कोरोना वायरस: कोरोना काल से करुणा काल की ओर
कोरोना शब्द की ध्वनि दो अन्य हिन्दी शब्दों की ध्वनियों से मिलती जुलती है - घृणा तथा करुणा।
भारत के इस कोरोना काल में घृणा संक्रमण का अनुभव भी देश को लगभग उसी समय, उतनी ही व्यापकता और गहराई से हुआ जितना कोरोना वाइरस के बढ़ते हुए वैश्विक प्रकोप और प्रसार का। इस घृणा विषाणु का दंश तो सबसे ज्यादा राजधानी दिल्ली ने झेला, लेकिन उसकी आंच सारे देश ने महसूस की।
ध्वन्यात्मक निकटता का दूसरा शब्द करुणा भी घृणा विषाणु के संक्रमण के कुछ समय बाद ही दिखने लगा था। जहां एक ओर गहरी साम्प्रदायिक घृणा और षडयंत्रों से उत्पन्न हिंसा का अभूतपूर्व और अप्रत्याशित तांडव दिल्ली ने देखा वहीं जगह जगह सामान्य भारतीयों की, पड़ोसियों की करुणा भी दिखाई दी। दर्जनों हिन्दुओं और मुसलमानों ने धार्मिक उन्माद का शिकार बनने से इन्कार करते हुए अपने विधर्मी पड़ोसियों, अजनबियों को शरण दी, बचाया, सहायता दी।
और अब हम देख रहे हैं कि कोरोना के आतंक ने भारत में एक नई सामाजिक एकता को खड़ा कर दिया है जहां दो सप्तार पहले तक की आपसी शिकायतें, रंजिशें, राजनीतिक-सामाजिक-साम्प्रदायिक मतभेद अपने आप गौण हो गए हैं। भले ही यह आपदा-जन्य उत्तरजीविता का सहज मानवीय मनोविज्ञान हो, लेकिन कोरोना प्रकरण ने हर दूसरी चीज़ और चर्चा को गौण और महत्वहीन कर दिया है।
जनता कर्फ्यू यों तो देश भर में लगभग सफल ही रहा लेकिन...
अखबार, चैनल कोरोनामय हो गए हैं। संक्रमण जैसे जैसे बढ़ रहा है उसके बारे में चिन्ता, चर्चा और जिज्ञासाएं, आशंकाएं भी। स्वाभाविक है कि मीडिया भी अपनी कवरेज उसी अनुपात में बढ़ा रहा है। लेकिन इस भरपूर कवरेज का पूरा संदेश और चेतना अब भी सब जगह बराबर पहुंचे नहीं है।
छोटे शहरों, कस्बों की क्या कहें राजधानी दिल्ली के आनंद विहार जैसे इलाकों में सड़कों, बाजारों, स्टेशनों के बाहर लगभग पहले जैसी भीड़ दिख रही है। एक के बाद एक राज्य सरकार लॉकडाउन कर रही है लेकिन टीवी तस्वीरें बताती हैं कि बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने घर से बाहर न निकलने, मानवीय संपर्क न्यूनतम करने के बुनियादी संदेश को, सामाजिक-शारीरिक दूरी बनाए रखने की आवश्यक सावधानी को गंभीरता से नहीं लिया है।
बिहार की राजधानी पटना में बसों की छतों पर बैठे ढेरों यात्रियों के दृश्य चिंताजनक हैं। जनता कर्फ्यू यों तो देश भर में लगभग सफल ही रहा लेकिन पांच बजे अपने अपने छज्जों, छतों पर स्वास्थकर्मियों का ताली-थाली बजा कर अभिनन्दन करने के उत्साह के बावजूद बड़ी, अमीर-उच्चवर्गीय सोसाइटियों, मोहल्लों में भीड़ जमा कर उत्सव मनाने के दृ्श्य बताते हैं कि लोग अब भी अगंभीर हैं।
इससे सरकारों ने यदि सही सबक नहीं लिया तो सारे लॉकडाउन नाकाम हो जाएंगे। आज भी सारे चैनल और अखबार मिल कर प्रत्येक शहरी नागरिक तक नहीं पहुंच रहे हैं यह कहना तो शायद गलत होगा लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नागरिक खबरों की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं, लगातार बताई जा रही सावधानियों, निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं यह सामूहिक मनोविज्ञान और व्यवहार की गहरी समस्याओं की ओर इंगित करता है।
स्पष्ट है कि केवल टीवी चैनलों, अखबारों से काम नहीं चलने वाला। सरकारों, राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक संगठनों को इस युद्ध में लगाना होगा। पुलिस, अर्धसैनिक बलों, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या भी सीमित है, प्रभाविता भी। उनके लिए प्रत्येक नागरिक तक पहुंचना, लोगों को समझाना असंभव है। इस अब तक असाध्य महामारी से बचाव की जिम्मेदारी अकेली सरकार की नहीं है। यह समय राज्य शक्ति के साथ साथ भारत की समाज शक्ति की सक्रिय भागीदारी का भी है। राज्य और समाज की सभी ईकाईयों को इसमें इस एक युद्ध समझ कर मैदान में उतरना होगा।
लॉकडाउन को सफल और प्रभावी बनाया जा सकता है.
यह समय है कि एक करोड़ से अधिक सदस्यों के साथ विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा, और उसके साथ सारे राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को ज़मीन पर उतारें। हर सांसद, विधायक, पदाधिकारी आज उन सड़कों, मोहल्लों में दिखने चाहिए जहां जन सामान्य के व्यवहार में पर्याप्त गंभीरता और अन्तर नहीं दिख रहा है।
प्रधानमंत्री सारे दलों के पदाधिकारियों की तत्काल बैठक बुला कर उनसे यह अपील करें कि वे अपनी कार्यकर्ताओं को इस काम पर लगाएं। लॉकडाउन को सफल और प्रभावी तभी बनाया जा सकता है जब स्वयं समाज और नागरिक इस काम में जुटें। एक मोहल्ले, एक सड़क, एक बाजार को पूरी तरह बंद करने के लिए भीड़ नहीं अनुशासित और समझदार, स्थानीय स्तर पर प्रामाणिक, सम्मानित और कोरोना संक्रमण के प्रभावी बचाव साधनों से सुसज्जित, प्रशिक्षित लोगों की सुगठित टुकड़ियां काफी हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनुशासित, सक्रिय और सुगठित स्वयेंसेवक संसार सबसे बड़ा और अनूठा संगठन है। हर प्राकृतिक आपदा में, युद्ध में उसके स्वयंसेवक राहत और सहायता कार्य में अग्रणी रहते आए हैं। आशा करनी चाहिए कि यह सामाजिक बल हमें जल्दी ही इस नए राष्ट्रीय शत्रु से युद्ध में भी आगे दिखाई देगा।
यह विभीषिका स्वास्थ्य महामारी ही नहीं आर्थिक महामारी बन कर व्यापक विनाश करेगी
सामाजिक सक्रियता और सहभाग की ज़रूरत केवल लॉकडाउन को संपूर्ण और सफल बनाने के लिए ही ज़रूरी नहीं है। करोडो़ं गरीबों, दिहाड़ी कमाने वालों, कामगारों, छोटे दूकानदारों पर इसकी भयानक मार पड़नी शुरु हो गई है। और ये महामारी के शुरुआती दिन ही हैं।
चंद बड़ी कंपनियों की अपने हर तरह के स्थाई, अस्थाई कर्मियों को पूरा वेतन देने की घोषणाएं निश्चय ही स्वागतेय हैं लेकिन सभी व्यापारी, उद्योगपति ऐसा करेंगे यह आशा नादानी होगी। इतनी करुणा और परदुखकातर उदारता धनी वर्ग आम तौर पर बड़े स्तर पर नहीं दिखाता। लेकिन यह आम दौर नहीं है। यह आशा और उनसे अपील की जानी चाहिए कि इस असाधारण कठिन समय में वे अपने कर्मचारियों की पूरी सहायता करेंगे, यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके लिए जीना ही दूभर न हो जाए। और केवल अपने कर्मचारियों को ही नहीं, कोरोना-पीड़ित और प्रभावित साधनहीन लोगों का भी सहारा बनेंगे।
पहले से चली आ रही आर्थिक मंदी के इस क्षण में जब समूचा व्यवसाय जगत, शेयर बाजार हाहाकार कर रहा है, रोजगार जा रहे हैं, गरीबों ओर अल्पआय वर्गों की स्थिति बेहद विकट होने वाली है। इसलिए अगर प्रत्येक समर्थ व्यक्ति और वर्ग ने इनकी मदद नहीं की, उदारता नहीं दिखाई तो यह विभीषिका स्वास्थ्य महामारी ही नहीं आर्थिक सहामारी बनकर ऐसा व्यापक विनाश करेगी कि देश और दुनिया को उबरने में बरसों लग जाएंगे। यह आर्थिक करुणा शक्ति के प्रकट होने का भी है।
इसलिए अब जब घृणा का वाइरस थमा है, कोरोना संक्रमण धीरे धीरे अप्रतिहत गति से पूरे देश को कब्ज़े में ले रहा है यह समय है करुणा के संक्रमण का। यह सक्रिय करुणा संक्रमण ही कोरोना को हरा सकता है।
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