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मनीषा कोइराला का ब्लॉगः कैंसर ने मुझे जीवन का नया फलसफा सिखाया, बदल दी खुशियों की परिभाषा

Sun, 01 Sep 2019 01:40 PM IST
Manisha koirala मनीषा कोइराला
Updated Sun, 01 Sep 2019 01:40 PM IST
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Cancer taught Manisha Koirala value of life
हिंदी सिनेमा ने मुझे बहुत प्यार दिया है। - फोटो : social media

सिनेमा के आगे जहां और भी है। और, जबसे लंबी बीमारी के बाद मेरा पुनर्जन्म हुआ है मुझे इस दूसरे जहां से प्यार हो चला है। मुझसे जो लोग भी बातें करने आते हैं, चाहे वे पत्रकार हों, मित्र हों, रिश्तेदार हों या कोई भी हो, सब मेरे कैंसर से संघर्ष के बारे में जानना चाहते हैं। और, मुझे लगता है कि जीवन की हर घटना एक सबक होती है।

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इससे कुछ अच्छा ही सीखना चाहिए। ऐसा बोलने से बचना चाहिए जिससे दूसरों को कष्ट हो। खासतौर से अगर आप किसी बीमार को देखने जा रहे हैं तो आपको अपने मन में पहले सोच लेना चाहिए कि आप क्या बातचीत करने वाले हैं। उसकी बीमारी की बातें कुरेदकर या उसके अनचाहा ज्ञान देकर आप उसे परेशान ही करने वाले हैं।
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हिंदी सिनेमा ने मुझे बहुत प्यार दिया है। अपनी पहली फिल्म सौदागर के दिनों से लेकर आने वाली फिल्म प्रस्थानम तक मैंने इस शहर में बहुत कुछ देखा, सुना, जांचा और परखा है। परखने से मेरा मतलब मैं किसी के बारे में कोई धारणा नहीं बना रही लेकिन ये समझ आता है कि कौन आपका सच्चा मददगार है और कौन नहीं। 

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Cancer taught Manisha Koirala value of life
कैंसर ने मुझे जीवन का नया फलसफा सिखाया है और मुझे अब छोटी- छोटी चीजों में खुशियां नजर आती हैं।

कैंसर ने मुझे जीवन का नया फलसफा सिखाया है और मुझे अब छोटी- छोटी चीजों में खुशियां नजर आती हैं जिनकी तरफ शायद पहले मेरा ध्यान नहीं गया। ये वो बातें हैं जो आमतौर पर हम भागदौड़ भरी जिंदगी में नजर अंदाज कर देते हैं। हम कुछ भी खाते रहते हैं और कभी ये ध्यान नहीं देते कि हमारी सेहत के लिए क्या सही है और क्या गलत?

खुशियों की मेरी परिभाषा भी अब बदल चुकी है। मैं चाहती हूं कि दूसरे लोग भी इस बात को समझें कि हमारी जरूरतें कभी खत्म नहीं होतीं। लेकिन जरूरत और चाहत का फर्क समझना जरूरी है। नंगे पांव घास पर चलने का जो एहसास है, उसकी कीमत कुछ नहीं है पर इसे पैसों में तौलने जाएंगे तो इसे कोई दौलत खरीद नहीं सकती।

जिंदगी इन्हीं छोटे छोटे एहसासों का नाम है। आपकी बोली से किसी को कष्ट न हो, आपकी जरूरतें किसी पर बोझ न बनें और आपकी पसंद किसी के बारे में कोई धारणा न बनाए, यही सब मुझे अब खुशहाल बनाए रखता है।
 

Cancer taught Manisha Koirala value of life
मैं अब भी खाने की बहुत शौकीन हूं। लेकिन, हां, डॉक्टरों के कहने पर मेरा खान- पान जरूर बदला है।

मैं मानती हूं कि पहले से मेरे भीतर काफी कुछ बदल चुका है। फिर चाहे वो जिंदगी हो या सिनेमा। सिनेमा मेरे लिए एक जुनून रहा है। अब भी मेरे पास तरह- तरह के प्रस्ताव आते हैं लेकिन मैं वही काम करती हूं जिसे मेरा मन करने को कहता है। मुझे शुरू से अच्छे निर्देशकों के साथ काम करना पसंद रहा है।

एक निर्देशक अगर मुझे मेरा किरदार सही से समझा सकता है तो मुझे पता चल जाता है कि परदे पर वह कैसा दिखेगा। ऐसा ही कुछ जीवन के साथ है, यहां आप अपने खुद के निर्देशक होते हैं। आपके विचार और आपकी मनोदशा तय करते हैं कि आप दूसरों को कैसे दिखेंगे। 

लोग अक्सर मुझसे ये भी पूछते हैं कि क्या मेरा खान पान बदल गया है। तो मैं कहती हूं कि खान पान को लेकर मेरा नजरिया पहले जैसा ही है। मैं अब भी खाने की बहुत शौकीन हूं। लेकिन, हां, डॉक्टरों के कहने पर मेरा खान- पान जरूर बदला है। मैं शक्कर बिल्कुल छोड़ चुकी हूं। मीठा खाने का मन करता है तो गुड़ या शहद जरूर चुपके से चख लेती हूं वह भी कभी- कभी।

खाने में शुरू से हमें अपने बच्चों को पत्ते वाली सब्जियां खाने की आदत डालनी चाहिए। बीच में तो मैं भी बिल्कुल शाकाहारी हो गई थी, अब कभी कभी मछलियां और अंडे मेरे भोजन का हिस्सा होते हैं लेकिन वह भी बहुत कम। मेरा ये मानना है कि हरी सब्जियों में हर रोग से लड़ने की ताकत होती है और ये आपको भीतर से भी काफी मजबूत बनाने में मदद करती हैं।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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