बिहार से ग्राउंड रिपोर्ट: नीतीश का चिराग ने तो महागठबंधन का खेल ओवैसी ने बिगाड़ा
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तेजस्वी को बेहतर प्रदर्शन की आस तो थी, मगर मन ही मन शंका भी कि खेल बिगड़ सकता है। शायद इसी कारण से अति उत्साव नहीं दिखाया और रिजल्ट का इंतजार किया। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी की सफल रैलियों को देखकर बीजेपी हताश नहीं थी, हालांकि परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था। उसे जेडीयू-एलजेपी समीकरण ने चिंता में डाल दिया था। दोनों की चिंताएं सही साबित हुईं।
अभी तक की मतगणना के रुझान को देखें तो 15 सीटों पर एआईएमआईएम ने महागठबंधन का काम खराब कर दिया यानी उसके वोटों को महागठबंधन के प्रत्याशी को मिले वोटों में जोड़ दें तो वह जीत जाता है। इसी तरह लगभग इतनी ही सीटों पर जेडीयू का खेल लोक जनशक्ति पार्टी ने बिगाड़ा।
जनादेश को समझने के लिए चुनाव प्रचार पर एक नजर डालने की जरूरत है। सिर्फ दो राजनेताओं की सभाओं में सर्वाधिक भीड़ उमड़ रही थी- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरजेडी के तेजस्वी यादव की। यह अनुमान के अनुसार ही है कि बड़ी पार्टी इन्हीं में से कोई एक बनेगी। यानी भाजपा या आरजेडी। नीतीश का ग्राफ नीचे जा रहा था और नतीजों में भी यह दिख रहा है, मगर भाजपा-जेडीयू गठबंधन का वोट बैंक हमेशा बिहार में जीत का फार्मूला देता रहा है।
इस बार सिर्फ एक बात अलग थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाएं चुपचाप मतदान कर रहे थे, जिसका ट्रेंड राजनीतिक पंडितों को भी नहीं मिल रहा था। ये दोनों वर्ग राजग के वोटर माने जाते रहे हैं। अब जनादेश के ट्रेंड से जाहिर है कि उनका मोह राजग से भंग नहीं हुआ है। इन्हीं के वोट से जेडीयू की प्रतिष्ठा भी बची है, नहीं तो छोटा भाई होना भी मुश्किल हो जाता, बड़े भाई की बात तो दूर की है।
छोटी पार्टियों के प्रदर्शन पर निगाह डालते हैं तो चलता है कि जो गठबंधन से अलग रहीं, उनको जनता ने नकार दिया। एलजेपी को दो-तीन सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है। असदुद्दीन औवैसी की एएमआईएम किशनगंज की चार में से दो सीटें जीत सकती है। बंगलादेश की सीमा से लगे इस जिले के परिणाम पर सभी की निगाह रहती है, क्योंकि यहां 70 फीसदी के लगभग आबादी मुसलिम है। अन्य कहीं भी ओवैसी की नहीं चली।
भाजपा नेताओं को निश्चित रूप से इसपर अफसोस हो रहा होगा कि एलजेपी साथ होती तो फिर से बड़े बहुमत से राजग जीत जाता। हालांकि अभी आधे वोटों की गिनती हुई है और एनडीए बहुमत की ओर बढ़ता दिख रहा है, मगर थोड़े सीटों से। जब यह लेख लिख रहा हूं तभ पहला नतीजा आ चुका है और दरभंगा से भाजपा का प्रत्याशी विजयी घोषित हुआ है।
इससे पहले सुबह नौ बजे तक गठबंधन तो दोपहर 12 बजे तक राजग स्पष्ट बहुमत की तरफ बढ़ रहा था, मगर उस समय भी 50 से अधिक सीटों पर मामला हजार नहीं, बल्कि कुछ सौ वोटों से बढ़त का था। इनमें राजग और महागठबंधन दोनों की सीटें शामिल थीं। सरकार बनाने का मंत्र इन्हीं सीटों के बीच छिपा हुआ है।
इतनी ही सीटों ,यानी अन्य 50 सीटों पर बढ़त दो हजार से कम वोटों की थी। दोपहर दो बजे तक 100 ऐसी सीटें थीं, जिनपर दो हजार से कम वोटों का फासला था। यानी खेल कभी भी पटल सकता था। इसलिए दोनों बड़े दलों के राजनेता संभल कर बयान दे रहे थे।
अब कह सकते हैं कि विकास और सुशासन की जीत हो या हार, उसका क्रेज बरकरार है। शराबबंदी सफल हो या विफल, बिहार की जनता नीतीश के सबसे बड़े फैसले के साथ है। नीतीश कुमार ने भविष्य का कोई बड़ा वादा नहीं किया या वर्क प्लान नहीं बताया था, मगर प्रधानमंत्री मोदी ने लालू-राबड़ी शासन के जंगलराज लौटने का डर जरूर दिखाया था, जिसका असर पड़ा है।
कोई भी "लकड़सूंघवा" के उस दौर में जाने की नहीं सोच सकता, जब शाम छह बजे के बाद घरों के दरवाजे बंद कर लोग अपने को भगवान भरोसे कर लेते थे। लेकिन जैसी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि तेजस्वी बेहतर प्रदर्शन करेंगे, तो उन्होंने किया भी। उनके जोश को मतदाताओं ने स्वीकारा।
यह अलग बात है कि कुछ अनुभवहीनता और पिता लालू यादव की छाया उनपर भारी पड़ी। यूं तो उन्होंने प्रचार के दौरान एहतियात बरती। यहां तक कि बैनर-पोस्टर पर लालू के फोटो से भी परहेज किया, लेकिन यह जनता है, सब जानती है।
बावजूद इसके, याद करिए 2015 का चुनाव। दोपहर तक भाजपा आगे चल रही थी, मगर अचानक उसकी बढ़त पर ब्रेक लग गया और देखते-देखते वोटों की धारा बदल गई। बीजेपी के कार्यालयों में लड्डुओं का ढेर लग गया था। हालांकि हार के बाद बुझे मन से वो बंटे- दिवाली की शुभकामनाओं के नाम पर।
इस बार कांटे की टक्कर में राजग सरकार बनाए या महागठबंधन, इतना तय है कि सीटों का अंतर अधिक नहीं रहेगा और इसीलिए नई सरकार की भी राह आसान नहीं होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और बिहार में लंबे समय तक एक राष्ट्रीय अखबार के स्थानीय संपादक रह चुके हैं।)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।