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रिचार्ज होने वाली दुनिया के लिए नोबेल, इसलिए खास है रसायनशास्त्र में हुई ये खोज

Sat, 02 Nov 2019 02:30 PM IST
shashank dwivedi शशांक द्विवेदी
Updated Sat, 02 Nov 2019 02:30 PM IST
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chemistry nobel prize 2019 Akira Yoshino, M. Stanley Whittingham, John B. Goodenough
रसायन विज्ञान के लिए नोबेल की घोषणा - फोटो : The Nobel Prize

हाल में ही जीवाश्म ईंधन का वर्चस्व खत्म करने और पर्यावरण की बेहतरी की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए तीन वैज्ञानिकों को लिथियम आयन बैटरी के विकास पर काम के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। इन हल्की, पुन: रिचार्ज हो सकने वाली और शक्तिशाली बैटरियों का इस्तेमाल अब मोबाइल फोन से लेकर लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों आदि सभी में होता है।

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यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से जुड़े अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन गूडेनफ, बिंघमटन में स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के एम स्टेनली व्हिटिंघम तथा जापान के असाही कासेई कॉर्पोरेशन एंड मीजो यूनिवर्सिटी के अकीरा योशिनो को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। एकेडमी के महासचिव गोरान हैनसॉन ने कहा कि यह पुरस्कार एक ‘रिचार्ज होने वाली दुनिया’ को लेकर है।
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समिति ने एक बयान में कहा कि लीथियम आयन बैटरियों ने हमारी जिंदगियों को बदल दिया है और इन वैज्ञानिकों ने एक बेतार, जीवाश्म ईंधन मुक्त समाज की बुनियाद रखी। नोबेल समिति का मानना है कि लीथियम आयन बैटरी के विकास की शुरुआत 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान हुई थी जब व्हिटिंघम ऐसी ऊर्जा तकनीकों पर काम कर रहे थे, जो पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन से मुक्त हों। 

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रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंस ने पुरस्कारों का एलान करते समय कहा-, "इस दोबारा चार्ज होने वाली बैट्री ने मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे बेतार उपकरणों की नींव रखी है। इसने जीवाश्म ईंधन से मुक्त दुनिया को भी संभव बनाया है क्योंकि यह इलेक्ट्रिक कारों से लेकर अक्षय स्रोतों के लिए ऊर्जा जमा करने में इस्तेमाल हो रहा है। व्हिटिंगम ने 1970 के दशक में पहली लिथियम बैट्री बनाई थी। गुडएनफ ने इस बैट्री की क्षमता को अगले दशक में दोगुना कर दिया। 


योशिनो ने इस बैट्री में से शुद्ध लिथियम को बाहर कर दिया जिसके कारण इसका इस्तेमाल सुरक्षित हो गया। इस पुरस्कार के तहत स्टाकहोम और नॉर्वे के ओस्लो में 10 दिसंबर को एक समारोह में 90 लाख क्रोनोर (9,18,000 डॉलर) की नगद राशि, एक स्वर्ण पदक और डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। 10 दिसंबर को इस पुरस्कार के संस्थापक स्वीडिश उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि है।

लीथियम आयन बैट्री के विविध पहलुओं पर काम करने के लिए  (जिसमें फोन, कैमरा और कैमकॉर्डर जैसी चीजों में काम आने वाली छोटी, पावरफुल बैटरी ) रसायनशास्त्र का नोबेल देना एक सही कदम है क्योंकि वाकई में लीथियम आयन बैट्री से जिंदगी आसान हुई है।

अभी कुछ साल पहले तक इतनी ताकतवर चीज की कल्पना करना भी कठिन था, लेकिन इन बैटरियों का इस्तेमाल अब फोन जैसी छोटी चीजें ही नहीं, भारी ट्रक चलाने में भी होने लगा है। अलबत्ता इसके साथ एक ही तकनीकी समस्या है कि इस्तेमाल होने के दौरान यह गरम होती है और इस क्रम में बड़ी तेजी से फूलती है।

फोन को एक छोटा-मोटा बम बना देने वाली इस बीमारी का हल खोजे बिना लीथियम आयन बैट्री को फूलप्रूफ आविष्कार नहीं कहा जा सकता। इसकी दूसरी समस्या लीथियम की महंगाई से जुड़ी है, जिसकी कीमत 2016 से 2018 के बीच ही दोगुनी हो गई और अगले दशक में दस गुनी हो सकती है। 

 

chemistry nobel prize 2019 Akira Yoshino, M. Stanley Whittingham, John B. Goodenough
रसायनशास्त्र में नोबेल विजेता 2019 - फोटो : twitter

क्या है लीथियम आयन बैटरी?
लीथियम आयन बैटरी को आधुनिक बैटरी भी कहा जाता है। लीथीयम बैटरी पर पहली कोशिश एमएस व्हिटिंघम द्वारा देखने को मिली। वर्ष 1970 में उन्होंने बीजली उत्पान के लिए टाइटेनियम सल्पफाइड और लिथियम मैटल का उपयोग किया था। यह पहला सफल प्रयोग कहा जा सकता है। हालांकि इसके बाद पूर्ण तरीके से बैटरी बनने में काफी समय लगा। 1980 में ऑक्सफोर्ड आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जॉन गूडेनफ और कोईची मिजुशीमा ने रिचार्जेबल लीथीयम बैटरी को दिखाया। जॉन गूडेनफ को लीथीयम बैटरी का फादर भी कहा जाता है।

इस प्रयोग के बाद काफी प्रगति देखने को मिली। बीजली उत्पादन के लिए लीथीयम का उपयोग कई अन्य रसायन के साथ भी किया गया और अन्नतः 1991 में सोनी और असाही कासई द्वारा पहली लिथियम बैटरी को पेश किया गया। वहीं 1997 पहली बार लिथियम पॉलिमर  बैटरी पेश किए गए। मोबाइल में लिथियम आयन और लिथियम पॉलिमर  बैटरी का ही उपयोग होता है।

लीथियम आयन बैटरी रिचार्जेबल बैटरी श्रृंखला का ही एक कड़ी है। इसमें मुख्सयतः तिन तत्वों का संयोग हेाता है। नेगेटिव इलेक्ट्रोड  , पोजेटिव इलेक्ट्रोड और इलेक्ट्रालाइट। बैटरी में कार्बन नेगेटिव इलेक्ट्रोड के लिए उपयोग होता है। जबकि आक्साइड का उपयोग पोजेटिव इलेक्ट्रोड के लिए किया जाता है। वहीं लिथियम साल्ड इलेक्ट्रोलाइट के लिए होता है।

लिथियम बैटरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वोल्टेज की जरूरत के अनुसार इसके संयोग को बढ़ा और घटा सकते हैं। वहीं इसे एक छोटे से पैकेट में भी बना सकते हैं। यही वजह है कि मोबाइल, लैपटाप बौर टैबलेट जैसे इलेक्ट्रानिंक्स डिवायस में ध्ड़ल्ले से इसका प्रयोग हो रहा है। बोल चाल की भाषा में इसे ली-आन बैटरी कहा जाता है।

लिथियम पालिमर बैटरी
लिथियम पालिमर बैटरी में लिथियम आयन के समान तकनीक का ही उपयोग होता है। इसमें लिथियम के साथ ठोस पालिथिन आक्साइड या पालिएक्रानलियोनिट्रील का उपयोग किया जाता है। लिआन बैटरी के समान यह भी छोटे से पैकेज में बनाया जा सकता है और उपयोग में आसान भी होता है। साधरणतः बोल चाल में इसे ली-पो बैटरी नाम से जाना जाता है।

ताकत मापने के लिए एमएएच का प्रयोग  
लिथियम आयन और लिथियम पालिमर बैटरी दोनों में इसकी इसके ताकत मापने के लिए एमएएच का प्रयोग होता है। वास्तव में एमएएच इसके ताकत मापने का पैमाना है। बैटरी चार्ज को एंपियर आवर के माध्यम से मापा जाता है और छोटे डिवायस में चार्ज के लिए मिलि एंपियर आवर को पैमाना बनाया जाता है।

एमएएच का आशय होता है- मिलि एंपियर आवर 1मिलिएंपियर आवर एक एंपियर आवर का एक हजारवां भाग है। अर्थात् 1 एंपियर आवर = 1000 मिलिएंपियर। इस तरह एक बैटरी जितना ज्यादा एमएएच का होगा वह उतना ज्यादा बैटरी बैकअप देने में सक्षम होगा। मोबाइल में बैटरी न हो तो कुछ काम ही नहीं हो सकता लेकिन यदि बैटरी का उपयोग सही तरीके से न हो तो आपको आर्थिक या शारीरिक नुकसान भी हो सकता है।

ऐसे में कुछ सावधानियां भी रखनी होंगी मसलन मोबाइल को चार्ज करते समय कॉल न करें साथ ही चार्जिंग के दौरान यदि बैटरी ज्यादा गर्म हो तो जल्द से जल्द चार्जिंग निकाल दें और सर्विस सेंटर से संपर्क करें।

लिथियम आयन की फोन बैटरी यदि फूल गई हो तो उसे तुरंत निकाल दें। आज स्मार्टफोन के दौर में पावर बैंक का उपयोग काफी बढ़ गया है। इनमें भी ली-ऑन बैटरी का ही प्रयोग होता है लेकिन इन्हें इस तरह से डिजाइन किया गया होता है कि यह आपके फोन को चार्ज कर सके।

इन चार्जर को कंप्यूटर या लैपटाप के यूएसबी के माध्यम से चार्ज किया जा सकता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इन्हें पावर बैंक कहा जाता है। कुलमिलाकर लीथियम आयन बैटरी की विकास और खोज तकनीक की दुनिया में बहुत युगांतकारी कदम है जिसने न सिर्फ लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। 

(लेखक मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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