मौसम का मिजाज
ऋतुएं नहीं बदलेंगी तो धरती का पूरा ईको सिस्टम ही बिगड़ जाएगा। फसलें नहीं उगेंगी। पेड़ों की असमय मौत हो जाएगी। हवा में ऑक्सीजन का प्रतिशत गडबड़ा जाएगा यानी की सबकुछ तहस नहस हो जाना है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
एक बड़ी प्रचलित कहावत है, उनका मिजाज मौसम की तरह बदलता है यानी कि मौसम का कोई स्थाई मिजाज नहीं होता है। वो कभी भी बदल जाता है। इन दिनों भी कुछ ऐसा ही चल रहा है। ऋतुराज बसंत की विदाई के साथ ही गर्मी दस्तक दे देती है। हवा में गुलाबी जाड़ों सी शीतलता मौजूद है।
मौसम को तवज्जो देने वाले खुश हैं कि ऐसा ही मौसम रहे तो अच्छा है। न ज्यादा गर्मी पड़े न कुड़कुड़ाती ठंड। मगर ऐसा मुमकिन नहीं है। ऋतुएं नहीं बदलेंगी तो धरती का पूरा ईको सिस्टम ही बिगड़ जाएगा। फसलें नहीं उगेंगी। पेड़ों की असमय मौत हो जाएगी। हवा में ऑक्सीजन का प्रतिशत गडबड़ा जाएगा यानी की सबकुछ तहस नहस हो जाना है।
कोरोना काल के दौरान जब लंबे समय तक लॉकडाउन लगा रहा तो काफी हद तक प्रदूषण से मुक्ति मिल गई थी। न गाड़ियां चल रही थीं, न फैक्ट्रियां धुंआ छोड़ रही थीं और न ही उस तरह से पेड़ों की अंधाधुंध कटान ही हो रही थी। नतीजा यह था कि वायु प्रदूषण के साथ ही ध्वनि, जल और मृदा प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण हो गया था।
लॉकडाउन के महीना भर गुजरने के साथ ही इसका असर भी मौसम और फिर जीवन शैली पर भी दिखने लगा। वातावरण एकदम साफ हो गया था। बरेली जैसे शहरों से नैनीताल की पहाड़ियां दिखने लगी थीं। मोर सड़कों पर नाचते दिख रहे थे। गौरैया धूल में लोटती नजर आने लगी थीं। यूं लग रहा था कि सब कुछ पचास साल पीछे चला गया है।
इसका असर मौसम पर भी दिखने लगा था। 2020 के लॉकडाउन में मई में भी शिद्दत की गर्मी नहीं पड़ी। मौसम बड़ा ही कूल-कूल सा रहा। लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि प्रदूषण की कमी की वजह से वेदर बहुत प्लीजेंट हो गया है। 2022-23 में सर्दियां भी बहुत कम पड़ीं। न पहले जैसा कोहरा ही दिखा और न शीत लहरी का ही एहसास हुआ।
कुछ साल पहले के मौसम के बारे में गौर करें तो यह हमेशा लगता है कि इस बार जैसी गर्मी पहले कभी नहीं पड़ी! इस पर घर के बड़े-बुजुर्ग टोकते हुए कहते हैं, “अब कहां गर्मी पड़ती है। गर्मी तो हमारे जमाने में पड़ती थी!” उनकी बात सुनकर अकसर मन में यह ख्याल आने लगता है कि दादा के समय में तो पर्यावरण बहुत साफ-सुथरा था, फिर तब इतनी गर्मी क्यों पड़ती थी?
इन बातों के दौरान मौसम के बारे में अक्सर अखबारों में छपी एक खबर और ज्यादा अचंभित कर जाती है, गर्मी ने 120 साल का रिकॉर्ड तोड़ा। दरअसल इन खबरों का सीधा सा मतलब होता है कि 27 जून जैसा हाई टंपरेचर इसी तारीख को 120 साल पहले था। यानी यह तापमान, विशेष एक दिन का होता है। अब इन दिनों जैसा मौसम है तो खबरों की हेडिंग होगी कि पांच अप्रैल का दिन 90 साल का सबसे ठंडा दिन रहा।
इन सबके बीच अहम सवाल यह है कि मौसम का यह बदलता मिजाज क्या किसी खतरे की घंटी है?
यही सवाल हमने पर्यावरणविद् डॉ. एपी सिंह से पूछा। वह कहते हैं, “यह क्लाइमेट का पीरियाडिकल टाइम चल रहा है। ऐसा अभी आगे भी चलते रहने की उम्मीद है।” वह कहते हैं कि इसे निश्चित तौर पर खतरे के तौर पर देखने की जरूरत है। मौसम का यह बदलाव अचानक किसी बड़ी घटना को जन्म तो नहीं देगा, लेकिन कालांतर में इसके नुकसान उठाने पड़ेंगे।
यह बदलाव बहुत धीमी गति से निरंतर हो रहा है। ऋतु का यह परिवर्तन इतना धीमा है कि हम इस पर गौर भी नहीं कर पाते हैं, लेकिन जब हम पिछले 30-35 साल का डेटा उठाकर देखते हैं तो समझ में आता है कि मौसम किस तरह से बदल रहा है।
जैसा की शुरू में बताया गया कि दो-तीन साल में हुआ मौसम का यह बदलाव अब स्पष्ट दिखने लगा है, लेकिन मौसम विज्ञानियों का कहना है कि यह बदलाव निरंतर हो रहा है। अब चीजें साफ दिखने लगी हैं और हमने इस पर गौर भी करना शुरू किया है। डॉ. एपी सिंह ने कहा कि 30-35 साल पीछे जाकर देखें तो पता चलता है कि उत्तर भारत में उन दिनों मई के दूसरे-तीसरे हफ्ते में वर्षा ऋतु दस्तक दे देती थी।
अब बारिश का यह मौसम आगे शिफ्ट हो गया है और अब जून में बारिश होती है। धीरे-धीरे मानसून की आमद जुलाई की तरफ बढ़ रही है। इसी तरह से सर्दियां भी पहले जल्दी आ जाती थीं। अक्टूबर के आखिर में ही रजाई-गद्दे निकल आते थे। अब नवंबर में गुलाबी सर्दी रहती है।
ऋतुओं के परिवर्तन का असर फसलों पर भी पड़ रहा है। डॉ. सिंह ने कहा कि आप किसी बूढ़े किसान से पूछें तो वो बताएगा कि 70 साल पहले गेहूं की फसल नवंबर में बोई जाती थी। किसी किसान की गेहूं की बुआई नहीं हो पाती थी तो बाकी किसान मजाक बनाते हुए कहते थे कि गंगा स्नान हो गया और अभी इनके यहां गेहूं नहीं बोया जा सका। अब गेहूं की फसल दिसंबर में बोई जाने लगी है। इसी तरह से अब गर्मी का मौसम भी देर से शुरू हो रहा है।
आने वाले दिनों में ऋतुओं का यह परिवर्तन गंभीर खतरे लेकर आ सकता है। डॉ. एपी सिंह ने बताया कि क्लाइमेट शिफ्टिंग का असर फसलों की पैदावार पर पड़ेगा। नए तरह के फ्लू और दूसरी बीमारियां आएंगी। वह सुझाव देते हुए कहते हैं कि शहरीकरण की जगह वनीकरण की स्कीम लाई जानी चाहिए।
शहरों की जगह अब गांवों को डेवलप किया जाए ताकि शहरों का विस्तार न हो। सिंगल घर की जगह फ्लैट कल्चर को बढ़ावा देने की जरूरत है, ताकि वनों और खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में न बदलना पड़े। आज के मुकाबले पुराने लोग कुदरत और मौसम को लेकर ज्यादा जागरूक थे। लोगों को फिर से कुदरत के साथ जीना सीखना ही होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।