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दिल की धड़कनें किसी आलिम के कहे नहीं चला करतीं

Sat, 31 Aug 2019 01:32 PM IST
Skand Shukla स्कंद शुक्ल
Updated Sat, 31 Aug 2019 01:32 PM IST
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connection between heart function and brain article by dr.skand shukla
हृदय का संकुचन स्वायत्त है। दिल की धड़कनें किसी आलिम के कहे नहीं चला करतीं। - फोटो : Pixabay.com

संसार-भर के कवियों-शायरों ने हृदय पर इतने शब्द क्यों लुटाए हैंं, इसे समझने के लिए मेंढ़क पर किया गया ज़ूलॉजी-लैब का वह प्रयोग ही पर्याप्त है, जिसमें नष्ट किए गए मस्तिष्क के बावजूद वह लाल मांसल अंग फूलता-पिचकता रहता है। यक़ीनन दिल को धड़कते रहने के लिए दिमाग़ की ज़रूरत नहीं पड़ती। 

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हृदय का संकुचन स्वायत्त है। दिल की धड़कनें किसी आलिम के कहे नहीं चला करतीं। दिल तो बच्चा है जी, पागल-दीवाना है। चाहे जितनी पंक्तियां उठा लीजिए। इसी स्वायत्तता का गुणगान अलग-अलग शब्दों में कविगण करते आपको मिल जाएंगे।
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वे जानते तो नहीं हैं कि हृदय का एक अपना तन्त्र होता है, जो धड़कनों को बिना दिमाग़ की मदद के जन्म देता है और फिर उन्हें अंजाम भी; फिर भी उनकी कविताओं में, शायरी में अंग की बेपरवाही की बानगी ख़ूब दिखा करती है।

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दिल की धड़कन दिल में ही पैदा होती है। एक लहर की तरह एक कोने में उपजती है, फिर पूरे दिल में क़ायदे से फैलती जाती है। क़ायदा इसलिए कि दिल के अलग-अलग हिस्सों में ख़ून भरे और फिर जिस्म-भर में उसे भेज दिया जाए। इसलिए दिमाग़ रहे- न रहे, दिल धड़क सकता है। बस उसे ऑक्सीजन और ख़ुराक मिलती रहनी चाहिए, ताकि उसकी मांसपेशियां और धड़कन पैदा करने वाला तन्त्र मरने न पाएं। 

connection between heart function and brain article by dr.skand shukla
तो फिर दिमाग़ करता क्या है दिल के लिए? क्या कुछ भी नहीं ? - फोटो : NBC News

तो फिर दिमाग़ करता क्या है दिल के लिए? क्या कुछ भी नहीं ? उसका किसी तरह का क्या कोई नियन्त्रण नहीं? ऐसा नहीं है। दिमाग़ तन्त्रिकाओं के माध्यम से दिल पर नियन्त्रण रखता है, उसकी धड़कनें घटा-बढ़ा सकता है। लेकिन धड़कनों की पैदाइश वह नहीं करता। उसके रहने-न रहने से दिल की धड़कनें न ख़ुशी का इज़हार करती हैं और न ग़मी मनाती हैं।

एक आदमी अस्पताल में भर्ती है। ख़ून में करोड़ों रसायन हैं। किन्हीं रसायनों की ऊंच-नीच से हृदय की मांसपेशियां थम गईं। उसने अंग-अंग को ख़ून फेंकना बन्द कर दिया। मस्तिष्क को ख़ून नहीं मिला। ख़ून से ऑक्सीजन न मिलने से उसके हिस्से मरने लगे। कुछ मरे, या फिर थोड़ी ही देर में पूरा मस्तिष्क मर गया।

इधर डॉक्टरों ने दिल को थपथपाया, कुछ इंजेक्शनों से उसे उठाया और कहा कि उठ मेरी जान अभी तुझे और चलना है। दिल चल पड़ा। मगर दिमाग़ ! वह तो गया ! उसकी जो कोशिकाएं मृत हुईं, क्या वे दुबारा जीवित होंगी। नहीं।


इस इंसान का दिल धड़क रहा है। सांसें वेंटिलेटर के कारण डॉक्टरों ने चला रखी हैं। जिस्म गर्म और गुलाबी है, क्योंकि उसे ख़ून मिल रहा है। लेकिन दिमाग मर चुका है। सदा के लिए। यह व्यक्ति ब्रेन-डेड हो चुका है। ब्रेन-डेड यानी डेड। अब चाहे इसका दिल सालों धड़कता रहे और सांसें चलाईं जाती रहे, यह चैतन्य कभी नहीं होगा। कभी बात नहीं करेगा, कभी सुख-दुःख नहीं बांटेगा। यह सोचता नहीं, महसूसता भी नहीं।

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एक मशीन इसे सांसें दे रही है और इसका लाल मांसल पम्प चल रहा है। - फोटो : फाइल फोटो

एक मशीन इसे सांसें दे रही है और इसका लाल मांसल पम्प चल रहा है। यह व्यक्ति एक यन्त्र-भर है। लेकिन परिवार कैसे गर्म-गुलाबी देह को मृत यन्त्रवत-यन्त्र-संचालित मान ले! वह कहता है, बाबा अभी ज़िंदा हैं ! देखो उनकी सांसें चल रही हैं ! देखो उनकी देह का रंग ! कान लगाओ उनकी छाती पर ! दिल है न दिल -वह धड़क रहा है ! बाबा अभी उठेंगे और उठकर कहेंगे: ले चलो मुझे इस अस्पताल से !


वे डॉक्टर से पूछते हैं, 'बाबा क्या कोमा से उठ नहीं सकते?' 'नहीं, आप वेंटिलेटर मत हटाइए। लगा रहने दीजिए।' डॉक्टर कहते हैं कि बाबा कोमा में नहीं हैं , ब्रेन-डेड हैं। कोमा अलग स्थिति है , ब्रेन डेड अलग। और हां, यही केवल दो स्थितियां नहीं हैं। परसिस्टेंट वेगिटेटिव स्टेट अलग है और लॉक्ड इन सिंड्रोम अलग। बाबा जा चुके हैं। उनका मस्तिष्क सदा के लिए सो चुका है।


यन्त्रों-दवाओं से संचालित उनका शरीर अब एक यन्त्र-भर है। यन्त्र जिसमें एक पागल-दीवाना दिल अब भी धड़क रहा है, कहता हुआ मानो कि ज़िन्दा हूं मैं, ज़िन्दा है मेरा जिस्म!


(स्कंद शुक्ल पेशे से डॉक्टर हैं और लखनऊ में रहते हैं।) 

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