Alternative Medicine: बायोसिमिलर दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना जरूरी, ताकि कम हो सके इलाज का खर्च
बायोसिमिलर दवाएं बहुत प्रभावशाली और सस्ती सिद्व होती हैं जो सुरक्षा और प्रभावशीलता में आम बायोलोजिक्स की दवाओं से कोई विशेषतः भिन्न नहीं होती और इसके जांच के लिए भी कड़े मानक बनाए हुए हैं।
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भारत में करोड़ों लोगों को अपने घरेलू खर्च का बहुत बड़ा हिस्सा पारिवारिक बीमारियों के इलाज में खर्च करना पड़ता है, उनके बजट का कभी-कभी तो 50 से 70% तक का हिस्सा अस्पतालों और दवाइयों के चक्कर में खर्च हो जाता है। इससे गरीब और औसत परिवारों पर बहुत बोझ पड़ता है और इसके लिए कभी-कभी तो लोगों को अपने घर या जमीन को बेचना पड़ता है या परिवार के गहने गिरवी रखने पड़ते हैं।
कुल मिलाकर इसके कारण देश में 3 से 4 करोड़ लोग सालाना गरीबी रेखा के जाल में फंस जाते हैं। कई बार तो इन गरीब परिवारों के बच्चों की पढ़ाई और रहन-सहन आदि पर भी बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है।
बढ़ती बीमारियों में ज्यादा किफायती इलाज के लिए प्रभावी उपायों की जरूरत है। वैसे तो सरकार द्वारा अनेक प्रभावी कदम उठाए गए हैं जिनमें आयुष्मान भारत आदि शामिल हैं, फिर भी गरीब और निचले औसत दर्जे के करोड़ों परिवारों को दवा और इलाज में होने वाले बढ़ते खर्च का डर हमेशा सताता रहता है।
इस संबंध में बायोसिमिलर दवाएं बहुत प्रभावशाली और सस्ती सिद्व होती हैं जो सुरक्षा और प्रभावशीलता में आम बायोलोजिक्स की दवाओं से कोई विशेषतः भिन्न नहीं होती और इसके जांच के लिए भी कड़े मानक बनाए हुए हैं।
यदि आम भाषा में कहा जाए, बायोलोजिक्स की दवाएं वही होती हैं जो बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा बनाई जाती हैं और पेटेन्ट द्वारा सुरक्षित होती हैं। अक्सर इनकी कीमत काफी ज्यादा होती है, परन्तु एक बार पेटेन्ट समाप्त होने के बाद इन्हें उसी प्रकार की गुणवत्ता के अनुरूप बायोसिमिलर प्रणाली से बनाया जा सकता है।
बायोसिमिलर दवाइयां और इनका लाभ
बायोसिमिलर दवाइयां तकरीबन वैसी ही होती हैं जैसी मूलतः बायोलोजिक दवाइयां, और उनका फायदा भी वैसा ही होता है, अलबत्ता उन्हें क्वालिफाइड डॉक्टरों की सलाह पर ही देना चाहिए।
इस समय देश में लगभग 100 बायोसिमिलर दवाओं के उत्पादन को स्वीकृति मिल चुकी है और हमारा देश दुनिया में बायोसिमिलर दवाओं के उत्पादन में अग्रणी है।
एक अनुमान के अनुसार देश में 118 बायोलोजिक्स की ऐसी दवाएं हैं जिनका पेटेन्ट 2015 से 2034 के बीच समाप्त हो रहा है। लेकिन उनमें से केवल 10ः दवायें ऐसी हैं जिनका बायोसिमिलर प्रणाली में विकसित करने की योजना है। इस प्रकार कुल मिलाकर यह एक ऐसा स्वर्णिम अवसर है जिसके अन्दर हमारे यहां बहुत तेजी से बायोसिमिलर दवायें बनाई जा सकती हैं। इन दवाओं की कीमत अनुमानतः बायोलोजिक्स की संबंधित दवाओं से लगभग 50 से 75% तक कम हो सकती हैं जिससे आम आदमी के दवाओं के खर्च में काफी बचत हो सकती है।
यह बचत न सिर्फ भारत के आम लोगों के लिए लाभप्रद है बल्कि विश्व के अनेक देशो के लिए भी बहुत फायदेमंद है। भारत को दुनिया की फार्मेसी समझा जाता है जो इन देशों में अच्छी और सस्ती दवायें भेजने के लिए जाना जाता है। यह सिर्फ अफ्रीका, लेटिन अमेरिका आदि देशों के लिए ही नहीं बल्कि धनी देशों के लिए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
2022 में अमेरिका में भारतीय दवाओं की कंपनियों द्वारा 40% जेनेरिक दवाओं के निर्यात से वहां के हेल्थकेयर में 219 बिलियन डॉलर की अनुमानित बचत हुई थी। आज इसी प्रकार की बचत इन देशों में किफायती बायोसिमिलर दवाओं के निर्यात से भी हो सकती है।
पेटेन्ट के रिन्यूवल का खेल समझिए
इस संबंध में एक समस्या यह है कि बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिनके पास दवाइयों के पेटेन्ट हैं, और जिनके आधार पर वे भारी मुनाफा कमाते हैं, उनका प्रयत्न होता है कि वें अपने पेटेन्ट को दवा के निर्माण में छोटी-मोटी तब्दीली करके रिन्यू करा लें, जिसे पेटेन्ट की एवरग्रीनिंग कहा जाता है। हमारी कोशिश यह रहती है कि पुराने पेटेन्ट को रिन्यू करने के लिए जब तक कोई नई दवा या उसमें कोई विशेष सुधार न हो, नए पेटेन्ट की अनुमति नहीं दी जाए।
इसके फलस्वरूप कई बार इन कंपनियों द्वारा पेटेन्ट कानून के अर्न्तगत कानूनी दावपेंच भी आजमाये जाते हैं। इसके लिए यह भी जरूरी है कि इस बारे में पेटेन्ट के रिन्यूवल के मामलों में कड़ी दृष्टि रखी जाए। साथ ही देश के पेटेन्ट के कानून और ड्रग कन्ट्रोलर इत्यादि रेगूलेटरी संस्थाओं द्वारा नियमों की सख्त अनुपालना की जाए।
इस समय देश में बायोसिमिलर दवाओं के अधिक प्रचलन को बढ़ाने के लिए अस्पतालों में इलाज और जन औषधी के कार्यक्रमों, जैसे आयुष्मान भारत इत्यादि में अधिक प्रयोग की आवश्कता है। इसका एक लाभ जो यह होगा कि सरकार को इन कार्यक्रमों में मंहगी बायोलोजिक दवाओं के स्थान पर, उतनी ही प्रभावशाली परन्तु किफायती बायोसिमिलर दवाओं के ज्यादा प्रयोग से होने वाली बचत को जन-स्वास्थ्य के अन्य कार्यकलापों में लगाया जा सकता है।
इसके अलावा इनकी बढ़ती हुई मांग के कारण देश में इनका निर्माण बढ़ाया जा सकता है जिसके फलस्वरूप इन दवाईयों की कीमत में और कमी होगी।
लोगों तक इसकी सहज उपलब्धता जरूरी
कुल मिलाकर इन दवाओं को देश के सरकारी अस्पतालों और जन-स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रयोग के लिए अनुमति देने की जरूरत है, जिसके लिए इनकी जांच भी कड़ाई से की जानी चाहिए ताकि आम लोगों को इसपर विश्वास बना रहे। सरकार को इस प्रकार की बायोसिमिलर दवाओं के थोक में खरीदने के लिए भी कदम उठाने के लिए जरूरत है ताकि देश मे इनका उत्पादन बढ़ सके और इनका निर्यात भी हो सके।
देश की कानूनी प्रणाली जो पेटेन्ट और ड्रग कन्ट्रोल इत्यादि को देखती है को सुदृढ़ करने की जरूरत है। कम्पटीशन कमीशन द्वारा भी यह देखा जा सकता है कि कम्पटीशन कानून के अर्न्तगत बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कम्पटीशन कानून की सख्ती से अनुपालना की जाये।
यदि सारांश में कहा जाए, आज आवश्यकता है कि सरकार द्वारा उठाए गए अनेक प्रभावी कार्यक्रमों जैसे आयुष्मान भारत आदि के अतिरिक्त, इनके अर्न्तगत अस्पतालों में दवाइयों के खर्च में बचत के लिए बायोसिमिलर दवाओं का उत्पादन ओर प्रचलन बढ़ाया जाए ताकि इससे आम आदमी को इलाज के बढ़ते हुए खर्च में राहत मिल सके।
नोट: लेखक भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं।
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