अलविदा दिलीप साहब: बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
दिलीप साहब और अमित जी दोनों ही बहुत बड़े कलाकार हैं, इससे भी बढ़कर बहुत ही अच्छे इंसान- दोनों के सफलता के शीर्ष पर
पहुंचने पर भी अंत तक उनके सीखने के जज़्बे को सलाम।
फिल्म शक्ति में भी दिलीप साहब अपने पुलिस कमिश्नर के किरदार को और बेहतर तरीके से अदा करने के लिए पुलिस कर्मियों की जिंदगी से जुडी किताबों का शूटिंग के दरमियान तक अध्ययन करते नज़र आते हैं और बच्चन जी का भी अपने सीनियर के प्रति सम्मान, उनसे सीखने की जिज्ञासा-दोनों ही लाजवाब हैं!
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आज सुबह साइकलिंग के लिए निकला ही था कि वरिष्ठ फिल्म समीक्षक वी. एस. दत्ता का फोन आया और उन्होंने दिलीप कुमार साहब के इस दुनिया से कूच कर जाने की दुख खबर सुनाई। ये सुनना था कि दिलीप साहब का पुर-वक़ार चेहरा जैसे नजरों के सामने आ गया। उनका व्यक्तित्व एक जमाने का प्रतिनिधित्व करता है। फ़िल्मी दुनिया की चका-चौंध में रहते हुए भी उन्होंने कभी अपने ज़मीर और तहज़ीब से समझौता नहीं किया।
दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत फिल्म शक्ति से जुड़ी एक रोचक घटना याद आती है। दिलीप साहब ने इस फिल्म में बच्चन जी के पिता का रोल अदा किया है। इस फिल्म के रिलीज़ होने के कुछ समय बाद मेरे एक मित्र किसी परिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में गए हुए थे। वहां पर इस फिल्म-क्रू के एक वरिष्ठ सदस्य भी संयोगवश आए हुए थे। कार्यक्रम में जमा लोगों ने उनसे फ़िल्मी दुनिया के कुछ क़िस्से बताने का अनुरोध किया।
इस पर उन्होंने फिल्म शक्ति की शूटिंग से जुड़ी कुछ बातें बताईं। उन्होंने कहा कि एक दिन इस फिल्म का बहुत ही महत्वपूर्ण सीन शूट किया जाना था और सुपर स्टार बच्चन जी सेट पर आ चुके थे। दिलीप साहब कहीं नज़र नहीं आ रहे थे और हम सब उनका बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
अंततः काफी वक़्त गुज़र जाने के बाद दिलीप साहब सेट पर आए। दिलीप साहब से बहुत ही अदब के साथ देर हो जाने की वजह पूछी गई, वे बोले कि वह पिछले कई दिनों से पुलिस वालों की ज़िन्दगी, उनके काम करने के तरीक़े आदि से जुडी कुछ किताबों के मुताले में व्यस्त थे और शायद इसी वजह से वक्त कुछ ज्यादा लग गया। बता दें कि फिल्म में दिलीप साहब ने पुलिस कमिश्नर पिता का एक बेमिसाल किरदार निभाया है।
खैर, उस दिन पिता और पुत्र के बीच का वह सीन फिल्माया जाना था जिसमें दिलीप साहब और बच्चन जी आमने-सामने होते हैं और दोनों के बीच बहुत ही तनाव पूर्ण संवाद चल रहा होता है। तभी अचानक से दिलीप साहब रुक जाते हैं और अमिताभ बच्चन से बड़े प्यार से पूछते हैं- आपने मेरी फिल्म मुगल-ए-आजम देखी है , इस पर बच्चन साहब कहते हैं- एक बार नहीं बल्कि कई बार देखी है। बच्चन जी पूरी विनम्रता से बोले।
इतना सुनते ही दिलीप साहब प्यार से बोले- आपने गौर किया होगा कि अकबर और सलीम के बीच संवाद के दौरान सलीम ने अपने पिता अकबर से कभी उनकी आंख से आंख मिला कर बात नहीं की।
मैं उम्मीद करता हूं कि आज इस सीन में भी हम लोग इस बात का ख्याल रखेंगे। बेटा कितना भी गुस्ताख क्यों ना हो जाए, बाप की नजर से नजर मिला कर कभी बात नहीं करता। यही हमारी तहज़ीब है।
दिलीप साहब और अमित जी दोनों ही बहुत बड़े कलाकार हैं, इससे भी बढ़कर बहुत ही अच्छे इंसान- दोनों के सफलता के शीर्ष पर पहुंचने पर भी अंत तक उनके सीखने के जज़्बे को सलाम। फिल्म शक्ति में भी दिलीप साहब अपने पुलिस कमिश्नर के किरदार को और बेहतर तरीके से अदा करने के लिए पुलिस कर्मियों की जिंदगी से जुडी किताबों का शूटिंग के दरमियान तक अध्ययन करते नज़र आते हैं और बच्चन जी का भी अपने सीनियर के प्रति सम्मान, उनसे सीखने की जिज्ञासा-दोनों ही लाजवाब हैं!
फिल्म मुगले-ए-आज़म के एक बहुत ही मशहूर डायलॉग की एक पंक्ति याद आ रही है, जहां पर बादशाह अकबर सलीम से नराज हो कर अपने सिपाहियों को हुक्म देते हैं
‘सलीम की बढ़ती हुई गुस्ताखियों को क़ैद कर लिया जाए।‘ आज ऐसा लग रहा जैसे सलीम यानी दिलीप कुमार उस क़ैद से आज़ाद हो गए। पर हम सब उनके, अपने बीच न रहने पर सोगवार हैं, शायद ऐसी ही बड़ी शख्सियतों के बारे में इक़बाल ने कहा है -
हज़ारों साल नरगिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
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