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एक अफगानिस्तान के संकट हजार

Rajesh Badal Updated Thu, 30 Aug 2018 05:23 PM IST
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अफगानिस्तान के लिए मुश्किल घड़ी है। महीने डेढ़ महीने बाद चुनाव होने हैं और तालिबानी तथा आइएस आतंकवादियों ने हमला तेज कर दिया है। बीते दो महीने में अब तक कोई 50 हमले हो चुके हैं। सुरक्षा बलों, पुलिसकर्मियों और अफगानी फौज के अलावा नाटो देशों के सैनिकों को भी निशाना बनाया गया है। इनमें कुल 460 लोग मारे जा चुके हैं। नाटो फौज के लिए अब वहां दिनों-दिन काम करना मुश्किल होता जा रहा है। कुल मिलाकर वहां सांप-छछूंदर जैसी स्थिति बन गई है। नाटो देशों में उनके सैनिकों के मारे जाने से आक्रोश बढ़ता जा रहा है। अब न वो अपने कदम पीछे खींच सकते हैं और आगे बढ़ने में तो खतरे ही खतरे हैं।
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खास बात यह है कि पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनते ही अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी गुटों के चेहरे खिल गए हैं ,जो अभी तक इमरान खान की पार्टी से मदद लेते रहे हैं। अकेले देश की राजधानी काबुल में आठ और एक बड़े शहर जलालाबाद में सात हमले हुए। याने करीब हर सप्ताह एक। काबुल में 95 और जलालाबाद में 85 निर्दोष उग्रवाद की बलि चढ़ गए। जलालाबाद में मारे गए लोगों में 20 सिखों का कत्लेआम भी है। अफगानिस्तान का सुरक्षा तंत्र इसे रोकने में पूरी तरह नाकाम रहा है। अब सरकार के सामने वहां शांतिपूर्ण और सुरक्षित चुनाव कराने की चुनौती है।

दरअसल अफगानिस्तान की संसद जिरगा ने 2004 में मुल्क का नया संविधान मंजूर किया था। इसके अनुसार चुनाव आयोग को मजबूत बनाने के लिए चुनाव सुधार आयोग का गठन किया गया था। इसमें भारत की बड़ी व्यापक भूमिका थी। भारतीय चुनाव आयोग ने वहां के चुनाव आयोग को स्वतंत्र और ताक़तवर बनाने के लिए बाकायदा अफगानी अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया था। इस आयोग ने तीन बरस पहले अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस पर देश व्यापी चुनाव सुधार बहस चल पड़ी। जिरगा की 249 सीटों के लिए पंद्रह अक्टूबर, 2016 को चुनाव होने थे। इसलिए चुनाव सुधार बहस के मद्देनजर सात जुलाई 2018 तक इन्हें स्थगित कर दिया गया।

इसी बीच आतंकवादी हिंसा में तेजी आई। परेशान सरकार ने चुनाव प्रक्रिया बीस अक्टूबर, 2018 तक के लिए टाल दी थी। असल में चुनाव प्रक्रिया में भी कुछ गड़बड़ी हुई। सर्वेक्षण के मुताबिक वहां लगभग एक करोड़ चालीस मतदाता हैं। मगर एक तथ्य उजागर हुआ कि चुनाव आयोग ने दो करोड़ मतदाता पहचान पत्र जारी कर दिए हैं। जाहिर है कि कुछ फर्जीवाड़ा हुआ है। इसकी जांच रिपोर्ट फिलहाल तो नहीं आई है। अफगानिस्तान में कबीलाई या आदिवासी मतदाताओं की संख्या भी बहुत है। यह वर्ग अपनी परंपरागत चुनाव चुनाव प्रणाली नहीं छोड़ना चाहता। उसका यकीन कबीले की मुखिया परंपरा में है। तालिबानी गुट इसका फायदा उठाते हैं और चुनावों का विरोध करते हैं। ये गुट निर्वाचन प्रक्रिया को ही खारिज करते हैं। उनका कहना है कि चुनाव इस्लाम के खिलाफ है। इस कारण उन्हें परंपरागत और आदिवासी-कबीलाई मतदाता समर्थन करते हैं।

अगले साल अप्रैल में अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति का चुनाव भी होना है। पहले शांतिपूर्ण ढंग से जिरगा का चुनाव संपन्न हो तो राष्ट्रपति चुनाव की बारी आएगी। अभी तो अक्टूबर चुनाव पर ही शंका के बादल मंडरा रहे हैं।

चुनाव से ठीक पहले फिर पाकिस्तान समर्थित उग्रवादियों ने ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं। हिंसा के इस दौर के पीछे पाकिस्तान की आईएसआई और फौज का भी सीधा हाथ है, जो न तो अपने देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित सरकार को एक सीमा से अधिक मजबूत होने देना चाहती है और न अफगानिस्तान में। इसके दो कारण हैं।एक तो यह कि इस सबके पीछे हिंदुस्तान है ,जहां जम्हूरियत की जड़ें काफी गहरी हैं। अगर ये जड़ें अफगानिस्तान में भी मजबूत हो गईं तो पाकिस्तान के लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी।

दूसरा कारण यह है कि अफगानिस्तान दुनिया में अफीम की पैदावार में अव्वल है। अफीम से हेरोइन बनती है। दुनिया के तस्कर बाजार में इसकी कीमत अरबों खरबों में है। दोनों देशों की सीमा पर पाकिस्तानी फौज के आला अफसरों की अफीम को हेरोइन में तब्दील करने की अवैध रिफाइनरियां धड़ल्ले से चल रही हैं। इन्हें तालिबानी हक्कानी नेटवर्क का समर्थन है। बदले में हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तानी फौजियों से धन मिलता है। वह इससे हथियार खरीदता है, जिनका उपयोग नाटो सेना से लड़ने और आतंकवादी वारदातों में होता है।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी तहरीके इंसाफ भी इस हक्कानी नेटवर्क को भरपूर मदद देती रही है। आपको याद होगा कि चुनाव से पहले पख्तूनख्वा प्रांत में इमरान की पार्टी गठबंधन सरकार चला रही थी। इस सरकार ने इमरान के निर्देश पर 30 लाख डॉलर हक्कानी नेटवर्क के मदरसों को दिया था। यह नेटवर्क भारत विरोधी है और पाकिस्तानी तालिबान कहलाता है, जो कश्मीर और अफगानिस्तान में आतंकवादी हिंसा को अंजाम देता है।एक निर्वाचित सरकार विकास के काम छोड़कर औपचारिक रूप से इमरान के निर्देश पर उग्रवादी गुटों को पैसा बांटती है। इमरान के प्रधानमंत्री बनते ही तालिबानी गुटों ने खुशियां मनाई थीं। इस तरह पाकिस्तान एक तीर से अनेक निशाने कर रहा है।

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