गेप अपने आप में चिंता का विषय है, क्योंकि डाटा नहीं होगा तो मूक-बधिर बच्चों को किस तरह की सहायता की आवश्यकता इस बिंदु पर ठोस काम भी नहीं हो पाएगा।

Deaf and Mute Children and the POCSO Act 2012 Protective Shield For speech and hearing impaired Minor
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में यह साफ है कि हर साल देश में 50,000 से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं। - फोटो : Freepik.com

मूक-बधिर बच्चों के लिए पच्चीस साल से काम कर रही मोनिका पुरोहित बताती हैं-

 

यदि इन बच्चों से उनकी साइन लैंग्वेज में बात की जाए तो कई उलझे केस सुलझ जाते हैं। ऐसे ही एक केस का जिक्र करते हुए मोनिका बताती हैं कि कुछ साल पहले खजराना पुलिस ने उन्हें बुलाया। एक मूक-बधिर बच्ची के साथ यौन शोषण हुआ था। वह बच्ची छह माह की गर्भवती थी। छह माह या उससे पहले लंबे समय तक उसके साथ यौन शोषण होता रहा लेकिन परिजन और आस-पास के लोग अनिभिज्ञ रहे। फिर मोनिका पुरोहित की काउंसलिंग के बाद बच्ची ने न सिर्फ अपने दुष्कर्म के बारे में बताया बल्कि उसे गिरफ्तार भी करवाया। कुछ समय पहले आरोपी जानू पिता महबूब को अदालत ने अपराधी माना और पॉक्सो एक्ट के तहत उसे दस वर्ष कारावास की सजा सुनाई।

 


आंकड़े क्या कहते हैं-

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट में यह साफ है कि हर साल देश में 50,000 से अधिक पोक्सो केस दर्ज होते हैं। हालांकि इनमें से कितने मूक-बधिर या अन्य दिव्यांग है, इसकी कोई स्पष्ट गणना या विवेचना नहीं है। यह डाटा गैप अपने आप में चिंता का विषय है। कई स्वतंत्र रिपोर्ट्स बताती हैं कि यौन शोषण या यौन हिंसा से पीड़ित हर दस बच्चों में से एक दिव्यांग है जो कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुआ है लेकिन अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती है।

बच्चे सबके सांझा होते हैं। फिर यदि वे किसी खास शारीरिक कमी से जूझ रहे हैं तो समाज की जिम्मेदारी उनके प्रति कई गुना बढ़ जाती है। यदि पहले से ही तकलीफ झेल रहे इन बच्चों के साथ यौन शोषण जैसा अपराध होता है तो यह सिर्फ कानूनी विफलता ही नहीं बल्कि हमारी नैतिक और मानवीय हार भी है। पॉक्सो एक्ट ने एक बुनियादी ढांचा दिया है लेकिन इस ढांचे को इंसानी समझ, संसाधनों और संवेदनशीलता से भरने की आवश्यकता है। अन्यथा यह मौन चीखें सभ्य समाज के मुंह पर थप्पड़ की तरह महसूस होती रहेंगीं। 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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