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यूपी चुनाव नतीजेः पहले टेस्ट में ही फेल हो गईं प्रियंका गांधी, कैसे पार लगेगी कांग्रेस की नैया?

Sat, 12 Mar 2022 02:52 PM IST
Kumar Rahman कुमार रहमान
Updated Sat, 12 Mar 2022 02:52 PM IST
सार

सियासत के मैदान में पूरी तरह से आने के बाद प्रियंका गांधी ने मुखर अंदाज अपनाया। वह हर मौके और मुद्दे पर न सिर्फ अपनी आवाज उठाती रहीं, बल्कि कई अवसरों पर सत्ता के खिलाफ संघर्ष करती भी नजर आईं।

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यूपी चुनावों में प्रियंका नहीं डाल पाईं ज्यादा असर - फोटो : एएनआई

विस्तार

कांग्रेस की रही-सही उम्मीद प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अपने पहले टेस्ट में फेल हो गई हैं। कांग्रेसी, प्रियंका गांधी को लंबे समय से राजनीति में लाने की मांग कर रहे थे, उन्हें इंदिरा गांधी की प्रतिमूर्ति बता रहे थे। चुनाव नतीजों के नजरिए से देखें को प्रियंका गांधी अपना असर नहीं डाल सकीं। हालांकि उनकी मेहनत और कोशिशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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वह जनवरी 2019 में पार्टी में आने के बाद से ही सक्रिय रहीं। हर मुद्दे पर मुखर हो कर सामने आईं। उन्होंने मौजूदा चुनाव में महिलाओं को सियासत के मंच पर लाने की भरपूर कोशिश भी की। संगठन न होने की वजह से उनकी कोशिशें वोट में तब्दील नहीं हुईं और 97 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। 
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पिछले ढाई दशक से यूपी में क्रमिक तौर पर कांग्रेस असरहीन होती गई है। 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 28 सीटें मिली थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सपा के साथ समझौता किया था। इसके बावजूद इस चुनाव में वह महज सात सीटें ही जीत सकी।
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आज हालात यह हैं कि तकरीबन सवा सौ साल पुरानी पार्टी महज कुछ साल पहले बने राजा भइया के दल की बराबरी पर आ गई है। इस चुनाव में दोनों ही पार्टियों को दो-दो सीटें मिली हैं। कांग्रेस इस बात से सब्र कर सकती है कि उसकी सीटें बसपा से ज्यादा हैं। 

समय के साथ घटता गया कांग्रेस का जनाधार

उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दलों के उभार के साथ ही धीरे-धीरे कांग्रेस का जनाधार घटता गया। जो लोग कभी कांग्रेस को वोट दिया करते थे, अब वो भाजपा का वोटबैंक हैं। जाहिर बात है कि कांग्रेस का यह जनाधार अचानक ही नहीं खिसका है। हर चुनाव में उसकी सीटें कम से कमतर होती गईं। जब कांग्रेस यूपी में अपना जनाधार खो रही थी तो प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने के लिए पार्टी नेताओं का दबाव कांग्रेस पर लगातार पड़ रहा था। इसके बावजूद पार्टी ने हमेशा उनके सियासत में आने से इनकार किया।

2004 के लोकसभा चुनाव की बात है। उस चुनाव में प्रियंका गांधी पहली बार अपनी मां सोनिया गांधी के लिए प्रचार करने के लिए कई मचों पर नजर आई थीं। इसके बाद प्रियंका के सियासत के मैदान में आने को लेकर फिर से कयास लगाए जाने लगे, लेकिन उन्होंने दूरी बनाए रखी। 

2017 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे थे। चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस के साथ थे। उन्होंने पार्टी को सुझाव दिया कि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंप देनी चाहिए। पीके को पार्टी के कुछ बड़े नेताओं का साथ भी मिला, लेकिन कांग्रेस ने इससे इनकार कर दिया। इस तरह प्रियंका के पार्टी में आने न आने को लेकर हमेशा कयास लगाए जाते रहे। चर्चा होती रही। इस दौरान यूपी में बीजेपी की जमीन काफी मजबूत हो चुकी थी।


2017 के चुनाव में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से चुनाव जीता और उसे 312 सीटें मिलीं। इन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि यूपी से जातिगत राजनीति अपनी परिणति पर पहुंच चुकी है। तब शायद कांग्रेस को पहली बार लगा कि प्रियंका के लिए हालात माकूल हैं या फिर इस चुनाव में मिली सात सीटों ने कांग्रेस को प्रियंका को यूपी की राजनीति में लाने को मजबूर कर दिया।

साल 2019 की 23 जनवरी थी, जब प्रियंका के राजनीति में आने का कांग्रेस ने एलान कर दिया। प्रियंका को पार्टी का महासचिव बनाया गया और उनके कंधों पर पहली बार पूरे यूपी की जिम्मेदारी आ गई। 
 

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प्रियंका भी नहीं लगा पाईं कांग्रेस की नैया पार। - फोटो : Pixabay

सीटों में तब्दील नहीं हो पाई प्रियंका की मुखरता

सियासत के मैदान में पूरी तरह से आने के बाद प्रियंका गांधी ने मुखर अंदाज अपनाया। वह हर मौके और मुद्दे पर न सिर्फ अपनी आवाज उठाती रहीं, बल्कि कई अवसरों पर सत्ता के खिलाफ संघर्ष करती भी नजर आईं।

हाथरस रेप केस में पीड़ित परिवार के साथ उनकी मुलाकात काफी चर्चा में रही, क्योंकि योगी सरकार ने उन्हें वहां जाने से रोकने के लिए एक तरह से पूरी मशीनरी ही लगा दी थी। सीएए और किसान आंदोलन के दौरान भी वह सक्रिय रहीं। उन्होंने महिला सुरक्षा और रोजगार के मुद्दे को भी मुखरता से उठाया। 

विधानसभा चुनाव में प्रिंयका गांधी ने चालीस फीसदी महिलाओं को टिकट देने का एलान किया था। उन्होंने कुल 144 महिला प्रत्याशी मैदान में उतारा। इनमें से सिर्फ एक प्रत्याशी रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र से आराधना मिश्रा ही जीत सकीं। प्रियंका गांधी ने टिकट देने से पहले ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ पंच लाइन के साथ एक मीडिया कैंपेन भी चलाई थी। शुरुआत में इसकी खासी चर्चा भी रही, लेकिन उनकी यह कैंपेन धरातल पर नहीं उतर सकी। नतीजे में 137 प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं।


आधी आबादी को सिसायत के मंच पर लाने की प्रियंका की यह सोच तब सीटों में तब्दील हो सकती थी, जब यह कैंपेन महिला वोटरों तक जा पाती। 

कई स्तर पर कांग्रेस की लिए चुनौती

देश में मीडिया और सोशल मीडिया का सबसे बेहतर अगर किसी पार्टी ने इस्तेमाल किया है तो वह है बीजेपी। पीएम मोदी कोई बात कहते हैं तो उसे गांव-मोहल्ले तक आम आदमी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उनके कैडर ही पूरी करते हैं। भाजपा के कार्यकर्ता एक-एक बात का तोड़ लोगों को कुछ इस तरह से समझाते हैं कि पढ़ा-लिखा आदमी भी कुछ देर के लिए जवाब नहीं दे सकेगा।

कुछ महीने पहले एक प्राइवेट कार से लखनऊ जाते वक्त साथ चल रहे मीडिया के एक मित्र ने ड्राइवर से कहा कि पेट्रोल बहुत महंगा हो गया है। कैसे गुजारा करते हो? ड्राइवर का जवाब था, ‘साहब विकास चाहिए तो महंगा पेट्रोल तो लेना ही होगा।’ है कोई जवाब!

जाहिर बात है उस ड्राइवर को यह बात इतनी ही सहजता से समझाई गई और उसने इसे भरपूर ग्रहण भी कर लिया। कांग्रेस को भी ऐसे ही मजबूत कार्यकर्ता की जरूरत है जो उसकी बातों को घर-घर सहजता के साथ पहुंचा सके।  

कभी कांग्रेस इस देश की सबसे बड़ी कैडर वाली पार्टी हुआ करती थी। आजादी के बाद कांग्रेस के पास बहुत मजबूत कैडर और संगठन था। पंडित नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने कैडर बनाने और संगठन को मजबूत बनाए रखने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं किए। फिर जेपी आंदोलन के बाद कांग्रेस के कैडर में बिखराव हुआ। फिर उसे दुरुस्त करने की कोई कोशिश नहीं हुई।

पंडित नेहरू के लगाए पेड़ के फल कांग्रेस कुछ दशक पहले तक खाती रही, लेकिन खुद कोई पेड़ नहीं लगाया। यही हाल पार्टी के अनुषांगिक संगठनों का हुआ। एनएसयूआई का एक तरह से वजूद ही खत्म हो गया। न युवा दल बचा है और न किसान संगठन ही सक्रिय है। महिला संगठन का भी कुछ ऐसा ही हाल है।


आज बीजेपी की जो ताकत है, उसके पीछे उसकी सांगठनिक पकड़ भी बड़ी वजह है, जो कांग्रेस के पास नहीं है। 

कुछ साल पहले यूपी कांग्रेस ने बड़े लेवल पर सीपीआईएमएल (लिबरेशन) से जुड़े लोगों को पार्टी से जोड़ा है। इसकी शुरुआत तीन साल पहले जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष संदीप सिंह के साथ हुई थी। बताते हैं कि प्रियंका गांधी उन्हीं की सलाह पर फैसले लेती हैं। संदीप सिंह के बाद यूपी कांग्रेस में वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग बड़ी संख्या में लाए गए। लगा जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव नजर आएंगे। कांग्रेस पार्टी धरातल पर उतर कर मजबूती से काम करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

कहीं प्रियंका के झाड़ू देने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया जाने लगा तो कहीं सीएए आंदोलन के दौरान उनका स्कूटर पर पीछे बैठा हुआ वीडियो वायरल किया जाने लगा। यह वीडियो चर्चा जरूर बनाते हैं, लेकिन वोट आधार नहीं। जमीन से कट जाने की वजह से जिस तरह के कम्यूनिस्ट पार्टी हाशिये पर चली गई, उसी कम्यूनिस्ट पार्टी से आए थके-हारे लोग कांग्रेस का कितना और किस तरह से भला करेंगे, इसके नतीजे सामने आने लगे हैं। 

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। 
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