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दुनिया में चीनी उत्पादों पर हो रही थू-थू, खोई तो पहले ही थी अब तो मिट्टी में मिल गई चीन की साख

Fri, 24 Apr 2020 09:42 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Fri, 24 Apr 2020 09:42 PM IST
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coronavirus covid 19 China's credibility gone soil out giving fake masks ppe treatment kits to other countries
चीनी उत्पादों की गुणवत्ता पर तो पहले ही सवाल खड़े थे। - फोटो : Social Media

जिस वुहान से चीन ने दुनिया भर को मौत बांंटी है, उसी वुहान में हिंदुस्तान से गए फरिश्तों ने हजारों लोगों को मौत के मुंह से निकालकर जिंदगियों का तोहफा चीन को सौंपा था। आज वही चीन अनेक देशों को घटिया और नकली चिकित्सा उपकरण बेचकर अपनी जर्जर आर्थिक हालत सुधारने में जुटा हुआ है।

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आधा दर्जन से अधिक देश चीन की कोरोना रोकने या परीक्षण करने वाली दवाओं को कचरे के ढे़र में फेंकने पर मजबूर हैं। अफसोस तो इस बात पर है कि चीन ने यह खेल उन मुल्कों के साथ खेला है, जिनके साथ उसके मधुर संबंध हैं या जिन्होंने आड़े वक्त पर उसकी हरदम मदद की है।

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इस घटनाक्रम से चीन की चाल,चरित्र और चेहरा संसार के सामने एक बार फिर उजागर हो गया है। चीनी उत्पाद पहले ही कई राष्ट्रों में उपहास और परिहास का विषय था। भारत में तो चीनी माल को लेकर वर्षों से चुटकुले प्रचलित हैं। उनकी तो कोई गारंटी तक नहीं लेता।

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चीनी उत्पादों की गुणवत्ता पर तो पहले ही सवाल खड़े थे। कोरोना- काल में उसकी बनियागीरी ने बची खुची-साख भी मिट्टी में मिला दी है। विडंबना यह है कि उसके खिलाफ सीधा मोर्चा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खोला है और ट्रंप की अपनी छवि भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए सच बोलने के बावजूद उनके समर्थन में कनाडा और ब्रिटेन जैसे देश खुलकर नहीं आए हैं, जो अब तक अमेरिका के गलत और अनुचित फैसलों पर भी आंख मूंदकर मोहर लगाते रहे हैं। चीन ने अपनी कारोबारी धोखाधड़ी में भारत को ही नहीं छोड़ा।


चीन से करीब साढ़े पांच लाख रेपिड परीक्षण किट भारत को भेजी गईं। बड़ी संख्या में ये किट खराब निकलीं। नतीजतन भारत को इन परीक्षण किट पर रोक लगानी पड़ी। इससे पहले भारत आए पीपीई के बारे में भी अनेक शिकायतें मिली थीं।

मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक भारत आपूर्ति से पहले तकनीकी समिति के मानकों के अनुरूप चीन से प्रमाण-पत्र मांगता है। इन प्रमाण-पत्रों और माल का तीसरे पक्ष से मूल्यांकन कराया जाता है, लेकिन इसका पालन नहीं हुआ। अलबत्ता नीति आयोग की ओर से एक सफाई आई है कि ये घटिया परीक्षण किट चीन को किसी देश ने दान में दी थीं। चीन ने उठाकर भारत को बेच दीं। 


 

यूरोपीय और पश्चिमी देशों में चीन की साख को झटका लगा

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टर्की में भी चीनी परीक्षण किट के घटिया और खराब होने की शिकायतें मिलीं - फोटो : PTI

इसी तरह अनेक देशों के साथ चीन ने धोखा किया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने साफ-साफ कहा था कि कोरोना वायरस संक्रमण के पीछे चीन के मांंस बाजार का हाथ है। उन्होंने इस मामले में संयुक्त राष्ट्र से चीन के खिलाफ कार्रवाई की अपील भी की थी।

ऑस्ट्रेलिया में चीन के बाजार से ही मांस आया था। इसके बाद उसने 12 लाख डॉलर कीमत के 8 लाख कोरोना रोधी चीनी मास्क पर रोक लगा दी। ऑस्ट्रेलियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी इस मामले में सरकार को आगाह किया था। इसके बाद स्पेन,  टर्की और नीदरलैंड ने भी चीनी मास्क घटिया पाए थे।

नीदरलैंड में 6 लाख चीनी मास्क के फिल्टर खराब निकले, जबकि उनके साथ चीनी प्रमाण-पत्र भी था। इसी तरह स्पेन में भी परीक्षण किट घटिया पाई गई और चीन को वापस भेज दी गईंं। स्पेन में चीनी राजदूत ने माना कि चीनी कंपनी के पास परीक्षण किट बनाने का लाइसेंस ही नहीं था।

टर्की में भी चीनी परीक्षण किट के घटिया और खराब होने की शिकायतें मिलीं। इसके बाद उनकी आपूर्ति रोक दी गई। इटली के साथ तो चीन ने बड़ा भौंडा मजाक किया। पहले इटली ने जोपीपीई ( व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण ) चीन को निःशुल्क दिए थे, वही उपकरण चीन ने संक्रमण बढ़ने पर निर्धारित दरों से कहीं मंहगे इटली को ही बेच दिए।

इससे सारे यूरोपीय और पश्चिमी देशों में चीन की साख को झटका लगा। अब चीन ने पाकिस्तान को भी कोरोना परीक्षण किट तथा अन्य उपकरणों की आपूर्ति का प्रस्ताव दिया है। पाकिस्तान ने चीन की साख को देखते हुए अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं लिया है।

नेपाल तो चीन की गोद में जाकर बैठा ही था कि उसे भी जबरदस्त झटका लगा। चंद रोज पहले एक चार्टर्ड विमान भेजकर नेपाल ने 6 लाख डॉलर की 75000 रेपिड टेस्ट किट खरीदी थीं। चीन ने उसे एक करोड़ अमेरिकी डॉलर अधिक मूल्य पर उसे ये किट दीं।

जब ये नेपाल पहुंची तो नकली पाई गई। इसके अलावा कुछ और उपकरण नेपाल को मिले, वे भी मानक नहीं थे। मेडिकल गाउन तो साधारण गाउन निकला। नेपाल के विशेषज्ञों ने अपना माथा पीट लिया। इसके बाद उसने सारे चीनी माल के इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

नेपाल के मीडिया में सरकार की किरकिरी हो रही है। चीन ने उपकरणों की कीमत भी बहुत अधिक लगाईं है। सूत्रों की मानें तो एक डॉलर का मास्क 7 डॉलर में, दस डॉलर की टेस्टिंग किट 38 डॉलर में, 25 डॉलर का इन्फ्रारेड थर्मामीटर 65 डॉलर में और 5 डॉलर का डिस्पोजेबल गाउन 16 डॉलर में खरीदा गया। नेपाल ने चीनी कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।        

चीन में जिंदगी बांटने वाले भारतीयों का जिक्र जरूरी है...

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नेताजी ने जवाहरलाल नेहरू को चीन की मदद के निर्देश दिए थे। - फोटो : Netaji Research Bureau

लेकिन यह आलेख समाप्त करने से पहले चीन में जिंदगी बांटने वाले भारतीयों का जिक्र जरूरी है। इतिहास बताता है कि जापान ने चीन पर 1938 में हमला किया था। चीन को दिन में तारे नजर आ गए। उसके घायल सैनिकोंं को इलाज तक नहीं मिल रहा था। 

चीन ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सहायता की गुहार लगाईं, जो उस समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। नेताजी ने जवाहरलाल नेहरू को निर्देश दिया कि वे मदद का प्रबंध करें। इसके बाद दोनों शिखर नेताओं ने एक एम्बुलेंस ,बाईस हजार रूपए नकद और पांच डॉक्टरों का एक दल चीन भेजा।

दल के मुखिया इलाहाबाद के डॉक्टर एम अटल थे। अन्य डॉक्टरों में नागपुर के एम चोलकर, कोलकाता के बी के बासु और देबेश मुखर्जी तथा सोलापुर के द्वारका नाथ कोटनीस शामिल थे। सितंबर 1938 में यह टीम वुहान के येनान पहुंची।

इस दल का स्वागत करने खुद चीन के शिखर कम्युनिस्ट नेता उपस्थित थे। किसी भी एशियाई देश की चीन में यह पहली टीम थी। पांच साल तक इस दल ने हजारों चीनी सैनिकों को मौत के मुंह से निकाला। डॉक्टर कोटनीस ने तो बिना रुके लगातार बहत्तर घंटे तक फौजियों के ऑपरेशन किए।

इसके बाद दल के चिकित्सक लौट आए। डॉक्टर कोटनीस वहीं रह गए। वहां एक नर्स से उन्होंने विवाह किया। बत्तीस साल की उम्र में बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। आज भी चीन में उनकी अनेक मूर्तियां लगी हैं। उनके नाम पर रास्ते, चौराहे और पार्क हैं। स्वास्थ्य सेवा के कारण चीन के लोग आज भी डॉक्टर कोटनीस की धन्वंतरी की तरह पूजा करते हैं।     

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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