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कोरोना का बढ़ता संकट: 40 हजार से ज्यादा मामले और बेफिक्र जनता

Thu, 23 Jul 2020 12:12 PM IST
Rituparn Dave ऋतुपर्ण दवे
Updated Thu, 23 Jul 2020 12:12 PM IST
सार

सच है कि कब तक पूरा देश तालाबन्दी में रहता! इसलिए अनलॉक-1 की घोषणा हुई. इसके बाद जो तस्वीरें सामने आईं जो बेहद निराशजनक रहीं. मुक्ति का जश्न मनना शुरू हो गया और कोरोना के आगे समर्पण! संक्रमण के उफान के बावजूद बचाव के उपायों की जबरदस्त अनदेखी हुई. जब कोरोना का आया उफान तब बेफिक्र हुआ इंसान!

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coronavirus update unlock in india covid 19 situation cases are increasing after lockdown
रोजाना 40 से 45 हजार मामलों के बावजूद डर न होना चिंताजनक है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना पर हर रोज चौंकाने वाले आंकड़े भले ही दुनियाभर की सरकारों के लिए चिन्ता का बड़ा कारण हों लेकिन यह भी सच है कि आज दुनिया में कहीं हो न हो लेकिन भारत में इंसान जितना बेफिक्र दिख रहा है, उतना लॉकडाउन के दौर में तो कतई नहीं था।

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क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक स्थिति है या फिर कहीं न कहीं सच को स्वीकारती सच्चाई, जिसे लेकर लोग इतने असंवेदनशील और सहज हो गए हैं कि जो हो रहा है वो भी मंजूर और जो होने की चर्चा है वह भी मंजूर। यकीनन यह मानसिक स्थिति कोरोना संक्रमण से भी कई गुना खतरनाक है क्योंकि लगता नहीं कि  करुणा मर चुकी है?
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लोग कोरोना के भयावह मंजर को देखने के डर को बुझे मन से ही सही मान तो नहीं चुके? ऐसे में कोरोना से बड़ी जंग मानसिक स्थिति को मजबूत कर जीतनी होगी। आज जब कोरोना हर रोज अपने उफान यानी पीक पर पहुंच रहा है और लोग हैं कि बेफिक्र होते जा रहे हैं? यह स्थिति बेहद चिन्ताजनक है।
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सोचना और समझना होगा कि लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर एकाएक क्यों इतने गैर जिम्मेदार हो गए हैं? कोरोना की जंग में खुद को बेहद मजबूत रख कर ही लड़ाई जीती जा सकेगी. अभी तो लड़ाई शुरू हुई है जो कठिन जरूर है लेकिन जीती जाने वाली भी है। ऐसे में बस जरूरत है तो इतनी कि मजबूत इच्छा शक्ति से कोरोना को चुनौती दें न कि स्वीकारें। तो फिर बेफिक्री कैसी?

इसको लेकर निश्चित रूप से देश व राज्य सरकारें अपनी-अपनी तरफ से जरूर फिक्रमन्द होंगी और लोगों के मन में अनायास घर कर गए एक धीमें अवसाद की चिन्ता भी होगी। 

कोरोना को लेकर बड़ी सच्चाई जो जगजाहिर है कि वुुहान की औलाद की पूरी तासीर किसी को नहीं पता थी न है। लाइलाज यह वायरस कई नए रंग, रूप दिख डराता ही जा रहा है। दवा या वैक्सीन न होने से बचाव का प्रकृतिक तरीका ‘लॉकडाउन’ ही काफी कारगर, स्वीकार्य और तात्कालिक आसान उपाय बना।

सच है कि कब तक पूरा देश तालाबन्दी में रहता, इसलिए अनलॉक-1 की घोषणा हुई। इसके बाद जो तस्वीरें सामने आईं जो बेहद निराशजनक रहीं। मुक्ति का जश्न मनना शुरू हो गया और कोरोना के आगे समर्पण! संक्रमण के उफान के बावजूद बचाव के उपायों की जबरदस्त अनदेखी हुई। नतीजा कोरोना की रफ्तार बढ़ी कि भारत दुनिया का तीसरा संक्रमित देश बना दूसरा बनने की होड़ में है।

रोजाना 40 से 45 हजार मामलों के बावजूद डर न होना चिन्ताजनक है। बाजारों, सार्वजनिक स्थानों में भीड़ खुद से मास्क न पहनने पर उतारू लोग, बेहद हैरानी भरा है। बढ़ते संक्रमण और मौत के आंकड़ों बीच अजीब सी सार्वजनिक सामाजिक, मानसिक स्थिति दिखी जो गंभीर हताशा या महामारी की स्वीकार्यता का इशारा तो नहीं? यदि ऐसा है तो कोरोना से पहले लोगों को इससे उबारना होगा।

बेहद कड़ाई और कानूनी सख्ती से भी पीछे नहीं हटना होगा...

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संक्रमण की चाल डरावनी है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

यह सच है कि देश के पहले 1 लाख मामले सामने आने में 111 दिन का समय लगा जो 19 मई को हुए. उसके बाद  2 लाख मामलों का आंकड़ा छूने में केवल 15 दिन लगे जो 3 जून को हुए। इसी तरह  3 लाख मामले पहुंचने में 10 दिन लगे जो 13 जून को हुए. जबकि संक्रमितों की संख्या 4 लाख पहुंचने में 8 दिन लगे जो 21 जून को हुए।

उसके बाद केवल 6 दिन में संक्रमितों की संख्या 5 लाख को पार गई जो 27 जून को हुई. महज 5 दिन बाद यानी 2 जुलाई को संख्या 6 लाख पहुंची और उसके 5 दिन बाद यानी 7 जुलाई को यह संख्या 7 लाख हो गई।

अगले तीन दिनों में यानी 10 जुलाई को कोरोना संक्रमितों की संख्या 8 लाख हो गई। रफ्तार थमने के बजाए बरकरार रही जो 19 जुलाई की तड़के 10 लाख 77 हजार 864 पर जा पहुंची जबकि इसी दिन अब तक का एक दिन में संक्रमित मरीजों के मिलने का रिकॉर्ड 37407 भी बना। 

संक्रमण की चाल डरावनी है। ईश्वर न करे हालात ब्राजील, अमेरिका जैसे हो जाएं, लेकिन लॉकडाउन के बाद जनमानस का जो मिजाज दिखा, उसे देख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ भी मानते हैं कि संक्रमण की रफ्तार रोकने दोबारा देशव्यापी लॉकडाउन से सरकार को परहेज नहीं करना चाहिए तथा इस बात का भी भली भांति प्रचार-प्रसार कर मानसिक रूप से लोगों को तैयार करना होगा कि वो आगे अनलॉक होने पर कैसे खुद, देश और समाज को सुरक्षित रखें।

सभी इस बात को अपनी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी समझें और मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनीटाइजेशन जीवन का तब तक हिस्सा बनाए रखें जब तक कोरोना की कड़ी तोड़ने कोई दवा रूपी चाबुक ईजाद नहीं हो जाता।

बेहद कड़ाई और कानूनी सख्ती से भी पीछे नहीं हटना होगा। कोरोना से बड़ी जंग हमारी अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करने की है ताकि दवा और वैक्सीन के इंतजार के बिना ही कोरोना की जंग जीत भारत फिर दुनिया का विश्व गुरू बन जाए।

 (लेखक स्वतंत्र पत्रकार और स्तंभकार हैं)


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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