पेट्रोलियम उत्पादन पर कोरोना का कोप: मई से हर दिन एक करोड़ बैरल तेल कम निकाला जाएगा
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दुनिया भर में कोरोना के कोहराम के शोर में एक बड़ी खबर विश्लेषण के नजरिए से हाशिए पर चली गई। चंद रोज पहले तेल उत्पादक देशों के दोनों केंद्रों में समझौता हो गया। ओपेक और ओपेक प्लस मुल्क अब एक ही सुर में बोल रहे हैं। सबकी चिंता कच्चे तेल के दामों में 18 साल में आई सबसे बड़ी गिरावट थी। उसके बाद कोरोना ने कहर बरपाया और तेल का उपयोग घटकर एक तिहाई ही रह गया। इस कारण तेल की कीमतें लुढ़ककर 23 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंची।
इन दिनों कमोबेश हर देश की अपनी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई हुई है। यह स्थिति सभी उत्पादकों की चिंता बढ़ाने वाली है। इसे देखते हुए अब तक अनेक बार अलग अलग ध्रुवों पर खड़े रहे देश भी एक ही सिरे पर एकत्रित हो गए। जबतक दाम नहीं बढ़ेंगे, तबतक तेल-देशों की माली हालत नहीं सुधरेगी। इसलिए फॉर्मूला यही निकाला गया कि तेल का उत्पादन 10 फीसदी कम किया जाए। इससे मांग बढ़ेगी और उत्पादक देशों को दाम बढ़ाने का अवसर भी मिलेगा।
असल में इस फैसले ने दुनिया के कारोबारी रिश्ते भी नए सिरे से गढ़ने की नींव डाल दी है। अब तक ओपेक याने आर्गेनाईजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज और ओपेक प्लस देश ही मिलकर तेल उत्पादन की नीतियों का निर्धारण करते थे। ओपेक प्लस श्रेणी में मुख्यतः रूस ही माना जाता रहा है। यह पहली बार हुआ है कि रूस और अमेरिका के साथ साथ ओपेक से बाहर के तमाम देश भी एक प्लेटफॉर्म आकर खड़े हुए और तेल के दाम तय करने में अपनी भूमिका निभाई। अब एक मई से ओपेक रोजाना करीब एक करोड़ बैरल तेल उत्पादन में कमी करेगा।
अन्य देश जैसे नॉर्वे, ब्राजील, कनाडा और अमेरिका प्रतिदिन 50 लाख बैरल तेल उत्पादन गिराएंगे। समझौता फिलहाल मई-जून के लिए हुआ है। इसके बाद रोज दो मिलियन बैरल तेल कम निकाला जाएगा। समझौते से पहले इस मसले पर सऊदी अरब और रूस के मतभेदों ने गंभीर रूप ले लिया था। इससे दाम और नीचे चले गए। सऊदी अरब अपना प्रभुत्व बरकरार रखना चाहता था। उत्पादन घटाने से बाजार में उसकी हिस्सेदारी कम हो सकती थी। सऊदी इसे लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता था क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था का यही इकलौता आधार है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और सऊदी अरब को तैयार किया। इसके बाद मेक्सिको रूठ गया। उसे भी उत्पादन घटने से अपने मार्किट शेयर में गिरावट का खतरा था। ट्रंप ने उसे भी मनाया। परदे के पीछे की एक कहानी यह भी है कि अमेरिका में शेल ऑइल का उत्पादन कुटीर उद्योग की तरह है। यदि तेल के दाम नीचे जाते रहे तो अमेरिकी शेल कंपनियों पर तलवार लटक जाएगी। उनके बंद होने से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो जाएंगे। पहले ही अमेरिका बेरोजगारी के भयावह रूप का सामना कर रहा है। अगर यह समझौता नहीं होता तो डोनाल्ड ट्रम्प के लिए आने वाले चुनाव में खतरे बढ़ जाते।अमेरिका के लिए एक छिपा फायदा यह है कि साल भर में वह तेल उत्पादन का नया चौधरी बन सकता है।
इस समझौते के बाद चीन और भारत पर इसका उल्टा असर पड़ेगा। कोरोना कहर के चलते दोनों देशों पर आर्थिक मंदी की जबरदस्त मार पड़ी है। चीन ने तो अब कोरोना से ध्यान हटाकर अपने उपाय करने शुरू कर दिए हैं। प्रतिदिन उसके निर्यात का ग्राफ ऊपर जा रहा है। लेकिन भारत के लिए यह उतना आसान नहीं है। एक तो भारत की तेल भंडारण क्षमता अत्यंत सीमित है। वह केवल अपने नौ दिन की जरूरत का तेल भंडार में रख सकता है। उसकी यह क्षमता पांच मिलियन टन की है। अगर भारत के विशेषज्ञ युद्ध स्तर पर काम करके इसे 25 मिलियन टन रिजर्व क्षमता पर ले जाएं तो बहुत लाभ होगा। करीब डेढ़-दो महीने का सुरक्षित तेल भंडार किसी भी देश को अनेक चिंताओं से मुक्त कर देता है।
उदाहरण के तौर पर चीन को देखें तो पाते हैं कि उसकी रिजर्व तेल भंडारण क्षमता लगभग 90 मिलियन टन है। जब भी दुनिया में तेल की कीमतें गिरती हैं, चीन अपने रिजर्व भंडार को फुल कर देता है। जब तेल के मूल्य बढ़ते हैं तो चीन के माथे पर चिंता की रेखाएं गहरी नहीं होतीं।इसके अलावा एक कारण और भी है। भारत अपनी आवश्यकता का 86 फीसदी तेल आयात करता है। इसमें खाड़ी देशों का बड़ा हिस्सा है। ईरान से तेल आयात न्यूनतम हो जाने के बाद अमेरिका से आयात शुरू हो गया है। जिन देशों से तेल आयात करते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था चौपट होने से भारत के इन देशों को निर्यात पर भी असर पड़ेगा। यह एक तरह से दोहरी मार जैसा है। इन मुल्कों में डेढ़ से दो करोड़ भारतीय रोजगार पा रहे हैं। वहां मंदी की मार से इन भारतीयों के बेरोजगार होने का संकट खड़ा हो सकता है।
भारत में अक्सर पूछा जाता है कि जब सारे संसार में तेल की कीमतें कम होने का लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है, तो यहां क्यों नहीं? यह ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर किसी परदे में नहीं है। सरकारी प्रवक्ताओं का कहना है कि अगर तेल के दाम गिरने पर सरकार जनता को राहत नहीं देती तो कीमतें बढ़ने पर भी वह एक सीमा से ऊपर नहीं जाने देती। इसमें आंशिक सच्चाई हो सकती है, मगर हकीकत तो यही है कि इससे सरकार का खजाना भरता है और उसका घाटा कम होता है।
एक उदहारण काफी होगा। छह साल पहले पेट्रोल पर सरकार का टैक्स 10.50 रूपए प्रति लीटर था और डीजल पर केवल तीन रूपए। आज यह टैक्स बढ़कर 23 रूपए प्रति लीटर पेट्रोल पर और 18 रूपए प्रति लीटर डीजल पर हो गया है। इससे सरकार को कोई ढाई से तीन लाख करोड़ रूपए की अतिरिक्त आमदनी हो रही है। भारत की भंडारण क्षमता बढ़ जाने पर इसमें और इजाफा हो सकता है। लेकिन इतना तो तय है कि अगस्त तक कच्चे तेल की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल हो जाएंगीं और उसके बाद हिन्दुस्तान को फिर महंगाई के नए सिलसिले का सामना करना पड़ सकता है।
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