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बिहार डायरी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राजनीति के अपराधीकरण पर नकेल की आस 

Wed, 11 Aug 2021 11:46 AM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Wed, 11 Aug 2021 11:46 AM IST
सार

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राजनीति के अपराधीकरण पर नकेल की आस
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी माना, राजनीति में अपराधीकरण जैसे नासूर की सर्जरी की जरूरत
  • आजादी की 75 वीं वर्षगांठ अमृत महोत्सव से पहले अमृत की बूंदें
  • बिहार चुनाव के फैसले की राह बरास्ते यूपी दिल्ली तक पहुंचकर नजीर साबित हो सकती है

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bihar new politics supreme court judgment on tainted candidates sc imposes heavy fine on nine parties
बिहार चुनाव के अवमानना मामले में ताजा फैसला और राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से आस जगी है - फोटो : पीटीआई

विस्तार

राजनीति में ये ‘दाग‘अच्छे नहीं हैं। आजादी की 75 वीं वर्षगांठ से पहले मंगलवार को अलग-अलग दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर नकेल की आस जगाई है। हमारी कमीज दूसरों से सफेद का दावा करने वाले दलों की दागी राजनीति पर सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले लगाम साबित होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब दागियों के दाग राजनीतिक दल या सरकारें खुद की लाउंड्री में नहीं धूल पाएंगी, संबंधित

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हाईकोर्ट की मंजूरी लेनी होगी। उधर, बिहार चुनाव से जुड़े अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 9 दलों को दोषी ठहराते हुए यह फैसला दिया है कि उम्मीदवार चुने जाने के 48 घंटे के भीतर आपराधिक उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि हर हाल में सार्वजनिक करनी होगी। अवमानना के 9 दोषी दलों में से 8 पर आर्थिक जुर्माना भी ठोका।

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उम्मीद जगाते फैसले

बिहार चुनाव के अवमानना मामले में ताजा फैसला और राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से आस जगी है कि आगे से दागियों के दाग छिपाने और खुद की लाउंड्री में दाग धूलने की परंपरा थमेगी।

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हालांकि, चिंता यह है कि दो साल के भीतर सांसदों-विधायकों पर दागी मामलों में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2018 में दागियों के 4122 मामले थे जो 2020 में बढ़कर 4859 हो गए। इतना ही नहीं 122 वर्तमान और पूर्व विधायक-सांसद ईडी की रडार पर हैं। यूं तो सियासत में दाग और मनी लॉन्ड्रिंग ज्यादातर को पसंद हैं, लेकिन गणतंत्र की धरती बिहार के चुनाव से जुड़े ये सुप्रीम फैसले आगे के लिए नजीर साबित हो सकते हैं। लिट्मस टेस्ट भी।

उम्मीद की जा सकती है कि सुप्रीम फैसले से राजनीति के सबसे बड़े वायरस (अपराध व लेनदेन) के खिलाफ चुनाव आयोग को इम्युनिटी बूस्टर डोज मिले। विधायिका कानून बनाने और माननीयों के आपराधिक मामलों के तेजी से निपटारे को लेकर गंभीर हो, दल भी दागदार दामन से बच कर जनता-जनार्दन में छवि चमकाने की पहल करें।
 

हाईकोर्ट की नकेल क्यों


आमतौर पर जब सरकारें बदलती हैं, तो अपने-अपने दलों से जुड़े माननीयों पर से आपराधिक मामले वापस लेने का चलन है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल समेत कई राज्य बानगी हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे में भड़काऊ बयानवीरों (संगीत सोम, सुरेश राणा, साध्वी प्राची आदि) पर से मामले वापस लिए। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विनीत शरण की तीन सदस्यीय पीठ ने न्याय मित्र विजय हंसारिया के सुझाव पर गौर करते हुए यह फैसला तत्काल लिया कि आगे से संबंधित हाईकोर्ट की अनुमति जरूरी होगी, तभी दागियों के मामले वापस लिए जा सकेंगे। ऐसे मामलों की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों के बीच में तबादले भी नहीं होंगे। यूपी में 76 और कर्नाटक में

61 मामलों की वापसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला तत्काल लेना पड़ा। महाराष्ट्र सरकार भी एक्टिविस्टों के साथ-साथ दागियों के मामले वापसी का विचार कर रही थी। यूपी में जब सपा की अखिलेश सरकार से योगी आदित्यनाथ को सत्ता हस्तांतरण का दौर था, तो उम्रकैद के एक दोषी की सजा पूरी होने के काफी पहले ही रिहाई राज्यपाल ने की थी। अखिलेश सरकार के समय का यह मामला हाल में ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की रिहाई पर चिंता जताई।

राज्य सरकार या राज्यपाल को किसी मामले की वापसी या सजा कम करने के अधिकार पर हाईकोर्ट की मंजूरी क्या विधायिका के मामले में न्यायपालिका की दखल मानी जाएगी, यह भविष्य में चुनौती की शक्ल ले सकती है। हालांकि, राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का सिलसिला अभी जारी है। अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।
 

बिहार का फैसला बन सकता नजीर


बिहार चुनाव के अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला राजनीतिक दलों के लिए आईना साबित हो सकता है। पिछले साल 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के चुनाव में 470 दागी उम्मीदवार मैदान में थे। सभी राजनीतिक दल हमाम में नंगे थे। राजद, भाजपा, जदयू, कांग्रेस, भाकपा, माकपा भले दो गठबंधनों की छतरी तले एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में आमने-सामने थे लेकिन दागी उम्मीदवारों की जानकारी सार्वजनिक नहीं करने पर उनमें विविधता में एकता थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 9 दलों को अवमानना का दोषी ठहराया। कांग्रेस-भाजपा, जदयू को एक-एक लाख, एनसीपी-माकपा को 5 लाख का आर्थिक जुमाना लगाया है। जिस दल ने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के निर्देश का तनिक भी अनुपालन किया, उस पर जुर्माना राशि साकेंतिक यानी कम रही और जिसने पूरी तरह से निर्देर्शों की अनदेखी की, उस पर जुर्माना राशि ज्यादा रही। चुनावी रणबांकुरे के लिए आर्थिक जुर्माना राशि कम भले हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को वेबसाइट के होम पेज पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार कैप्शन से अलग से दागियों को दर्शाने का आदेश दिया है।

चुनाव आयोग को भी कहा है कि वह मोबाइल एप विकसित करे और चुनाव के दौरान ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार करे। सोशल मीडिया और अखबारों में भी इसकी जानकारी देने की हिदायत पहले से है। यह फैसला जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने सुनाया है। जस्टिस नरीमन अगले हफ्ते सेवानिवृत होने जा रहे हैं।
 

बिहार की राह बरास्ते यूपी दिल्ली की ओर



जैसे दिल्ली की सत्ता की राह उत्तर प्रदेश होकर निकलती है, वैसे ही बिहार से दिल्ली जाने की राह उत्तर प्रदेश होकर निकलती है। बिहार का यह फैसला चुनाव सुधार की दिशा में नजीर साबित हो सकता है। बिहार की राह बरास्ते यूपी दिल्ली की ओर पहुंच सकती है।

यूपी के आने वाले चुनाव के साथ-साथ लोकसभा चुनाव 2024 तक कुछ बदलाव की शुरुआती उम्मीद की जा सकती है। तब तक संभव है कि राजनीति के अपराधिकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भी मुकम्मल फैसले तक पहुंच जाए। 

दागियों से जुड़े मामलों का भी तेजी से निपटारा हो।उम्मीद करें कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों के लिए ये फैसले सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा साबित हों। उम्मीद करें कि आजादी के अमृत महोत्सव की बेला में लिए गए ये फैसले गणतंत्र के लिए अमृत साबित हों। उम्मीद करें कि कोरोना काल में राजनीति के अपराधीकरण वाले वायरस का समुचित इलाज हो। क्योंकि गौरतलब है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- राजनीति में अपराधीकरण जैसे नासूर की सर्जरी की जरूरत है।


 

फैसले का पंच

 

1. दागियों के मामले हाईकोर्ट की अनुमति के बगैर वापस नहीं होंगे
2. उम्मीदवारों के आपराधिक मामले 48 घंटे के भीतर सार्वजनिक करने होंगे
3. बिहार चुनाव अवमानना के 8 दल दोषी, आर्थिक जुर्माना भी
4. दलों को आपराधिक उम्मीदवार होम पेज पर अलग से दर्शाना होगा
5. चुनाव आयोग मोबाइल एप तैयार कर प्रचार-प्रसार-जागरूकता पर जोर दे


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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